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ऊष्मा उपचार की विधियाँ (Methods Of Heat Treatment In Hindi)

इस पोस्ट में हम जानेंगे उसमें उपचार उपचार की विधियाँ Methods Of Heat Treatment जैसे Hardening, Tempering, Annealing, Normalising, Case Hardening आदि के बारे में |

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ऊष्मा उपचार की विधियाँ (Methods Of Heat Treatment)

धातु में वांछित गुणों को प्राप्त करने के लिए ऊष्मा उपचार की निम्नलिखित विधियाँ अपनाई जाती हैं |

  1. कठोरता (Hardening)
  2. टैंपरिंग (Tempering)
  3. अनिलन (Annealing)
  4. सामान्यकरण (Normalising
  5. सतह कठोरण (Case Hardening)

1.कठोरता (Hardening)

यह ऊष्मा उपचार की वह विधि होती है, जिससे किसी धातु  को कठोर (Hard) बनाया जाता है। जिससे वे कम घिसे और न धातुओं को काटने योग्य हो सके।
इस विधि में इस्पात को उसके कठोरीकरण परास (Hardening Range) के अन्दर निश्चित तापमान तक गर्म करके पर्याप्त तक इसी तापमान पर रखा जाता है। जिससे धातु के अन्दर तक तापमान पूरी तरह से प्रवेश हो सके और फिर इसके बाद इसे किसी उपयुक्त द्रव में डुबोकर शीघ्रता से ठण्डा किया जाता है।
कठोरीकरण परास (Hardening Range) 0.87% से कम कार्बन वाले इस्पातों के लिए उच्च क्रान्तिक बिन्दु से 30°C से 5000 अधिक तापमान और 0.87% से अधिक कार्बन वाले इस्पातों के लिए निम्न क्रान्तिक तापमान 30°C से 50°C से अधिक रखा जाता है|
इस्पात को तीव्र गति से ठण्डा करने के लिए सबसे उपयुक्त माध्यम पानी होता है। ठण्डा करने की क्रिया को बुझाना (Quenching) कहते हैं। यह बुझाने का कार्य तेल तथा लवण पानी (Salt Water) के द्वारा भी किया जाता है। इस विधि से इस्पात जितनी अधिक शीघ्रता से ठण्डा किया या बुझाया जाता है, उतना ही अधिक कठोर होता है।
एलॉय इस्पात तथा उच्च चाल इस्पात को कठोरीकरण करने के लिए लगभग उसे 1100°C से 1300°C तक गर्म करके वायु के तेज झोंके के द्वारा ठण्डा किया जाता है। कठोरीकरण की मात्रा में कण (Grain) के साइज का भी प्रभाव पड़ता है। फाइन ग्रेन वाले इस्पात की तुलना में कोरस ग्रेन वाले इस्पात के पूरे द्रव्यमान में कठोरीकरण अधिक गहराई तक होती है।

जब इस्पात को सामान्य प्रकार से क्रान्तिक तापमान रेंज से ठण्डा हो तो यह ऑस्टेनाइट से पियरलाइट और एक स्वतन्त्र घटक के रूप में रूपांतरित होता है।
कठोरीकरण करने के लिए इस्पात को ठण्डा करने की दर प्रति सैकेण्ड 150°C से 200°C रखी जाती है। बुझाने के द्वारा मार्टेन्साइट तब तक नहीं बनता, जब तक कि इस्पात ऑस्टेनाइट के रूप में नहीं हो। तब कार्बन विलय के रूप में रहता है।
पुर्जों (Parts) को बुझाते समय काफी अधिक सावधानी रखनी चाहिए। गोल तथा लम्बे पुर्जों (Parts) जैसे  टेप, रीमर, ड्रिल आदि को सीधा लम्ब रूप में डुबोना चाहिए और चौरस (Flat) तथा पतले पुर्जी जैसे मिलिंग कटर, रिंग गेज, डिस्क आदि को किनारे की तरफ से डुबोना चाहिए तथा यह विशेष ध्यान रखना चाहिए की जॉब या कार्यखण्ड का मोटा भाग पहले डुबोया जाना चाहिए।

कठोरीकरण के उद्देश्य (Purpose of Hardening)

  • कठोरीकरण को निम्नलिखित उद्देश्यों के लिए किया जाता है|
  • इस्पात से बने कर्तन औजार (Cutting Tools) को अन्य धातुआ को काटने योग्य बनाने के लिए।
  • इस्पात से बने पुर्जी (Parts) को घिसने से बचाने के
  • लिए।
  • इस्पात की सामर्थ्यता (Strength) बढ़ाने के लिए। 

2. टैम्परिंग (Tempering)

इस विधि के द्वारा कठोर किए हुए इस्पात को निम्न क्रान्तिक तापमान की रैंज से नीचे उपयुक्त तापमान तक गर्म करके निश्चित दर से ठण्डा किया जाता है। औसत टैम्परिंग तापमान कार्बन एवं औजार इस्पात के लिए 280°C तथा एलॉय उच्च इस्पात के लिए 560°C होता है। ठण्डा करने से पहले यही ताप 4 से 5 मिनट अनुच्छेद की प्रति मि.मी. मोटाई के लिए बनाए रखना आवश्यक होता है।
इस अवधि में ठण्डा करने के लिए पानी, तेल या वायु का प्रयोग किया जाता है। इस विधि में भी जॉब या कार्यखण्ड को तेजी से ठण्डा किया जाता है।
तेल के माध्यम से पुर्जो (Parts) को ठण्डा करने से उनमें विकृति (Distort) होने की सम्भावना कम रहती है। इसमें तेल का तापमान 32°C से 42°C अच्छा रहता है। इस्पात की वस्तुओं को अधिकतर तेल में ही ठण्डा किया जाता है।
इस्पात के पुर्जी (Parts) की टैम्परिंग करने के लिए उन्हें विद्युत या गैस की भट्टी में गर्म किया जाता है। भट्टी में एक समान तापमान पैदा करने के लिए इसमें वायु भेजी जाती है।
टैम्परिंग के लिए कठोर किए गये इस्पात को फिर से गर्म करके उसके अन्दर मारटेन्साइट का कुछ भाग फिर से पर्लाइट में बदल लिया जाता है, जिसके कारण धातु की भंगुरता तथा कठोरता कम होकर चिमड़पन (Toughness) तथा तन्यता (Ductility) का गुण बढ़ जाता है|

टैम्परिंग के उद्देश्य (Purpose of Tempering)

टैम्परिंग के निम्नलिखित उद्देश्य निम्नलिखित हैं
  • इस्पात की तन्यता बढ़ाने के लिए।
  • इस्पात के आयतन में परिवर्तन करने के लिए।
  • कठोर किए हुए पुर्जो (Parts) की आवश्यकतानुसार कठोरता तथा भंगुरता कम करने के लिए।
  • इस्पात में सही आन्तरिक संरचना लाने के लिए, जिससे उसमें चीमड़पन और झटके सहन करने की सामर्थ्य बढ़ाने के लिए।
  • कार्य को बार-बार गर्म करने, उसमें उत्पन्न प्रतिबलों को दूर करने के लिए।

टैम्परिंग की एकल तापन विधि (Single Heating Method of Tempering)

इस विधि में कार्यखण्ड या जॉब को उच्च क्रान्तिक तापमान से लगभग 30°C से 50°C तक अधिक गर्म किया जाता है। गर्म करने के बाद कार्यखण्ड या जॉब को तरन्त पानी में निश्चित गहराई तक ठण्डा किया जाता है। छैनी आदि कर्तन औजार (Cutting Tools) को लगभग 12 मि.मी. से 13 मि.मी. लम्बाई तक ठण्डा किया जाता है। इसके बाद कार्यखण्ड या जॉब को बाहर निकाल लिया जाता है। इससे इसके पीछे की गर्मी कठोर किए हुए स्थान की तरफ बढ़ती है और इस पर कई रंग बदल जाते हैं।
जब कार्यखण्ड या जॉब पर निश्चित रंग आ जाये, तब उसे पुनः पानी में डुबोकर पूरी तरह से ठण्डा कर लिया जाता है।

टैम्परिंग रंग चार्ट (Tempering Colour Chart) 

तापमान रंग कार्य जिनके लिए उपयुक्त है

  • 220°C अधिक पीला पुआल सर्जिकल यंत्र, रेजर ब्लेड, हथौड़े के फलक
  • 230°C हल्का पुआल (Light Straw) लैथ औजार, पैने चाकू
  • 240°C मध्यम पुआल (Medium Straw) ठण्डी छैनी, कैंची, मिलिंग कटर
  • 250°C गहरा पुआल (Dark Straw) चेजर, टैप, डाई 270°C हल्का बैंगनी ट्विस्ट ड्रिल, टेबल, चाकू 285°C गहरा बैंगनी पेचकस, स्प्रिंग
  • 300°C हल्का नीला मुलायम धातु में काम आने वाले कर्तन औजारों के लिए।

3. अनिलन (Annealing)

अनिलन प्रक्रम को दो भागों में बाँटा गया है
  1.  प्रक्रम अनिलन (Process Annealing)
  2.  पूर्ण अनिलन (Full Annealing)

1.प्रक्रम अनिलन (Process Annealing)

इसे निम्न ताप अनिलन अथवा व्यवसाय अनिलन भी कहते हैं।
इस विधि में इस्पात को निम्न क्रान्तिक बिन्दु से नीचे एक निश्चित तापमान तक गर्म करके उसे धीमी गति से ठण्डा करते हैं।
इस प्रकार के अनिलन में इस्पात को लगभग 550°C से 650°C तक गर्म किया जाता है।
इस प्रक्रम में इस्पात संरचना का फिर से क्रिस्टलन होकर नई संरचना का निर्माण होता है।

2. पूर्ण अनिलन (Full Annealing)

इसे उच्च तापमान अनिलन भी कहते हैं।
इस प्रक्रम का उद्देश्य इस्पात को मुलायम बनाना अथवा कणों की संरचना को शुद्ध करना होता है।
इस विधि के अन्दर 0.87% से कम कार्बन वाले इस्पात को क्रान्तिक तापमान (बिन्दु) से लगभग 30°C से 50°C से अधिक तापमान तक गर्म करते हैं और 0.87% से अधिक कार्बन वाले इस्पात को निम्न क्रान्तिक ताप से लगभग उतने ही (30°C से 50°C) तक गर्म करते हैं इस निश्चित तापमान पर इस्पात को कुछ समय तक स्थिर रखते है जिसके कि उसकी संरचना में आवश्यक आन्तरिक परिवर्तन हो जाए।
किसी कार्य खंड्या या जॉब की अनिलन करने के लिए उसे
अनिलन तापमान पर 3 से 4 मिनट प्रति मिलीमीटर की दर से गर्म करना चाहिए, इसके पश्चात इसे धीमी गति से ठण्डा करना चाहिए । कार्यखण्ड या जॉब को ठण्डा करने के लिए भट्री में ही छोड दिया जाता है अथवा भट्टी से निकालकर किसी अचालक पदार्थ रेत, चना या राख में दबा देना चाहिए। इससे ठण्डा होने की दर कम हो जाती है।
इस विधि से जब इस्पात को अनिलन तापमान तक गर्म किया जाता है तो इसकी संरचना ऑस्टेनाइट में बदल जाती है फिर धीमी गति से ठण्डा करने पर अपने पूर्व मूलरूप पर्लाइट फेराइट या पलाइट सीमेंटाइट में कार्बन की मात्रा के अनुसार आ जाता है।
इस प्रकार की अनिलन क्रिया के बाद इस्पात अपनी कठोरता खो देता है। इस प्रक्रम से इस्पात मुलायम, तन्य तथा चीमड़ हो जाता है।
उच्च तापमान अनिलन के लिए उपयुक्त अनिलन तापमान 0.12% से कम कार्बन के लिए मृत मृदु इस्पात के लिए 875°C से 925°C तथा 0.12 से 0.45% के मृदु इस्पात के लिए 840°C से 870°C , मध्यम कार्बन इस्पात के लिए 780°C से 840°C तथा 0.80% से 1.5% के उच्च कार्बन इस्पात के लिए 760°C से 780°C होता है।

अनिलन के उद्देश्य (Purposes of Annealing) 

अनिलन के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं

  • धातु को मुलायम बनाना, जिससे उस पर मशीनन (Ma chining) कार्य आसानी से किया जा सके।
  • धातु के ग्रेन साइज को शुद्ध करना।
  • धातु के विद्युत एवं चुम्बकीय गुणों में सुधार करना। 
  • धातु में तन्यता का गुण बढ़ाने के लिए।
  • मशीनन (Machining) तथा ढलाई (Casting) के समय .. विभिन्न हिस्सों के अलग-अलग दर से ठण्डा होने पर उसमें आयी सिकुड़न के कारण उत्पन्न हुए आन्तरिक प्रतिबलों को दूर करने के लिए।
  • धातु को उस स्थिति में लाने के लिए कि बाद में वह ऊष्मा उपचार के लिए उपयुक्त हो जाए। ...

