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शीतलक (coolant) क्या है और इसके क्या लाभ है

 

दोस्तों इस पोस्ट में हम जानेंगे शीतलक (coolant) क्या होता है यह कितने प्रकार का होता है तथा इसके क्या लाभ हैं, शीतलक ओर स्नेहक मैं अंतर |

शीतलक (coolant)

जब हम किसी कार्यखण्ड या जॉब पर कटिंग का कार्य करते हैं तो बहुत अधिक ऊष्मा उत्पन्न होती है | इस ऊष्मा को अपने साथ बहाकर ले जाने वाले पदार्थ को हम शीतलक (coolant) कहते हैं |



अगर देखा जाए तो पानी एक अच्छा शीतलक (coolant) होता है और इसकी शीतल (cool) करने की क्षमता भी अच्छी होती है |
पानी का उपयोग उष्मा उपचार तथा रोलिंग कार्य में शीतलक के रूप में प्रयोग किया जाता है |
पानी एक सस्ता, आसानी से प्राप्त होने वाला, और ऊष्मा का अच्छा चालक तथा इसकी विशिष्ट ऊष्मा के आधार पर एक अच्छा शीतलक माना जाता है |
लेकिन पानी को जब हम शीतलक के रूप में प्रयोग करते हैं तो यह सावधानी बरतनी चाहिए की मशीन पर जंग नहीं लगे | इसके लिए सोडा वाटर मिश्रण को सस्ते शीतलक के रूप में प्रयोग करना चाहिए | यह सोडियम कार्बोनेट और पानी का मिश्रण होता है | जिसे गाढ़ा बनाने के लिए मुलायम साबुन मिला दिया जाता है | इसमें स्नेहन (lubricating) गुणों को बढ़ाने के लिए लॉर्ड तेल भी मिलाया जाता है |
टर्निंग, मीलिंग और ड्रिलिंग आदि संक्रियाओं (operations) के लिए सस्ते मिश्रण का प्रयोग किया जाता है | जिससे सोडियम कार्बोनेट लार्ड तेल तथा मुलायम साबुन बराबर बराबर मात्रा में मिलाकर शेष भाग में पानी को मिलाया जाता है, जिसे जलीय विलियन कहते हैं |

रासायनिक शीतलक (chemical coolant)

पानी के अंदर बहुत से रासायनिक अवयवों के घुले हुए मिश्रण को रासायनिक शीतलक कहते हैं | इनमें से कुछ अवयव स्नेहक (lubricant) के गुण को भी प्रदर्शित करते हैं |
शीतलक (coolant) का प्रवाह (flow) आंशिक शीतलन के द्वारा तन्यता (ductility) को कम करते हुए छीलन (chips) को तोड़ने का कार्य भी करता है |
शुद्ध शीतलक जंग निरोधक होते हैं |
रासायनिक शीतलको के उपयोग से मशीनन (machining) करते समय धातु को अधिक तेजी  से हटाया जा सकता है |
रासायनिक शीतलक अन्य शीतलको की तुलना में अधिक समय तक रहते हैं तथा छीलन (chips) को बैठने तथा प्राप्त करने में सहायक होते हैं |
केवल उन धातुओं को छोड़कर जिनमें शुष्क (dry) मशीनिंग लाभकारी होता है इनके अलावा सभी धातुओं में शीतलक (coolant) का प्रयोग किया जाता है |

शीतलक के लाभ (advantage of coolant)

अगर देखा जाए तो शीतलक के विभिन्न लाभ हैं कुछ विशेष लाभ के बारे में हम यहां दर्शा रहे हैं |
इसको अधिक उच्च चालो (high speed) पर प्रयोग किया जा सकता है |
इसके प्रयोग से औजारों (tools) का जीवनकाल बढ़ जाता है |
शीतलक का प्रयोग औजारों में धार लगाते समय किया जाता है |
अनेक शीतलक स्नेहक (lubricant) का कार्य करते हैं उनके प्रयोग से औजार(tools) तथा जॉब के बीच घर्षण कम होता है |

शीतलक का प्रयोग करते समय सावधानियां (precaution of coolant)

जब भी शीतलक का प्रयोग करते हैं तब हमें निम्नलिखित सावधानियां अपनानी चाहिए -
1. औजार की धार (cutting edge) तथा कार्य खंड या जॉब की सतह दोनों पर ही पर्याप्त मात्रा में प्रयोग करना चाहिए |
2. शीतलक की मात्रा को संक्रिया (operation) के अनुसार समायोजित (adjust) करना चाहिए |
3. शीतलक का बहाव अधिक दाब (high pressure) में नहीं होना चाहिए |
4. मशीन संक्रिया (machine operation) शुरू होते ही शीतलक का प्रवाह(flow) भी शुरू हो जाना चाहिए |
5. शीतलक को लगातार धार (jet) के रूप में प्रयोग किया जाना चाहिए |
6. कर्तन चाल (cutting speed) के बढ़ने के साथ-साथ शीतलक का प्रवाह भी बढ़ना चाहिए |
7.शीतलक (coolant) का टैंक एक बड़े आकार का होना चाहिए जिससे कि शीतलक हमेशा ठंडा रह सके |
8. कार्बाइड औजारों द्वारा मशीनिंग करते समय शीतलक (coolant) की आवश्यकता नहीं होती है |

शीतलक और स्नेहक में अंतर (difference between coolant and lubricants)

शीतलक और स्नेहक मैं अन्तर निम्नलिखित है -
1. शीतलक का प्रयोग कार्य खंड और कर्तन औजारों से उत्पन्न हुई उष्मा को दूर करने के लिए किया जाता है |
तथा स्नेहक का प्रयोग दो मिलकर चलने वाले पुर्जों की घर्षण द्वारा उत्पन्न ऊष्मा को कम करने के लिए किया जाता है |
2.शीतलक (coolant) के प्रयोग से छीलन को औजार के फलक के साथ वैर्ल्ड नहीं होता है |
तथा स्नेहक के प्रयोग से चलने वाले पुर्जे जाम नहीं होते हैं |
3. शीतला के प्रयोग से औजार की क्षमता बढ़ती है |तथा स्नेहन के प्रयोग से मशीन को उच्च गति पर चलाया जा सकता है |
4. शीतला के प्रयोग से कम शक्ति लगाकर अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है |
तथा स्नेहन के प्रयोग से भी कम शक्ति लगानी पड़ती है क्योंकि तेल की एक चिकनी परत संपर्क मे गति करने वाले पुर्जो के बीच बन जाती है |
5. शीतलक के प्रयोग से कार्य खंण्ड या जॉब पर अच्छी