(4) सामान्यकरण (Normalising)

इस प्रक्रम (Process) में इस्पात को सामान्यकरण रेंज में उचित तापमान तक गर्म किया जाता है। यह रेंज उच्च क्रान्तिक तापमान बिन्दु से लगभग 30°C से 50°C अधिक रहती है। सामान्यकरण के लिए यह तापमान लगभग 900°C रखा जाता है।
वांछित तापमान पर इस्पात को कम से कम 15 मिनट तक रखा जाता है, जिससे कि एक समान संरचना प्राप्त हो सके। इसके पश्चात इस्पात को वायु में ठण्डा होने के लिए छोड़ दिया जाता है।
इस विधि में इस्पात को उपयुक्त तापमान लगभग 900°C तक गर्म करने से इसकी संरचना पूरी तरह से ऑस्टेनाइट में बदल जाती है और वायु में ठण्डा होने के कारण फेराइट पर्लाइट से अलग हो जाता है। इस प्रकार इस्पात अपनी मूल संरचना को प्राप्त कर लेता है।
इस विधि के प्रयोग से इस्पात के शुद्ध होने चीमड़पन तथा
तन्यता के गुणों में वृद्धि होने के साथ-साथ मुलायमपन भी बढ़ जाता है।
इस प्रकार का ऊष्मा उपचार निम्न कार्बन इस्पात मध्यम कार्बन इस्पात के लिए ही उपयुक्त होता है।
एलॉय इस्पात का सामान्यकरण करने के लिए गर्म करने का समय लगभग दो घण्टे होता है और कार्यखण्ड या जॉब को ठण्डा करने की दर अधिक धीमी रखी जाती है। अर्थात जॉब को भट्टी के अन्दर ही ठण्डा किया जाता है।
इस विधि में मुलायमपन अनीलन (Annealing) की अपेक्षा कम प्राप्त होती है।
इस विधि से फोर्ज की गई छोटी वस्तुओं तथा पुर्जों(Parts) एवं ड्रोप हैमर से फोर्ज की वस्तुओं या पुर्जों (Parts) का सामान्यकरण किया जाता है।
इस विधि से रोलिंग तथा ढलाई (Casting) के पश्चात धातुओं का सामान्यकरण (Normalising) किया जाता है।

सामान्यकरण के उद्देश्य (Purpose of Normalising) 

सामान्यकरण के निम्नलिखित उद्देश्य हैं

  • इस्पात के कणों (Grains) के साइज को कम करने के लिए।
  • इस्पात के यांत्रिक गुणों में सुधार लाने के लिए।
  • विभिन्न संक्रियाओं (Operations) के द्वारा उत्पन्न प्रतिबलों को दूर करने के लिए।
  • चीमड़पन बढ़ाने के लिए।
  • इस्पात में चरम सामर्थ्य (Ultimate Strength), पराभव बिन्दु (Yield Point) तथा संघटन सामर्थ्य (Impact Strength) के उच्च मान प्राप्त करने के लिए।

(5) सतह कठोरण (Case Hardening)

इस विधि के द्वारा इस्पात की. बाह्य सतह को कठोर बनाय जाता है लेकिन इस्पात का आन्तरिक भाग मुलायम तथा चीमड़ रहता है।
इस विधि की सहायता से निम्न कार्बन इस्पात की बाहरी सतह को कठोर एवं घिसने के लिए प्रतिरोध योग्य बनाया जाता है|
इस विधि के अनुसार पहले इस्पात को रक्त तप्त गर्म किया जाता है फिर उसकी सतह पर अतिरिक्त कार्बन का समावेश कराया जाता है। जिससे एक निश्चित गहराई तक उसकी बाहरी सतह पर कार्बन की मात्रा बढ़ जाती है। इसके पश्चात इसका कठोरण (Hardening) की जाती है।
इस विधि के अनुसार इस्पात में अतिरिक्त कार्बन समावेशन कराने के कारण इसको कार्बुराइजिंग प्रक्रम भी कहते हैं।
यह विधि पिटवां लोहा तथा मृदु इस्पात के लिए अधिकतर अपनाई जाती है क्योंकि इनमें कार्बन की मात्रा बहुत कम होती है।

सतह कठोरण प्रक्रम (Case Hardening Process) 

सतह कठोरण निम्नलिखित दो अवस्थाओं में किया जा सकता है

(i) कार्बुराइजिंग (Carburising) अर्थात बाहरी सतह में कार्बन की मात्रा बढ़ाना।
(ii) बाहरी सतह को कठोर बनाना (Hardening of Exter nal Surface)

(i) कार्बुराइजिंग (Carburising)

सतह कठोरण प्रक्रम द्वारा कठोर की जाने वाली वस्तुओं को ढलवां लोहा या इस्पात के वायु बन्द बक्से में इस प्रकार रखा जाता है कि इसके चारों तरफ एक ऐसा पदार्थ रहे, जिसमें कार्बन की मात्रा बहुत अधिक हो, जैसे - लकड़ी का कोयला (Charcoal) आदि।
इसके बाद इस्पात के बक्से उच्च क्रान्तिक तापमान से थोड़े से अधिक तापमान तक गर्म करते हैं । यह तापमान 900°C से 950°C तक रखा जाता है। फिर इस तापमान पर इस इस्पात को काफी समय तक रखते हैं ताकि इसके चारों ओर रखे पदार्थ से कार्बन इस्पात या धातु की सतह पर अच्छी तरह प्रवेश कर जाता है। इस प्रकार से धातु की बाहरी सतह उच्च कार्बन इस्पात (High Carbon Steel) में बदल जाती है, जिससे इसमें कार्बन की मात्रा 0.8 से 1.2% तक हो जाती है।
धातु या इस्पात में कार्बन के समावेश की गहराई इस बात पर निर्भर करती है कि उसे कितने समय तक गर्म किया गया है तथा अधिकतम तापमान पर इसे कितने समय तक रखा गया है।
इस विधि में लगभग 3 से 4 घण्टे के समय में 0.8 मि.मी. से 1.6 मि.मी. गहराई तक कार्बन का समावेश हो जाता है फिर बक्से के अन्दर ही धातु को ठण्डी होने देते हैं।
इस विधि से लगभग 5 घण्टे के समय में 925°C तापमान पर लगभग 1 मि.मी. गहराई तक सतह कठोर बनाई जा सकती है।
इस विधि में कार्यखण्ड या जॉब अथवा पुर्जी (Parts) को बक्से में बन्द करने से पहले उनकी सतहों से जंग आदि को अच्छी तरह से साफ कर देना चाहिए।
निम्न कार्बन इस्पात के पुर्जी (Parts) की बाहरी सतह को उच्च कार्बन इस्पात की बनाने वाली इस विधि को पैक कार्बुराइजिंग विधि भी कहते हैं।

(ii) बाहरी सतह को कठोर बनाना (Harder g of Ex ternal Surface)

इस विधि में इस्पात को पुनः लगभग 900°C तक गर्म करते हैं फिर तेल में डुबोया जाता है। इससे इसकी संरचना परिशुद्ध (Refine) हो जाती है इससे भंगुरता समाप्त हो जाती है और इसकी आन्तरिक कोर मुलायम तथा चिमड़ बन जाती है।
इस विधि में धातु को पुनः लगभग 700°C तक गर्म किया जाता है और पानी में डुबोकर बुझाया जाता है, जिससे उसकी बाहरी सतह से मुलायमपन समाप्त होकर उसमें पुनः कठोरता आ जाती है।

सतह कठोरण के लाभ (Advantage of Case Hard ening)

सतह कठोरण के निम्नलिखित लाभ मुख्य हैं |

  • इसमें कार्बन की मात्रा कम होने के कारण कठोरता बाहरी सतह के कुछ गहराई तक जाती है और मुलायम और चीमड़ कोर स्वय मिल जाती हैं।
  • ये धातुएँ उच्च कार्बन इस्पात की तुलना में अधिक सस्ती होती हैं।
  • इस विधि में संरचना में परिवर्तन से जहाँ एक तरफ से बाहरी सतह उच्च कार्बन इस्पात की बनकर पर्याप्त कठोर और घिसाव प्रतिरोधी हो जाती है, वही दूसरी तरफ अन्दर की कोर मुलायम और चीमड़ हो जाती है।
  • इस विधि से सम्पूर्ण तरह से उच्च कार्बन इस्पात का ही प्रयोग किया जाए तो सम्पूर्ण भाग ही कठोर हो जाएगा, जो काफी भंगुर होगा और उसमें चीमड़पन नहीं होगा।

द्रव कार्बुराइजिंग (Liquid Carburising)

द्रव कार्बुराइजिंग के लिए सोडियम साइनाइड तथा अन्य प्रकार के लवण बाथ (Salt Bath) प्रयोग में लाये जाते हैं।
इस विधि के अनुसार सोडियम साइनाइड या लवण बाथ (Salt Bath) को गर्म करके पिघला लिया जाता है और फिर निम्नलिखित कार्बन इस्पात को इसमें डालकर उसकी सतह पर 0.2 से 0.4 मि.मी. मोटी कठोर परत बना लेते हैं।
इस विधि से इस्पात की संरचना पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, केवल उसकी सतह ही अत्यधिक दृढ़ और कठोर बनती है।
नाइट्राइडिंग प्रक्रम डीजल इंजन के भागों (Parts) तथा विमान आदि के लिए उपयोगी होता है। शैपिंग और ऊष्मा उपचार के बाद नाइट्राइडिंग अन्तिम प्रक्रम होता है।
यह विधि ऐल्यूमीनियम एलॉय तथा इस्पात की उन एलॉय के लिए अधिक उपयोगी होती है, जिनमें ऐल्यूमीनियम की मात्रा अधिक होती है। इस विधि के बाद धातु की टैम्परिंग सम्भव नहीं होती है।

गैस कार्बुराइजिंग (Gas Carburising)

इस विधि के द्वारा निम्नलिखित कार्बन इस्पात के जॉब या कार्यखण्ड की बाहरी सतह को कठोर तथा आन्तरिक कोर को मुलायम और चीमड़ बनाया जाता है।
इस विधि में धातु या इस्पात को ऐसी गर्म गैसों जिनमें हाइड्रोकार्बन की अधिकता होती है, जैसे -कोयला गैस (Coal Gas) से अधिक उच्च तापमान पर गर्म किया जाता है।
इस विधि में निम्न कार्बन इस्पात की वस्तुओं को कार्बुराइजिंग भट्टियों में 870°C से 950°C तापमान तक गर्म किया जाता है और भट्टी में मीथेन सहित प्राकृतिक गैसें प्रवेश कराई जाती हैं। ऐसा करने से धातु या इस्पात की बाहरी सतह पर अतिरिक्त कार्बन का समावेश सतह कठोरण (Case Hardening) विधि की तरह हो जाता है।
इस प्रकार की कार्बुराइजिंग विधि के लिए अधिक भारी, हाइड्रोकार्बन गैसों और द्रवों का उपयोग किया जाता है।
इस विधि में उत्पन्न कार्बन को या तो इस्पात सोख लेता है या फिर वह कार्यखण्ड या जॉब की सतह पर कालिख के रूप में जम जाता है |
इस प्रकार की कार्बुराइजिंग विधि के लिए सामान्यतौर पर 900 से 950°C तापमान का प्रयोग किया जाता है।
गैस कार्बुराइजिंग के लिए परम्परागत विधियों में 8 घण्टे का समय लगता है। इस विधि से 1 मि.मी. सतह की गहराई के लिए लगभग 6 घण्टे का समय लगता है।
यह विधि आसान नहीं होती है इसमें केवल कुशल कारीगरों (Workers) द्वारा ही अच्छा परिणाम प्राप्त किया जा सकता है।

साइनाइडिंग (Cyaniding)

इस विधि में निम्न कार्बन इस्पात तथा मध्यम कार्बन इस्पात की बाहरी सतहों में नाइट्रोजन एवं बर्तन के समावेश से बाहरी सतह को कठोर किया जाता है और आन्तरिक सतह मुलायम, चीमड़ तथा तन्य बनी रहती है।
इस विधि के द्वारा इच्छानुसार जॉब या कार्यखण्ड की पूरी सतह या किसी भाग को कठोर बनाया जा सकता है।
इस विधि में कार्यखण्ड या जॉब को पिघले हुए लवण (Salt) बाथ में डुबोया जाता है फिर इसे निकालकर तेल अथवा पानी में डुबोकर ठण्डा कर लिया जाता है। बाथ के रूप में सोडियम साइनाइड या पोटेशियम साइनाइड का प्रयोग किया जाता है।
इस विधि में साइनाइड बाथ को 800°C से 900°C तापमान पर रखा जाता है।
इस विधि के द्वारा उत्पन्न हुई कठोर सतह के कारण बाहरी सतह पर कार्बन एवं नाइट्रोजन के कठोर साइनाइड कम्पाउन्ड का बनना होता है।
इस विधि में कठोर हुई सतह की मोटाई लगभग 0.13 मि.मी. से 0.5 मि.मी. तक होती है। विशेष लवण (Salt) के मिश्रण के प्रयोग से इस विधि के द्वारा 0.8 मि.मी. मोटी कठोर सतह बनाई जा सकती है। सामान्य परिस्थितियों में 800°C तापमान वाले साइनाइड लवण (Bath) में कार्यखण्ड या जॉब को 15 मिनट तक डुबोए रखने से लगभग 0.125 मि.मी. मोटाई की सतह प्राप्त की जा सकती है।

साइनाइडिंग के लाभ (Advantage of Cyaniding)

 निम्नलिखित लाभों के लिए साइनाइडिंग विधि अपनाई जाती है -
  • इस विधि में कार्यखण्ड या जॉब को विकृत (Distort) होने से बचाया जा सकता है।
  • इस विधि में कार्यखण्ड या जॉब की आन्तरिक सतह की तरफ कठोरता के धीरे-धीरे कम होने से सतह पर दरार पड़ने की सम्भावना कम रहती है।
  • इस विधि का उपयोग करने से कार्यखण्ड या जॉब पर उज्ज्वल तथा चमकदार फिनिश बनाई रखी जा सकती है।

लौ कठोरण (Flam Hardening)

इस विधि में धातु की सतह को ऑक्सी ऐसिटीलीन फ्लेम (लो) द्वारा उस समय तक गर्म किया जाता है, तब तक उसका ताप कठोरण परास (Hardening Range) में नहीं पहुँच पाता है। अब पर पानी की फुहार (Spray) छोड़कर तेजी से ठण्डा किया जाता इससे सतह पर काफी कठोरता आ जाती है।
इस विधि में कठोर की जाने वाली सतह की गहराई में फ्लेम के तापमान, गर्म करने के समय तथा पानी की फुहार (Spray) को नियन्त्रित करके कम या अधिक किया जा सकता है।
इस विधि में सामान्य कठोरण सम्भव होता है अर्थात जिस भाग को कठोर करना होता है, उसी भाग को फ्लेम द्वारा गर्म किया जाना है। जिससे कि कठोरण (Hardening) के लिए उपयुक्त तापमान उसी भाग (Parts) का हो।
गियरों के दाँतों को इसी विधि के द्वारा कठोर किया जाता है।

लौ कठोरण के लाभ (Advantage of Flame Hard. ening)

लौ कठोरण के लाभ निम्नलिखित हैं |
  • इस विधि के द्वारा ऐसे कार्यखण्ड या जॉब का कठोरण किया जाता है, जिनको भट्टी में आसानी से नहीं रखा जा सकता है।
  • इस विधि के द्वारा कम समय में ही सतह कठोरण (Case Hardening) की जा सकती है।
  • इस विधि में कार्यखण्ड या जॉब को गर्म करने के लिए भट्टी की तुलना में कम समय में गर्म किया जा सकता है।
  • इस विधि के द्वारा कम गहराई या सीमित गहराई तक कठोरण किया जा सकता है तथा शेष भाग प्रभावित नहीं होता है।
  • इस विधि में कार्यखण्ड या जॉब का लौ (Flame) बहुत जल्दी गर्म कर देती है, इससे शेष भाग की चीमड़ता तथा तन्यता पर कोई फर्क नहीं पड़ता है।

इन्डक्शन कठोरण (Induction Hardening)

इस विधि में कार्यखण्ड या जॉब की सतह पर उच्च आवत्ति की विद्यत धारा प्रवाहित की जाती है, जिसके द्वारा सतह का तापमान तेज गति से कठोरण परास (Hardening Range) तक पहुँच जाता है।
इस तापमान के प्राप्त होते ही विद्युत धारा का प्रवाह बन्द कर दिया जाता है और इसके तुरन्त बाद ही सतह पर फुहार (Spray) के रूप में पानी छोड़कर कार्यखण्ड या जॉब को तेजी से ठण्डा कर लिया जाता है |
यह प्रक्रम (Process) इतनी गति से होता है कि 5 सैकेण्ड के अन्दर 3 मि.मी. मोटाई की कठोर सतह प्राप्त हो जाती है।
कार्यखण्ड या जॉब की बाहरी सतह को मजबूत और कठोर बनाने के साथ ही आन्तरिक सतह को मुलायम तथा चीमड़ रखने की बहुत ही दक्ष (Efficient) विधि होती है।
इस प्रकार इस विधि से कार्बन की अतिरिक्त मात्रा नहीं बढ़ाए जाने के कारण इसके द्वारा कठोरता का कम या अधिक प्राप्त होना स्वयं धातु के अन्दर उपस्थित कार्बन की मात्रा पर निर्भर करता है।
0.5% कार्बन इस्पात के लिए कठोरण तापमान लगभग
750°C से 760°C और एलॉय इस्पात के लिए तापमान 790°C से 800°C रहता है।
इस विधि की सहायता से फ्रैंक शाफ्ट, कैम शाफ्ट, फ्रैंक पिन, शायर.वाल्व, रौकर आर्म, ट्रेक रोलर, एक्सिल आदि का कठोरण (Hardening) किया जाता है।

इन्डक्शन कठोरण के लाभ (Advantage of Induction Hardening)

इन्डक्शन कठोरण के मुख्य लाभ निम्नलिखित हैं
  • बहु उत्पादन के लिए यह सबसे सस्ती विधि होती है।
  • दूसरी विधियों की अपेक्षा इसमें कम समय लगता है। 
  • इस विधि से पुर्जे (Parts) टेढ़े-मेढ़े नहीं होते हैं।
  • पुर्जी (Parts) या जॉब की बाहरी सतह को कठोर करते समय़ इसके आन्तरिक भाग पर कोई प्रभाव नहीं पडता है।

ऊष्मा उपचार क्या है? (Introduction of Heat Treatment in hindi)

 



ऊष्मा उपचार क्या है? (Introduction of Heat Treatment in hindi)

किसी धातु या मिश्र धातु को निश्चित तापमान तक गरम करने के पश्चात किसी निश्चित दर से ठण्डा किया जाता है, जिससे धातु के आन्तरिक गुणों में परिवर्तन होता है। इस क्रिया को ही ऊष्मा उपचार कहते हैं।
इस क्रिया से इस्पात के आन्तरिक संघटन पर प्रभाव पड़ता है।
इंजीनियरिंग कार्यों में इस्पात (Steel) का अनेक कार्यों में उपयोग होता है इसलिए इसमें कुछ विशेष गुणों का होना अति आवश्यक होता है क्योंकि इसे कई स्थानों पर मोड़ना या ऐंठना पड़ता है। बहुत-से स्थानो पर इसे कई प्रकार के प्रतिबल (Stresses) सहन करते पड़ते हैं।
विभिन्न प्रकार के कर्तन औजार जिनके लिए उपयुक्त पदार्थ जिसमें पर्याप्त कठोरता तथा चीमड़पन होना अति आवश्यक है। साथ ही कर्तन औजार (Cutting Tool) का मुलायम होना भी आवश्यक होता है।
विभिन्न आवश्यकता तथा उपयोगिताओं को देखते हुए इस्पात में वाछित गुणों के समावेश ही ऊष्मा उपचार (Heat Treatment) द्वारा किया जाता है।

इस्पात की संरचना (Structure of Steel)

शुद्ध लोहा पूर्णरूप से फेराइट का बना होता है, जो कि मुलायम तथा तन्य धातु होती है। इसकी आन्तरिक संरचना रवेदार (Crystalline) होती है।
इस्पात (Steel) लोहा और कार्बन की मिश्र धातु (Allot होता है। कार्बन के मिलाने से इस्पात की संरचना पर काफी प्रभाव पडता है। यह कार्बन फेराइट के साथ मिलकर एक रासायनिक मिश्रण बनाता है, जिस सीमेंटाइट कहते हैं । सीमेंटाइट अत्यधिक कठोर तथा भंगुर एवं सफेद रंग का होता है। श्वेत ढलवां लोहे का आन्तरिक सफेद रंग सीमेंटाइट के कारण ही होता है।
धातु में सीमेंटाइट बनने की क्रिया आँख से नहीं दिखाई देती, इसको देखने के लिए माइक्रोस्कोप प्रयोग किया जाता है।
सीमेंटाइट लोहे में स्वतन्त्र रूप से विद्यमान नहीं रह कर पर्लाइट के रूप में मिलता है। पर्लाइट फेराइट और सीमेंटाइट से मिलकर बना होता है। इसमें फेराइट 87% और सीमेंटाइट 13% रहता है। सीमेंटाइट के भार के अनुसार 6.67% कार्बन और 93.33% लोहा रहता है। अत: कार्बन तथा लोहे का अनुपात 1:4 रहता है।
इस्पात में जितनी कार्बन की मात्रा बढ़ती है, उतनी ही पियर - लाइट की मात्रा भी बढ़ती है। साथ ही फेराइट की मात्रा उसी अनुपात में कम हो जाती है। इस संघटन के घटकों के अनुपात इस प्रकार का परिवर्तन उस समय तक होता रहता है, जब तक कार्बन की मात्रा बढ़कर 0.83% तक नहीं हो जाये। इस स्थिति में इस्पात पूर्णरूप से पियर लाइटयुक्त होता है। इसके बाद कार्बन की मात्रा जैसे-जैसे बढ़ाई जाती. है, वैसे-वैसे स्वतन्त्र सीमेंटाइट की मात्रा बढ़ने लगती है। पियरलाइट का अनुपात कम होने लगता है।
पियरलाइट बढ़ने से इस्पात की सामर्थ्यता बढ़ती है तथा इसके कम होने से सामर्थ्यता कम होने लगती है। इसमें 0.83% की सीमा तक कार्बन की मात्रा बढ़ने से इसकी सामर्थ्यता बढ़ती है। इस सीमा से अधिक कार्बन की मात्रा बढ़ाने से पियरलाइट की मात्रा कम हो जाती है। इसी प्रकार सीमेंटाइट के बढ़ने से कठोरता बढ़ती है।
स्वतन्त्र फेराइट काफी मुलायम तथा तन्य होता है, जैसे-जैसे कार्बन की मात्रा बढ़ती है, पियरलाइट बढ़ता है और स्वतन्त्र फेराइट कम होता है और इस्पात का मुलायमपन तथा तन्यता कम हो जायेगी।

इस्पात की संरचना में परिवर्तन (Changes of Steel Structure)

यदि 0.2% कार्बन वाले इस्पात के एक टुकड़े को धीरे-धीरे समान दर से गर्म किया जाये तो उसका तापमान 72307 तक समान रूप से बढता है फिर 723°C पर कुछ समय के लिए स्थिर हो जाता है। इस वधि में जो ऊष्मा धातु को दी जाती है, उसका कुछ भाग इस्पात की आन्तरिक संरचना में परिवर्तन में खर्च हो जाता है शेष भाग शेष तापमान बढ़ाने में इसी कारण तापमान बढ़ने की दर कम हो जाती है। इसके बाद कछ कम दर से तापमान 825°C तक बढ़ता है। यदि 825°C से आगे भी टुकड़े को गर्म किया जाये तो तापमान लगभग पुनः उसी पूर्व स्थिति के अनुसार बढ़ेगा।
वह बिन्दु जिस पर तापमान पहली बार स्थिर होता है, उसे डिकलेसेंस बिन्दु (Decalescence Point) कहते हैं।
यदि इसी प्रकार इस्पात को उच्च तापमान पर वापिस ठण्डा किया जाता है तो विपरीत परिवर्तन होता है। ठण्डे होते समय उस बिन्दु के आस-पास तापमान में स्थिरता आती है। जिस समय गर्म करते समय पहली बार तापमान स्थिर हुआ था। ठण्डे करते समय इसके अलावा तेज रोशनी भी दिखाई देती है, इससे ऐसा लगता है कि ऊष्मा बाहर निकल रही है। इस बिन्दु को रिकलेसेंस बिन्दु (Recalescence Point) कहते हैं ।
इस बिन्दु के बाद ठण्डे होने की दर सामान्य रहती है जब तक कि सम्पूर्ण धातु या इस्पात पूरी तरह से ठण्डा नहीं हो जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि 0.2% कार्बन वाले इस्पात में 723°C से 825°C के मध्य संरचनात्मक परिवर्तन होता है।

क्रान्तिक तापमान (Critical Temperatures)

वह तापमान जिस पर धातु या इस्पात के आन्तरिक गुणों में परिवर्तन होना शुरू होता है और परिवर्तन होना समाप्त होता है। उसे क्रान्तिक ताप (Critical Temperatures) कहते हैं। यह तापमान 723°C से 825°C तक होता है।
इसमें ठण्डा करते समय जो क्रान्तिक तापमान मिलते हैं, वे गर्म करते समय मिले क्रान्तिक तापमान से 20°C से 30°C तक कम होते हैं।
इन दोनों बिन्दुओं (निचले और ऊपरी क्रान्तिक बिन्दुओं) के बीच की तापमान रेंज को क्रान्तिक तापीय रेंज कहते हैं।
सभी प्रकार के इस्पातों के लिए वह तापमान जिस पर उसके आन्तरिक गुणों में परिवर्तन शुरू होता है, उसे निम्न क्रान्तिक बिन्दु (Lower Critical Point) कहते हैं।

वह तापमान जिस पर इस्पात या धातु के आन्तरिक गुणों में परिवर्तन होना समाप्त होता है, उसे उच्च क्रान्तिक बिन्दु (Upper Critical Point) कहते हैं।

यह इस्पात में कार्बन की मात्रा के अनुसार बदलता रहता है। 0.83% कार्बन वाले इस्पात में केवल एक ही क्रान्तिक बिन्दु होता है क्योंकि इसमें संरचनात्मक परिवर्तन इस एक ही तापमान पर होता है।

ऊष्मा उपचार के समय इस्पात में कार्बन की मात्रा का प्रभाव (Carbon Effects in Steel of Heat Treatment Time)

अलग-अलग कार्बन की मात्राओं वाले इस्पातों को जब गर्म किया जाता है तो उनकी आन्तरिक संरचनाओं में परिवर्तन होते हैं।
जब 0.83% तक कार्बन वाले इस्पातों को गर्म किया जाता है तो लगभग 723°C तापमान पर उसकी आन्तरिक संरचना पूरी तरह से फेराइट तथा पियरलाइट से युक्त हो जाती है।
इसी प्रकार जब 0.83% से अधिक कार्बन वाले इस्पातो को गर्म किया जाता है तो लगभग 723°C पर ही उनकी संरचना पूरी तरह से पर्लाइट तथा सीमेंटाइट युक्त हो जाती है।
यदि कार्बन की मात्रा 0.83%इस्पात में मिली हो तो लगभग 723°C पर इसकी संरचना केवल पर्लाइट होती है।
यदि जब 0.83% से कम कार्बन वाले इस्पात को गर्म किया जाता है। उसमें कार्बन की मात्रा बढ़ती है और फेराइट की मात्रा घटती है और पर्लाइट की मात्रा बढ़ती जाती है। ऐसा जब होता है तब कार्बन 0.83% न हो जाये। 0.83% कार्बन होने पर केवल पर्लाइट रह जाता है और फेराइट समाप्त हो जाता है।
कार्बन की मात्रा इस्पात में 0.83% से जैसे-जैसे बढती जाती है, वैसे-वैसे पियरलाइट घटता जायेगा और सीमेंटाइट बढ़ता जाता है।
निम्न क्रान्तिक तापमान (723°C ) सभी इस्पातों के लिए समान होता है अर्थात कार्बन की मात्रा का इस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। इसके विपरीत उच्च क्रान्तिक तापमान सभी इस्पातों के लिए कार्बन की मात्रा अलग-अलग होती है।
0.83% कार्बन तक के इस्पातों में कार्बन की मात्रा जितनी कम होती है, उच्च क्रान्तिक ताप उतना ही अधिक होगा। इसी तरह 0.83% कार्बन होने पर दोनों तापमान समान होंगे।

ऊष्मा उपचार क्यो आवश्यक है (Necessity of Heat Treatment)

ऊष्मा उपचार के लिए निम्नलिखित आवश्यकताएँ होती हैं
(1) यह धातु को मुलायम बनाता है, जिससे उस पर आसानी से मशीनन (Machining) की जा सके।
(2) कठोर की हुई वस्तुओं की भंगुरता कम करके चीमड़पन के गुण को बढ़ाता है।
(3) धातु के कणों को शुद्ध करता है। .
(4) कर्तन औजारों (Cutting Tools) में कठोरता का गुण लाने के लिए जिससे उससे दूसरी धातुओं को आसानी से काटा जा सकता है।
(5) विद्युत एवं यांत्रिक गुणों में सुधार करने के लिए।
(6) ऊष्मा तथा संक्षारण का प्रतिरोधी बनाने के लिए
(7) गर्म या ठण्डी अवस्था में धातु पर कार्य करते समय उसमें उत्पन्न प्रतिबलों (Stresses) को दूर करने के लिए।
(8) गैसों को निकालने के लिए।
(9) रासायनिक संघटन में परिवर्तन लाने के लिए।

अलौह धातुएं | Non Ferrous Metals In Hindi

इस पोस्ट में हम अलौह धातुएं | Non Ferrous Metals के बारे में जानेंगे अलौह धातुओं के प्रकार जैसे ताँबा ऐल्यूमीनियम लैड टिन जस्ता एवं लौह धातु तथा अलौह धातुओं में अन्तर |



अलौह धातुएं | Non Ferrous Metals

वह धातु जिसमें लौह कण नहीं पाए जाते हैं, उन्हें अलौह धातुएं कहते हैं |

इस प्रकार की धातुएं मुलायम, धातुवर्धनीय एवं तन्य होती हैं, जैसे तांबा एल्यूमीनियम जस्ता लेड टिन आदि |

अलौह धातुओं के प्रकार | Types Of Non Ferrous Metals

अलौह धातुएं मुख्यत: पांच प्रकार की होती हैं जो निम्नलिखित हैं |

  1. ताँबा (Copper)
  2. ऐल्यूमीनियम (Aluminium)
  3. लैड (Lead)
  4. टिन (Tin)
  5. जस्ता (Zinc)


 ताँबा (Copper)

ताँबा मुख्य रूप से कॉपर पाइराइटीज नामक अयस्क से प्राप्त किया जाता है। 

इसको अयस्क के रूप में खानों से प्राप्त किया जाता है। जब इसे खानों से प्राप्त किया जाता है, उस समय इसमें 33% तक ताँबा होता है। इसको भट्टी के द्वारा साफ करके ताँबा प्राप्त किया जाता है। 

यह एक विशेष प्रकार के भूरे लाल रंग की चमकदार मुलायम धातु होती है 

इसमें तन्यता, धात्वर्धनीयता का गुण होता है, इसके कारण इसके तार और चादर बनाई जा सकती हैं। 

यह ताप और विद्युत की सुचालक होती है। 

ताँबा (Copper) का गलनांक 1083°C होता है तथा इसका आपेक्षिक घनत्व 8.93 होता है। 

इसको आसानी से सोल्डरिंग किया जा सकता है। इसको अनिलिंग (Annealing) किया जा सकता है। 

इसके तार की तनन सामर्थ्य 3.15 से 4.72 मीटरी टन /से.मी. होती है। 

 ताँबा (Copper) का उपयोग (Use Of Copper) 

 ताँबे का अधिकतर उपयोग भाप के पाईप, ट्यूब, रिवेट, तार, विभिन्न प्रकार के विद्युत उपकरण, गहने आदि बनाने में किया जाता है। इसके अलावा टिन और जस्ते के साथ मिलाकर कई प्रकार के एलॉय बनाये जाते हैं। 


 ऐल्यूमीनियम (Aluminium)

ऐल्यूमीनियम को बॉक्साइड अथवा एल्युमिना अयस्क से प्राप्त किया जाता है। इसको विद्युत भट्टी में साफ करके ऐल्यूमीनियम प्राप्त किया जाता है। 

यह हल्के नीले रंग की मुलायम तथा हल्की धातु होती है। यह तन्य तथा धातुवर्धनीय होती है।

ऐल्यूमीनियम (Aluminium) का गलनांक 658°C तथा आपेक्षिक घनत्व 2.7 होता है। यह ऊष्मा तथा विद्युत की चालक होती है। यह चुम्बकीय नहीं होती है। 

इसकी तनन सामर्थ्य कम (0.95से. 1.57 मीटरीटन/से.मी.). होती है। 

यह 100°C से150°C तक भंगुर तथा धातुवर्धनीय होती है। 

 ऐल्यूमीनियम (Aluminium) का उपयोग (Use Of Aluminium)

इसका अधिकतर उपयोग हवाई जहाज के पुर्जे (Parts), ऑटोमोबाइल पुर्जे (Parts), घरेलू बर्तन, विद्युत तार, चादर आदि बनाने के लिए किया जाता है । इसके अलावा इसका उपयोग पेंट बनाने के लिए किया जाता है। . 


लैड (Lead)

लैड मुख्य रूप से गैलेना (Galena) नामक अयस्क से प्राप्त किया जाता है। 

यह नीलापन लिए ग्रे श्वेत (Blue Grey White) रंग का होता है। 

इस पर पानी तथा अम्लों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। - यह मुलायम, धातुवर्धनीय तथा तन्य धातु होती है तथा यह अधिक भारी धातु होती है। 

लैड (Lead) का गलनांक 327°C होता है तथा इसका आपेक्षिक घनत्व 11.3 होता है। 

लैड (Lead) का उपयोग (Use Of Lead)

 इसका अधिकतर उपयोग बन्दूक की गोलियाँ, बैटरी के सैल, विद्युत तारों के कवर, लैड पेंट तथा एलॉय बनाने के लिए किया जाता है। 


 टिन (Tin)

यह मुख्य रूप से टिन स्टोन (Tin Stone) नामक अयस्क से बनाया जाता है। 

यह चाँदी के समान चमकीली सफेद रंग की नरम धातु होती है। इसमें धातुवर्धनीयता तथा तन्यता का गुण होता है | 

टिन (Tin) का गलनांक 230°C होता है। इस पर वायु तथा अम्लों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। 

यह 100°C पर अधिक तन्य तथा धातुवर्धनीय हो जाती है, जिससे इससे पत्र बनाए जा सकते हैं तथा तार खींचे जा सकते हैं। 

टिन (Tin) का उपयोग (Use Of Tin)

 इसका उपयोग लोहे की चादरों पर टिन का लैप चढ़ाने के लिए, डिब्बे, कनस्तर, संदूक, टिन पन्नी (Tin Foil) जो सिगरेट लिपेटने के काम आती है, पीतल के बर्तनों पर कलई करने, टिन कोटिंग तथा विभिन्न प्रकार के एलॉय बनाने के लिए किया जाता है। 


जस्ता (Zinc)

जस्ता मुख्य रूप से जिंक सल्फाइड और जिंक कार्बोनेट नामक अयस्कों से प्राप्त किया जाता है। 

यह हल्के नीले रंग की धातु होती है। 

जस्ता (Zinc) का गलनांक 420°C तथा आपेक्षिक घनत्व 7.1 होता है। यह 100°C से 150°C तापमान के बीच तन्य होता है। 

लोहे की चादरों की जंग से बचाने के लिए लेप द्वारा पतली परत चढ़ाने के लिए प्रयोग किया जाता है। 

यह भंगुर होता है परन्तु गर्म करने पर धातुवर्धनीय हो जाता है इसलिए इसको रोलिंग भी किया जा सकता है। 

इस पर अम्ल/तेजाब का असर जल्दी पड़ता है। 

जस्ता (Zinc) का उपयोग (Use Of Zinc)

 इसका अधिकतर उपयोग धातुओं पर कोटिंग करने, जिंक पेंट बनाने तथा एलॉय बनाने में किया जाता है। 


लौह धातु तथा अलौह धातुओं में अन्तर (Differance Between Ferrous Metal and Non Ferrous Metal)


लौह धातुएँ (Ferrous Metal) 

(1) इनमें लोहे की मात्रा उपस्थित होती है। 

(2) ये कम सिकुड़ती हैं। 

(3) ये अधिकतर काले और ग्रे रंग की होती हैं। 

(4) इन पर जंग अधिक लगता है। 

(5) इनका गलनांक अधिक होता है। 

(6) लोहा, इस्पात तथा इसके मिश्रण इस वर्ग में आते है। (7) ये ठण्डी स्थिति में भंगुर होती है। 


अलौह धातुएँ (Non Ferrous Metal)

 (1) इनमें लोहे की मात्रा नहीं होती है। 

(2) ये अधिक सिकुड़ती हैं। 

(3) ये अलग-अलग रंगों में पायी जाती हैं।

(4) इन पर जंग नहीं लगता है। 

(5) इनका गलनांक अपेक्षाकृत कम होता है। 

(6) ताँबा, ऐल्यूमीनियम, लैड, जस्ता, टिन इस वर्ग में आते हैं। 

(7) ये गरम अवस्था में भंगुर होती है। 


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मिश्रित इस्पात/स्टील (Alloy Steel In Hindi)

 

इस पोस्ट में हम मिश्रित इस्पात/स्टील (Alloy Steel) और मिश्रित स्टील के प्रकार जैसे निकल इस्पात क्रोमियम इस्पात वेनेडियम इस्पात कोबाल्ट इस्पात टंगस्टन इस्पात मैंगनीज इस्पात स्प्रिंग इस्पात उच्च गति इस्पात आदि के बारे में जानेंगे|



is post mein ham mishrit ispaat/steel (alloy Steel) aur mishrit steel ke prakaar jaise nikal ispaat kromiyam ispaat venediyam ispaat kobaalt ispaat tangastan ispaat mainganeej ispaat spring ispaat uchch gati ispaat aadi ke baare mein jaanenge |

मिश्रित इस्पात/स्टील (Alloy Steel)

इस्पात में आवश्यकतानुसार गुण लाने के लिए कार्बन के अलावा अन्य दूसरे मिश्रण तत्व मिलाए जाते हैं। इनके मिलाने से अनेक प्रकार का मिश्रित इस्पात (Alloy Steel) बनाया जा सकता है। 

मिश्रित इस्पात/स्टील के प्रकार(Types of Alloy Steel)

 मिश्रित इस्पात (Alloy Steel) निम्नलिखित 8 प्रकार की होती  है |

(1) निकल इस्पात (Nickel Steel)
(2) क्रोमियम इस्पात (Chromium Steel)
(3) वेनेडियम इस्पात (Vanadium Steel)
(4) कोबाल्ट इस्पात (Cobalt Steel)
(5) टंगस्टन इस्पात (Tungsten Steel)
(6) मैंगनीज इस्पात (Manganese Steel)
(7) स्प्रिंग इस्पात (Spring Steel)
(8) उच्च गति इस्पात (High Speed Steel)

 निकल इस्पात (Nickel Steel) 

इस्पात और निकल के मिश्रण को निकल इस्पात कहते हैं। इसमें निकल ही मुख्य मिश्रण तत्व होता है। इसको मिलाने से इस्पात की कठोरता और सामर्थ्य बढ़ जाती है। 
5% वाली निकल इस्पात में कठोरता और प्रत्यास्थता का गुण होता है। 
यदि निकल की मात्रा इस्पात में 27% से अधिक मिलाकर जाये तो इस्पात अचुम्बकीय हो जाता है। 
36% निकल इस्पात को इनवार इस्पात कहते हैं। 
निकल इस्पात/स्टील में कार्बन की मात्रा 0.2% से 0.7% तक होती है|
निकल इस्पात/स्टील (Steel) का उपयोग सूक्ष्ममापी यंत्र बनाने के लिए किया जाता है। 

क्रोमियम इस्पात (Chromium Steel) 

क्रोमियम मिलाने से इस्पात की कठोरता, सामर्थ्य (Strength) और चिमड़पन (Toughness) बढ़ती है। 
जिस इस्पात में 6% निकल और 12% क्रोमियम होती है कर अचुम्बकीय इस्पात होता है, इसे स्टेनलैस इस्पात के नाम से भी जाना जाता है। 
जिस इस्पात में 2% कार्बन, 8% क्रोमियम 3.2% निकल मिली होती है, उससे गियर तथा अन्य औजार बनाये जाते हैं। 
क्रोमियम इस्पात का अधिकतर उपयोग स्टेनलैस इस्पात तथा अन्य वैज्ञानिक उपकरण बनाने के लिए किया जाता है। 

 वेनेडियम इस्पात (Vanadium Steel) 

कार्बन इस्पात में वेनेडियम तत्व को मिलाने से वेनेडियम इस्पात बनता है और इसमें चिमड़पन (Toughness) का गुण आ जाता है। 
यदि वैनेडियम को उच्च कार्बन इस्पात के साथ मिलाया जाये तो इससे बने कर्तन औजारों (Cutting Tools) की कर्तन धार (Cutting Edge) अधिक समय तक टिकाऊ बनी रहती है। 
वेनेडियम इस्पात का अधिकतर उपयोग स्पैनर बनाने में किया जाता है। 

 कोबाल्ट इस्पात (Cobalt Steel)

कोबाल्ट को उच्च गति इस्पात में मिश्रित किया जाता है जिससे इससे बने कर्तन औजारों (Cutting Tools) की कतन (Cutting Edge) अधिक समय तक टिकाऊ रहती है। 
यदि उच्च कार्बन इस्पात में 30% से अधिक कोबाल्ट दिया जाए तो वह स्थायी चुम्बक बन जाता है। इसमें वायु कठोरण का गुण आ जाता है। 

 टंगस्टन इस्पात (Tungsten Steel)  

कार्बन इस्पात में टंगस्टन मिलाने से इसकी कठोरता (Hardness) बढ़ जाती है। 
इस्पात में टंगस्टन की मात्रा अधिक रखने इतना कठोर हो जाता है कि इसके ऐसे औजार बनाने के लिए किया जाता है, जिनको उच्च गति पर चलाना होता है, जैसे-कटर आदि।
यदि इसमें 20% तक टंगस्टन मिलाया जाता है। 
तो इस प्रकार के इस्पात का उपयोग उच्च गति कर्तन औजार बनाने के लिए किया जाता है। 

 मैंगनीज इस्पात Manganese Steel)

इस्पात में मैंगनीज मिलाया जाये तो इसकी कठोरता बहुत अधिक बढ़ जाती है। 
यदि इस्पात में 15% मैगनीज मिला दिया जाय तो वह इतनी कठोर हो जाती है कि इसकी मशीनन (Machining) करना असम्भव होता है। 
इस प्रकार के इस्पात का उपयोग बड़े साइज के कर्तन औजार (Cutting Tools) बनाने में किया जाता है। 

 स्प्रिंग इस्पात (Spring Steel)

इस प्रकार का इस्पात बनाने के लिए 0.3% से 0.4% वाली कार्बन इस्पात में 8% क्रोमियम, 7% मैंगनीज और 2% सिलिकन मिलाया जाता है। 
इस प्रकार के इस्पात का उपयोग विभिन्न साइज तथा आकृति के स्प्रिंग बनाने में किया जाता है। 

उच्च गति इस्पात (High Speed Steel)

उच्च गति इस्पात को बनाने के लिए इस्पात में 0.7% कार्बन, . 18% टंगस्टन, 4% क्रोमियम, 1% वेनेडियम मिलाया जाता है। 
यदि इसमें 4% तक कोबाल्ट मिला दिया जाए तो इसकी | उच्च गति (High Speed) की क्वालिटी में सुधार हो जाता है। 

हाई स्पीड स्टील का उपयोग-लैथ, शेपर, प्लेनर, डिल, कटर, रीमर आदि बनाने में किया जाता है। 

कार्बन इस्पात तथा मिश्रित इस्पात में अन्तर (Differance Between Carbon Steel And Alloy Steel)

1. कार्बन इस्पात (Carbon Steel)

  •   इसको आसानी से मशीनन (Machining) किया जा सकता 
  •  इस प्रकार के इस्पात पर चुम्बक का प्रभाव पड़ता है। 
  •  इस प्रकार के इस्पात का गलनांक कम होता है।
  •  इस प्रकार के इस्पात एक समान कठोर नहीं किया जा सकता है। 
  •  इसमें धातुवर्धनीयता का गुण होता है।
  •  इस पर अम्लों/तेजाब का प्रभाव पड़ता है।
  •  इस प्रकार के इस्पात पर जंग लग सकता है। 
  •  इस प्रकार के इस्पात को कभी-कभी टैम्पर करने की आवश्यकता होती है।

2.  मिश्रित इस्पात (Alloy Steel) 

  • इस प्रकार के इस्पात को आसानी से मशीनन (Machining) व फाइलिंग नहीं किया जा सकता है। 
  • इस प्रकार के इस्पात पर चुम्बक का प्रभाव नहीं पड़ता है। 
  • इस प्रकार के इस्पात का गलनांक अधिक होता है।
  • इस प्रकार के इस्पात को एक समान कठोर किया जा सकता है। 
  • इसमें कठोरता तथा चिमड़पन का गुण होता है|
  • इस पर अम्ल/तेजाब का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। 
  • इस प्रकार के इस्पात पर जंग नहीं लगता है।
  • इस प्रकार के इस्पात को टैम्पर करना आवश्यक नहीं होता है। 

इस पोस्ट में हमने जाना मिश्रित इस्पात/स्टील (Alloy Steel) और मिश्रित स्टील के प्रकार, जैसे निकल इस्पात, क्रोमियम इस्पात, वेनेडियम इस्पात, कोबाल्ट इस्पात, टंगस्टन इस्पात, मैंगनीज इस्पात, स्प्रिंग इस्पात, उच्च गति इस्पात, आदि के बारे में |
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इस्पात(स्टील) के मिश्रण तत्व | Alloying Elements Of Steel In Hindi

 इस पोस्ट में हम इस्पात/स्टील के मिश्रा तत्वों के बारे में जानेंगे जैसे निकल, क्रोमियम, टंगस्टन, वैनेडियम, मैग्नीज, कोबाल्ट, मोलिब्डेनम, आदि |

Is Post Mein Ham Ispaat/Steel Ke Mishra Tatvon Ke Baare Mein Jaanenge Jaise Nikal, Chromium, Tangastan, Vainediyam, Maigneej, Cobalt, Molibdenam, Aadi |

इस्पात(स्टील) के मिश्रण तत्व | Alloying Elements Of Steel In Hindi


स्टील में मुख्यतः सात तत्वों का मिश्रण किया जाता है जो निम्नलिखित हैं |
  1. निकल (Nickel)
  2. क्रोमियम (Chromium)
  3. टंगस्टन (Tungsten)
  4. वैनेडियम (Vanadium) 
  5. मैग्नीज (Manganese)
  6. कोबाल्ट (Cobalt)
  7. मोलिब्डेनम (Molybdenum)

(1) निकल (Nickel)

यह हल्के पीले रंग का तत्व होता है, यदि इसकी धातु में 5% मात्रा मिला दी जाए तो धातु में कठोरता तथा सामर्थ्यता का गुण बढ़ जाता है एवं धातु की तन्यता के गुण पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। 

यदि धातु में इसकी 10 से 25% मात्रा मिला दी जाए तो धातु भंगुर हो जाती है। 


धातु में 25% निकल मिलाने से धातु चिमड़ (Tough) हो जाती है और उस पर जंग नहीं लगती है। 

धातु में 27% निकल मिलाने से धातु अचुम्बकीय बन जाती है। 

धातु में 36% निकल मिलाने पर यह इनवार इस्पात बन जाती है।

 निकल का गलनांक 1450°C होता है। 

(2) क्रोमियम (Chromium)

यह सफेद रंग तथा नीली झलक वाला तत्व होता है। 

इसको इस्पात में मिलाने से इस्पात की कठोरता तथा तनन सामर्थ्य बढ़ जाती है। 

इसको इस्पात में 5 से 10% तक मिलाने से इस्पात में प्रत्यास्था, तन्यता तथा बियरिंग क्वालिटी बढ़ जाती है। 

क्रोमियम का गलनांक 1380°C तक होता है।

 (3) टंगस्टन (Tungsten)

 यह ग्रे रंग का तत्व होता है। 

इसको इस्पात में थोड़ा-सा भी मिलाने पर इस्पात की कठोरता बढ़ जाती है। 

टंगस्टन का गलनांक 3400°C तक होता है। इसका गलनांक अधिक होने के कारण इससे बल्व के फिलामैन्ट बनाये जाते हैं। 

यदि इस्पात में 8% टंगस्टन मिला दिया जाये तो यह मिश्रण इतना कठोर हो जाता है कि शीशे को भी खुरच सकता है। 

यदि इस्पात में 15% टंगस्टन मिला दिया जाये तो इस मशीनन (Machining) नहीं की जा सकती है। 


(4) वेनेडियम (Vanadium) 

यह ग्रे तथा सफेद रंग का तत्व होता है। 

इसको इस्पात में मिलाने से इस्पात में धातुवर्धनीयता और कठोरता बढ़ जाती है। 

इसे इस्पात में 5% मिलाने से इस्पात की तनन सामर्थ्य, प्रत्यास्थता सीमा और फटीग रजिस्टैन्स बढ़ जाता है। 

इसे इस्पात में 15% मिलाने से इस्पात में स्प्रिंगनैस का गुण आ जाता है। 

वेनेडियम का गलनांक 1720°C होता है।

 (5) मैंगनीज (Manganese)

यह सफेद रंग और रेडिश झलक वाला तत्व होता है। 

इसको निम्न कार्बन इस्पात(Low Carbon Steel) में 1.5% मिलाने पर इस्पात कठोर तथा चिमड़ (Tough) हो जाता है। 

इसको 5% तक इस्पात में मिलाने से इस्पात कठोर, भंगर और अचुम्बकीय हो जाता है। 

यदि इसको 11% से 15% तक इस्पात में मिला दिया जाये तो इस्पात इतना कठोर हो जाता है कि इसकी मशीनन (machining) करना आसान नहीं होता है। 

मैंगनीज का गलनांक 1445°C होता है। 


(6) कोबाल्ट (Cobalt)

यह सफेद रंग का तत्व होता है। इसको इस्पात (स्टील)  मिलाने से इसकी चुम्बकीय शक्ति बढ़ जाती 

यदि इस्पात में 5% मिला दिया जाए तो इस्पात की हवा कठोरन (Air Hardning) हो जाती है तथा इस पर फाइलिंग नहीं की जा सकती है। 

यदि इस्पात में 35% कोबाल्ट मिलाने से इस्पात स्थायी चुम्बक बन जाता है और इसकी सामर्थ्य तीन गुणा बढ़ जाती है। 

कोबाल्ट का गलनांक 1480°C होता है। 

(7) मोलिब्डेनम (Molybdenum)

 यह सफेद रंग का तत्व होता है। 

इसको इस्पात में मिलाने से इस्पात की कठोरता तथा चिमड़पन (Toughness) बढ़ जाता है। 

इसे इस्पात में 10% तक मिलाया जाता है। इसको मिलाने से इस्पात झटके सहन करने योग्य बन जाता है और इसकी सामर्थ्य अधिक तापमान पर बढ़ जाती है। 


 इस पोस्ट में हमने जाना इस्पात/स्टील के मिश्रा तत्वों के बारे में जानेंगे जैसे निकल, क्रोमियम, टंगस्टन, वैनेडियम, मैग्नीज, कोबाल्ट, मोलिब्डेनम, आदि  के बारे में |

इससे संबंधित आपकी कोई शिकायत या सुझाव हो तो कृपया हमें कमेंट करें धन्यवाद |


इस्पात (स्टील) उत्पादन की विधियां | Manufacturing Process Of Steel In Hindi

 दोस्तों इस पोस्ट में हम जानेंगे इस्पात स्टील उत्पादन की विधियां जैसे  सीमेंटेशन प्रक्रम बेसेमर प्रक्रम क्रुसिबल प्रोसेस ओपन हर्थ प्रोसेस विद्युत प्रोसेस आदि के बारे में |

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इस्पात (स्टील) उत्पादन की विधियां | Manufacturing Process Of Steel 

इस्पात (स्टील) उत्पादन की मुख्यतः पांच विधियां प्रयोग में लाई जाती हैं जो निम्नलिखित हैं |

  1. सीमेंटेशन प्रक्रम (Cementation Process)
  2. बेसेमर प्रक्रम (Bessemer Process)
  3. क्रुसिबल प्रक्रम (Crucible Process)
  4. ओपन हर्थ प्रक्रम (Open Hearth Process)
  5. विद्युत प्रक्रम (Electric Process)


सीमेंटेशन प्रक्रम (Cementation Process)

इस विधि में पिटवा लोहे की एक छड़ को चारकोल के साथ भट्टी में डालकर लगभग 900 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान तक गर्म किया जाता है |

यह तापमान इस्पात की क्वालिटी के आधार पर 10 दिन तक रखा जा सकता है | इस प्रकार रखने से चारकोल की परत कार्बन के रूप में पिटवा लोहे की छड़ पर जम जाती है |

इसके बाद पिटवा लोहे की छड़ को ठंडा कर दिया जाता है, इससे जो स्टील प्राप्त होता है उसे बिलिस्टर इस्पात/स्टील (Blister Steel) कहते हैं |

शियर इस्पात/स्टील(Seyar Steel)

बिलिस्टर इस्पात के टुकड़ों को बोरेक्स और रेत/बालू के साथ पुणे गर्म किया जाता है और आपस में वेल्डिंग किया जाता है इसके बाद ड्राइंग के अनुसार संक्रिया करके विभिन्न आकारों में बदल दिया जाता है, इस प्रकार जो इस्पात बनाया जाता है उसे शियर इस्पात/स्टील कहते हैं |

दोहरा शियरिंग इस्पात/स्टील(Double Sharing Steel)

यदि शियर इस्पात को गर्म किया जाए तो जो इस्पात बनेगा उसे दोहरा शियरिंग इस्पात कहते हैं |

इस प्रकार के इस्पात/स्टील का उपयोग अच्छे क्वालिटी के औजार एवं उपकरण बनाने के लिए किया जाता है |

बेसेमर प्रक्रम (Bessemer Process)

इस विधि में पिंगले हुए ढ़लवा लोहे को एक बेसेमर कनवर्टर में भरकर उसके ऊपर से गर्म वायु के झोंके छोड़े जाते हैं, जिसके कारण धातु से कार्बन तथा अन्य अशुद्धियां जलकर बाहर निकल जाती है |

बेसेमर कनवर्टर एक अंडे के आकार का बना होता है, जिसमें अंदर की तरफ अग्नि सह ईटों का अस्तर लगा होता है तथा इसके निचली सतह पर वायु के लिए सुराख या टियर्स लगे होते हैं |

इस कनवर्टर को चारों तरफ किसी भी कोण पर घुमाया जा सकता है | एक निश्चित कोण पर रखकर इसमें पिंगला हुआ ढलवा लोहा(Cast Iron) डाला और निकाला जा सकता है फिर इस कनवर्टर को सीधा करके टियर्स से हवा दी जाती है, जो बुलबुलों के रूप में धातु में से ऊपर निकलती है |

यह गर्म वायु के साथ क्रिया करके मिश्रित अशुद्धियों को ऑक्साइड में बदल देती है |

भट्टी से सेलेग आदि अशुद्धियों को चिमनी के द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है |

बेसेमर कनवर्टर का तापमान 2500 डिग्री सेल्सियस तक रखा जाता है, जिससे गंधक/सल्फर (Sulfer) तथा फास्फोरस की अशुद्धियां जल जाती है | इसके बाद इसको कुछ देर तक रोककर धातु का नमूना लेकर कार्बन मात्रा की जांच के लिए भेजा जाता है|

क्रुसिबल प्रक्रम (Crucible Process)

इस विधि में एक बर्तन क्रुसिबल के रूप में प्रयोग किया जाता है |

इस विधि में इसमें बिलिस्टर इस्पात के टुकड़ों को भरकर उच्च तापमान पर गर्म किया जाता है, जिससे इस्पात में उपस्थित  अशुद्धियां जलकर दूर हो जाती हैं |

इसके बाद पिंगले हुए स्टील को सांचों में भर दिया जाता है |

इस विधि से जो इस्पात प्राप्त होता है उसे ढलवा इस्पात (Cast Steel) कहते हैं |


ओपन हर्थ प्रक्रम (Open Hearth Process)

इस विधि से ढलवा इस्पात/Cast Steel अथवा कच्चे लोहे/Pig Iron को पिघला कर उसमें उपस्थित कार्बन तथा अन्य अशुद्धियों को दूर किया जाता है |

इस विधि से कार्बन मैग्नीज तथा सिलिकॉन को ऑक्सिडाइज करने के लिए लाल हेमेटाइट (Red Hematite) का प्रयोग किया जाता है इसके साथ फेरो मैग्नीज का भी प्रयोग किया जाता है |

इस विधि से इस्पात से भंगुरता का गुण खत्म करके इसे धातुवर्धक बनाया जाता है |

ओपन हर्थ (Open Hearth)

ओपन हर्थ एक प्रकार की आयताकार बाथ होती है, जिसके सामने वाले भाग में कई चार्जिंग दरवाजे होते हैं और इसके पीछे की तरफ एक टेपिंग छेद होता है |इसके नीचे एक रीजेनरेटिंग चेंबर होता है, जो वायु तथा गैस को जब इसमें प्रवेश कराया जाता है तो दोनों के मिलने पर फ्लेम उत्पन्न करता है जिसकी लो धीरे से नीचे की तरफ जाती है तथा बाथ की सतह को स्पर्श करती है और धातु से कार्बन और अन्य अशुद्धियों को जलाकर दूर कर देती है |

इसमें उपयोग में लाई फ्लेम अथवा लौ को दो सुराखों और चिमनी के रास्ते से बाहर निकाला जाता है | इस विधि में कच्चे लोहे के साथ इस्पात स्क्रैप का भी प्रयोग किया जा सकता है |

इस विधि में रासायनिक क्रिया धीमी होने के कारण अच्छा नियंत्रण संभव होता है |

इस विधि में जब उचित कार्बन रह जाता है तो प्रक्रम को बंद किया जा सकता है |

विद्युत प्रक्रम (Electric Process)

इस विधि का प्रयोग इस्पात (Steel) को जल्दी बनाने के लिए किया जाता है |

इस विधि का उपयोग साफ पिंगली हुई धातु की अंतिम रिफायनिंग करने के लिए तथा इस्पात में विशेष गुण लाने के लिए तथा मिश्रित तत्वों को बढ़ाने के लिए विद्युत प्रक्रम का प्रयोग किया जाता है |

इस विधि से कार्बन इस्पात के साथ दूसरे मिश्रण तत्व बढ़ाए जाते हैं |

इस प्रक्रम में विद्युत भट्टी का प्रयोग किया जाता है, जिसमें कार्बन इलेक्ट्रोड प्रयोग किए जाते हैं इन इलेक्ट्रोडो के द्वारा विद्युत तरंगें भट्टी में प्रवेश करती हैं |

इस भट्टी को चलाने के लिए अधिकतर प्रत्यावर्ती धारा (A.C.) प्रयोग में लाई जाती है |

यह भट्टी अंदर से डोलोमाइट या मैग्नेसाइट अथवा अग्नि सह ईटों की बनी होती है |

इस भट्टी के ऊपर एक ढक्कन लगा होता है, जिसमें इलेक्ट्रॉड डालने के लिए एक छेद बना होता है |

इस भट्टी में कच्चा लोहा तथा लौह चूर्ण डाला जाता है तथा इलेक्ट्रॉड को धारा देने के बाद विद्युत और उत्पन्न किया जाता है इस इलेक्ट्रॉड के द्वारा लगभग 2000 डिग्री सेल्सियस ताप तक प्राप्त किया जाता है इस विधि से 2 स 180 टन धातु बनाने के लिए 1 से 5 घंटे का समय लगता है |

इस भट्टी का पेंदा अर्ध गोल होने की कारण इसे रोलर्स पर सरलता से घुमाकर 15 डिग्री के कोण पर टेढ़ा करके धातु को उड़ेल दिया जाता है |

इसका एक छेद (Hole) स्लेग को बाहर निकालने के लिए तथा दूसरा छेद शुद्ध धातु को बाहर निकालने के लिए होता है|

इस पोस्ट में हमने जाना इस्पात स्टील उत्पादन की विधियां जैसे  सीमेंटेशन प्रक्रम, बेसेमर प्रक्रम, क्रुसिबल प्रोसेस, ओपन हर्थ प्रोसेस, विद्युत प्रोसेस, आदि के बारे में | 

आपका इस पोस्ट से संबंधित कोई शिकायत या सुझाव है तो कृपया हमें कमेंट करें धन्यवाद


ढलवा लोहा | ढलवा लोहे के प्रकार, और उपयोग | Cast Iron And Types Of Cast Iron

 

Is Post Mein Ham Jaanenge Dhalava Loha Aur Dhalava Lohe Ke Gun, Dhalava Lohe Ka Upayog Evam Dhalava Lohe Kee Utpaadan Vidhi, Kyoopola Bhattee (Chupol Furnachai)Aur Dhalava Lohe Kee Seejaning



दोस्तों इस पोस्ट में हम जानेंगे ढलवा लोहा और ढलवा लोहे के गुण, ढलवा लोहे का उपयोग एवं ढलवा लोहे की उत्पादन विधि, क्यूपोला भट्टी (Cupola Furnace)और ढलवा लोहे की सीजनिंग (Seasoning Of Cast Iron) आदि के बारे में |

ढलवा लोहा (Cast Iron)

ढलवा लोहे को अंग्रेजी भाषा में कास्ट आयरन Cast-Iron  कहा जाता है |
ढलवा लोहे में कार्बन की मात्रा दो रूपों में पाई जाती है-एक फ्री कार्बन तथा दूसरी संयुक्त कार्बन
जिस ढलवा लोहे में संयुक्त कार्बन अधिक होता है, वह कठोर होता है और उसके उपर आसानी से मशीनन (Machining) नहीं किया जा सकता है|
तथा जिस ढलवा लोहे में फ्री कार्बन की मात्रा अधिक होती है वह मुलायम होता है और इसी आसानी से मशीनन किया जा सकता है |

ढलवा लोहा किस भट्टी से प्राप्त होता है

ढलवा लोहा क्यूपोला भट्टी (Cupola Furnace) से प्राप्त होता है |
कच्चे लोहे (Pig Iron) और ढलवा लोहे की स्क्रैप को कोयले तथा चूना पत्थर के साथ क्यूपोला भट्टी (Cupola Furnace) मैं निश्चित अनुपात में भरकर 1250 डिग्री सेंटीग्रेड 1350 डिग्री सेंटीग्रेड तक गर्म करके प्राप्त किया जाता है, जिसे सांचों में भरकर एकत्रित कर लिया जाता है |

क्यूपोला भट्टी (Cupola Furnace)

क्यूपोला एक प्रकार की ऐसी भट्टी होती है, जिसको मृदु इस्पात (Mild Steel) की प्लेटों से बनाया जाता है और इसके आंतरिक भाग पर अग्निसह ईटों (Fire Brtcks) का अस्तर लगाया जाता है |
क्यूपोला भट्टी की ऊंचाई 5 मीटर से 10 मीटर तथा व्यास 1 मीटर से 3 मीटर तक होता है|
इस भट्टी को बनाने के लिए 6 मिली मीटर से 10 मिली मीटर तक मृदु इस्पात की चादर काम में ली जाती है |
इस भट्टी के अंदर कच्चा लोहा (Pig Iron) और ढलवा लोहे की स्क्रेप, कोयला और चूने के पत्थर को 2:4:1 के अनुपात में डालकर 1250 डिग्री सेंटीग्रेड से 350 डिग्री सेंटीग्रेड तक गर्म किया जाता है | गर्म होने से लोहा पिघलता है, इस पिंगले हुए लोहे को सांचों में भर दिया जाता है | यही ढलवा लोहा (Cast Iron) होता है |
क्यूपोला भट्टी से एक बार में 2 से 4 टन तक ढलवा लोहा तैयार किया जा सकता है |

क्यूपोला भट्टी की कार्यविधि (Functions Of Oupola Furnace)

इस भट्टी में कच्चे लोहे को धातु चिप्स के रूप में डालते हैं |
इसमें सबसे पहले भट्टी के पेंदे में आग जलाकर इसे चार्ज कर लिया जाता है | इसके बाद कोयले की एक परत डाली जाती है |
तथा इसके बाद धातु और लोहा चिप्स की एक परत और बाद में तूने पत्थर की एक परत लगाकर 1350 डिग्री सेंटीग्रेड तक गर्म किया जाता है |
भट्टी के गर्म होने पर कच्चा लोहा पिघलता है और नीचे बैठ जाता है तथा बाकी अशुद्धियां ऊपर आ जाती हैं |
अब इस पिंगले हुए लोहे को सांचों में ढाल दिया जाता है |और इस प्रकार हमें ढलवा लोहा प्राप्त होता है |
भट्टी से प्राप्त ढलवा लोहे में 2 से 4% तक कार्बन रहता है तथा इसके अलावा 0.8 से 3% सिलिकन,0.5% फास्फोरस, 0.1% से 0.2% तक गंधक तथा 0.5% से 1% तक मैग्नीज की अशुद्धियां मिली हुई रहती हैं |

ढलवा लोहे की गुण (Properties Of Cast Iron)

ढलवा लोहे में पाये जाने वाले गुण निम्नलिखित हैं
  • ढलवा लोहा भंगूर प्रकृति का होता है |
  • इस में कार्बन की मात्रा 2% से 4% तक होती है|
  • इसको फोर्ज नहीं किया जा सकता है|
  • इसमें जंग लगने की संभावना कम होती है |
  • इसमें आघातवर्धनीयता तथा तन्यता का गुण नहीं पाया जाता है |
  • इस का गलनांक लगभग 1150 डिग्री सेंटीग्रेड से 1200 डिग्री सेंटीग्रेड तक होता है |
  • इसमें खिंचाव शक्ति कम तथा दबाव शक्ति अधिक होती है|
  • कास्ट आयरन खारे पानी में मुलायम हो जाता है |
  • यह ठंडा होने पर सिकुड़ता है |
  • ढलवा लोहे में प्रत्यास्थता का गुण नहीं होता है |
  • यह आघात या चोट सहन नहीं कर सकता है |
  • ढलवा लोहे का तनन सामर्थ्य कम होता है |
  • इसमें तनन सामर्थ्य लगभग 1.26 से 1.57 भीतर टन/ सेंटीमीटर होता है |

ढलवा लोहे का उपयोग (Use Of Cast Iron)

ढलवा लोहा/कास्ट आयरन के मुख्य उपयोग निम्नलिखित हैं|
  1. कास्ट आयरन का अधिकतर उपयोग मशीन के आधार (Base) एवं अन्य पुर्जे बनाने के लिए किया जाता है |
  2. इसका उपयोग इंजन तथा अन्य ऑटोमोबाइल पुर्जे (Parts) बनाने में किया जाता है |
  3. ढलवा लोहे का उपयोग वॉइस, बी ब्लॉक, तथा सरफेस प्लेट आदि बनाने के लिए भी किया जाता है |

ढलवा लोहे के प्रकार (Types Of Cast Iron)

ढलवा लोहा पांच प्रकार का होता है| जो निम्नलिखित हैं |
  1. सलेटी ढलवा लोहा (Grey Cast Iron)
  2. वाइट ढलवा लोहा (White Cast Iron)
  3. मोटल्ड ढलवा लोहा (Mottled Cast Iron)
  4. आघातवर्धनीय ढलवा लोहा (Malleable Cast Iron)
  5. चिल्ड ढलवा लोहा (Chaild Cast Iron)

सलेटी ढलवा लोहा (Grey Cast Iron)

यह ढलवा लोहा सलेटी (Grey) रंग का होता है |
इसमें कार्बन की मात्रा 3% से 4% तक होती है, जिससे फ्री कार्बन की अपेक्षा संयुक्त कार्बन कम होता है |
सलेटी ढलवा लोहा दूसरे प्रकार के ढलवा लोहे की अपेक्षा कम नरम होता है, तथा इस पर आसानी से मशीनिंग क्रिया की जा सकती है |

सलेटी ढलवा लोहे का उपयोग

इसका अधिकतर उपयोग मशीनों के बेड और फ्रेम, सिलेंडर, तथा पाइप आदि बनाने में किया जाता है |

वाइट ढलवा लोहा (White Cast Iron)

यह ढलवा लोहा सफेद रंग का होता है |
इस में कार्बन की मात्रा 2% से 4% तक होती है |
इसमें फ्री कार्बन की अपेक्षा संयुक्त कार्बन की मात्रा अधिक होती है |
सलेटी ढलवा लोहे की अपेक्षा यह अधिक कठोर होता है इसलिए इस पर आसानी से मशीनिंग क्रिया नहीं की जा सकती है |
यह कम घिसता है |

सलेटी ढलवा लोहे का उपयोग

इसका अधिकतर उपयोग पिटवा लोहा (Wrought Iron) बनाने के लिए किया जाता है |

मोटल्ड ढलवा लोहा (Mottled Cast Iron)

इस तरह के ढलवा लोहे में कठोरता तथा सामर्थ्य का गुण मध्यम होता है |
इस लोहे में फ्री कार्बन की मात्रा तथा संयुक्त कार्बन की मात्रा बराबर बराबर होती है |

मोटल्ड ढलवा लोहे का उपयोग

इसका उपयोग ऐसे पुर्जे बनाने के लिए किया जाता है, जिन पर मशीनिंग क्रिया आसानी से की जा सके |
तथा उनकी कठोरता और सामर्थ्यता भी बनी रहे |

आघातवर्धनीय ढलवा लोहा (Malleable Cast Iron)

आघातवर्धनीय ढलवा लोहे मैं भंगुरता के गुण को कम कर दिया जाता है | तथा इसकी आघातवर्धनीयता तथा टफनेस बढ़ा दी जाती है |
यह लोहा श्वेत ढलवा लोहे से बनाया जाता है |श्वेत ढलवा लोहे को इस्पात के बॉक्स में लोह आक्साइड के साथ 900 डिग्री सेंटीग्रेड से 950 डिग्री सेंटीग्रेड ताप तक गर्म किया जाता है |
यह तापमान ढलाई के अनुसार 5 से 30 घंटे तक रखा जा सकता है |
इस प्रकार जो ढलवा लोहा प्राप्त होता है वह मुलायम और टफ होता है |और इसमें सामर्थ्यता, आघातवर्धनीयता तथा तन्यता भी बढ़ जाती है |

आघातवर्धनीय ढलवा लोहे का उपयोग

इसका उपयोग हल्की ढलाईयो (Casting) के लिए किया जाता है |

चिल्ड ढलवा लोहा (Chaild Cast Iron)

इस लोहे को सलेटी ढलवा लोहे से बनाया जाता है |
इस लोहे को बनाने के लिए सलेटी ढलवा लोहे को दोबारा पिंगला कर ठंडे सांचों में भरकर एकदम ठंडा कर दिया जाता है |जिसके कारण ढलाई की बाहरी सतह कठोर हो जाती है|

चिल्ड ढलवा लोहे का उपयोग

इस प्रकार के ढलवा लोहे का उपयोग ऐसे मशीनिंग पुर्जे बनाने के लिए किया जाता है, जिन की बाहरी सतह कठोर रखनी होती है |

ढलवा लोहे की सीजनिंग (Seasoning Of Cast Iron)

सीजनिंग करने के लिए ढलाई (Casting) को खुले वातावरण में कई महीनों तक रखा जाता है, जिससे सर्दी गर्मी लगने से उसकी सीजनिंग हो जाती है |
सीजनिंग के पश्चात पुर्जे (Parts) के ऊपर दूसरे प्रकार की मशीनरी क्रियाएं की जा सकती है |

कास्ट आयरन की सीजनिंग क्यों आवश्यक है ?

ढलवा लोहे में कार्बन की मात्रा अधिक होने तथा दूसरी अशुद्धियां होने के कारण कास्टिंग करने के पश्चात पुर्जो में थोड़ा सा विरूपण (Distortion) आ सकता है इसलिए ढलाई (Casting) के बाद पुर्जो कि सीजनिंग करना आवश्यक होता है |


दोस्तों इस पोस्ट में हमने जाना ढलवा लोहा और ढलवा लोहे के गुण, ढलवा लोहे का उपयोग एवं ढलवा लोहे की उत्पादन विधि, क्यूपोला भट्टी (Cupola Furnace)और ढलवा लोहे की सीजनिंग (Seasoning Of Cast Iron) आदि के बारे में | आपको हमारा यह पोस्ट कैसा लगा अगर इस पोस्ट से संबंधित आपका कोई सुझाव या शिकायत है तो कृपया हमें कमेंट करें धन्यवाद |

लौह धातुएं (Ferrous Metals) क्या होती हैं |और कच्चा लोहा (Pig Iron)

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दोस्तों इस पोस्ट में हम जानेंगे लौह धातुएं (Ferrous Metals) क्या होती है | कच्चे लोहे (Pig Iron) का परिचय और उसे प्राप्त करने की विधि एवं लौह अयस्क के प्रकार तथा लोहे की शोधन विधि, वात्या भट्टी (Blast Furnace), कच्चे लोहे के गुण, एवं कच्चे लोहे के उपयोग

लौह धातुएं (Ferrous Metals)

वे सभी धातुएं जिनमें लोहे का अंश उपस्थित होता है लौह धातुएं कहलाती है |
इन धातुओं में लोहे के अंश के अलावा बहुत कम मात्रा में कार्बन, गंधक, मैगजीन, एवं फास्फोरस आदि तत्व भी उपस्थित होते हैं |
इस वर्ग में लोहा, इस्पात और इसकी एलॉय भी शामिल होते हैं|
जब दो या दो से अधिक लोह धातुओं को मिलाकर कोई मिश्रित धातु बनाई जाती है तो हम उसे लोह मिश्र धातु (Ferrous Alloy Metal) कहते हैं |
जैसे- टंगस्टन इस्पात, क्रोमियम इस्पात, निकिल इस्पात आदि |

कच्चा लोहा (Pig Iron)

कच्चा लोहा एक अशुद्ध लोहा होता है, जिसको सीधे किसी कार्य में प्रयोग नहीं लिया जा सकता है |
लोहे को खानों से खोदकर निकाला जाता है लेकिन खान से प्राप्त लोहा शुद्ध नहीं होता है इसके साथ बहुत सी अशुद्धियां मिली होती है | इन अशुद्धियों को गैंग (Gangue) कहते हैं |

लौह अयस्क (Iron Ore)

लोहे और गैंग की मिश्रण को लोहा अयस्क (Iron Ore) कहा जाता है |
लौह अयस्क (Iron Ore) एक खनिज पदार्थ होता है, जिसका उपयोग लोहे के उत्पादन में किया जाता है |

लौह अयस्क के प्रकार (Types Of Iron Ore )

लौह अयस्क कुल 5 प्रकार के होते हैं जो निम्नलिखित हैं |
  • हेमेटाइट (Haematite)
  • मैग्नेटाइट (Magnetite)
  • लिमोनाइट (Limonite)
  • साइडराइट (Siderite)
  • पायराइट (Pyrite)

हेमेटाइट (Haematite)

यह लोहे का एक लाल रंग का ऑक्साइड होता है |
इसमें लगभग 70% तक लोहा होता है |

मैग्नेटाइट (Magnetite)

यह लोहे का काले रंग का ऑक्साइड होता है |
इसमें लगभग 72 प्रतिशत लोहा होता है |

लिमोनाइट (Limonite)

यह लोहे का भूरे रंग का ऑक्साइड होता है |
इसमें लगभग 60% तक लोहा पाया जाता है |

साइडराइट (Siderite)

यह लौह अयस्क भी लोहे की भूरे रंग का ऑक्साइड होता है |
इसमें लगभग 48% तक लोहे की मात्रा उपस्थित होती है |

पायराइट (Pyrite)

इस लौह अयस्क का प्रयोग लोहे के उत्पादन में बहुत कम किया जाता है |
क्योंकि इस में लोहे की मात्रा 40% से कम पाई जाती है | तथा इससे लोहा प्राप्त करने के लिए अधिक खर्च आता है |

लोहे की शोधन विधि (Purification Method Of Iron)

लोहे की अशुद्धियों को चार विधियों के द्वारा अलग किया जा सकता है | जो निम्नलिखित हैं |
  1. सान्द्रण द्वारा (By Concentration)
  2. गुरुत्वाकर्षण द्वारा (By Gravity)
  3. चुंबकीय पृथक्करण द्वारा (By Magnetic System)
  4. स्मेल्टिंग द्वारा (By Smelting)

सान्द्रण द्वारा (By Concentration)

इस विधि में पहले लोहे के अयस्क को छोटे-छोटे टुकड़ों के रूप में तोड़ लिया जाता है फिर सांद्रण के द्वारा मिट्टी और दूसरी अशुद्धियों को साफ कर लिया जाता है |

गुरुत्वाकर्षण द्वारा (By Gravity)

गुरुत्वाकर्षण विधि के अनुसार लोहा अयस्क को तोड़कर छोटे-छोटे टुकड़ों में पीस लिया जाता है |इसके बाद इन टुकड़ों को बहते हुए पानी में डाल दिया जाता है, जिसके कारण अशुद्धियां हल्की होने के कारण पानी के साथ रह जाती हैं तथा लोहा भारी होने की कारण नीचे बैठ जाता है |

चुंबकीय पृथक्करण द्वारा (By Magnetic System)

इस विधि के अनुसार बारीकी से पिसे हुए लोहे के अयस्क को एक चुंबकीय पट्टे पर डाला जाता है |
यह चुंबकीय पट्टा दो पुलियो के द्वारा चलाया जाता है |
इस विधि में लोहे के कण चुंबकीय पट्टे के साथ चिपक जाते हैं तथा अशुद्धियां नीचे गिर जाती हैं |

स्मेल्टिंग द्वारा (By Smelting)

किस विधि के द्वारा लौह अयस्क को साफ करने के लिए वात्या भट्टी (Blast Furnace) का प्रयोग किया जाता है |
इस विधि में अशुद्धियां झाग के रूप में बाहर निकल जाती है | और शुद्ध लोहा एक तरफ एकत्रित हो जाता है |
इस विधि में लोह अयस्क को गाढ़ा करने के बाद वात्या भट्टी (Blast Furnace) के द्वारा पिंघलाकर कच्चा लोहा (Pig Iron) तैयार किया जाता है |

वात्या भट्टी (Blast Furnace)

यह भट्टी बनावट में चिमनी के आकार की होती है |इसका बाहरी भाग इस्पात की चादर (Sheet) से बना होता है एवं आंतरिक भाग में अग्नि सह ईटों (Fire Bricks) का स्तर बना होता है |
इस भट्टी की ऊंचाई लगभग 15 मीटर से 30 मीटर तक तथा इसका व्यास 5 मीटर से 8 मीटर तक होता है |
इस के निचले भाग में बाहर निकलने वाले मार्ग बने होते हैं,
जिसमे एक भाग से पिंगली हुई धातु तथा दूसरे भाग से स्लेग या गंदगी समय-समय पर बाहर निकलते हैं |
इस के निचले भाग से थोड़ा सा ऊपर वायु प्रवाह के लिए पाइप लगे होते हैं, जिनमें वायु पंखे या ट्वीयर्स के द्वारा दी जाती है |
इन पाइपों में से लगभग 700 डिग्री सेंटीग्रेड से 800 डिग्री सेंटीग्रेड तक की गरम वायु प्रवाहित होती है |
इनको पानी से ठंडा किया जाता है | वायु ईंधन को जलाने में सहायक होती है |
भट्टी के ऊपरी भाग से चार्ज को भेजने के लिए कप और कोन की व्यवस्था होती है | इस भाग से चार्ज अंदर जाता है और गर्म अशुद्ध गैस बाहर निकल जाती है |

चार्ज (Charge)

वात्या भट्टी में इंधन या चार्ज के रूप में लोहे के साथ कोयला और चूने के पत्थर का निश्चित अनुपात प्रयोग किया जाता है |

वात्या भट्टी की कार्यविधि (Functions Off Blast Furnace)

वात्या भट्टी के निचले श्री में लकड़ी जला कर ट्वीयर्स के द्वारा वायु को प्रवाहित किया जाता है और कप तथा कोन द व्यवस्था से लोहा, कोयला तथा चूने के पत्थर के मिश्रण को चार्ज के रूप में डालते हैं |
जैसे ही चार्ज भट्टी के निचले हिस्से में पहुंचता है तो उसे अधिक ऊष्मा मिलती है, जिससे जिससे लोहा पिंगल कर पेंदे में इकट्ठा हो जाता है तथा अशुद्धियां स्लेज के रूप में तैरने लगती है |
इसके बाद पिंगले हुए लोहे तथा स्लेग को अलग-अलग रास्तों से बाहर निकाल लेते हैं |
इस पिंगली हुई धातु को सांचों में भर कर ठंडा कर लिया जाता है इसे ही कच्चा लोहा (Pig Iron) कहते हैं |

कच्चे लोहे के गुण (Properties Of Pig Iron)

कच्चे लोहे में निम्नलिखित गुण पाए जाते हैं |
  • कच्चा लोहा निम्न स्तर (घटिया) का लोहा होता है |
  • यह लोहा कमजोर तथा भंगूर होता है |
  • इस में कार्बन तथा अन्य अशुद्धियां अधिक मात्रा में पाई जाती हैं |
  • कच्चे लोहे में 93% तक लोहा होता है तथा 4% तक कार्बन होता है | एवं शेष भाग में सल्फर, मैग्नीज, सिलिकन, और फास्फोरस अशुद्धियों के रूप में पाए जाते हैं |

कच्चे लोहे का उपयोग (Use Of Pig Iron)

जैसा कि हम जानते हैं कच्चे लोहे में कार्बन की मात्रा अधिक होती है तथा इसमें अन्य अशुद्धियां भी होती हैं |
इसलिए इसका सीधा प्रयोग मशीन पुर्जे (Machine Parts) बनाने में नहीं किया जाता है |
कच्चे लोहे का उपयोग दूसरे प्रकार के लोहे तथा इस्पात बनाने में किया जाता है | जैसे- ढलवा लोहा (Cast Iron), पिटवा लोहा (Wrought Iron) और इस्पात(Steel) आदि
बनाने में किया जाता है |

दोस्तों इस पोस्ट में हमने जाना लौह धातुएं (Ferrous Metals) क्या होती है | कच्चे लोहे (Pig Iron) का परिचय और उसे प्राप्त करने की विधि एवं लौह अयस्क के प्रकार तथा लोहे की शोधन विधि, वात्या भट्टी (Blast Furnace), कच्चे लोहे के गुण, एवं कच्चे लोहे के उपयोग के बारे में

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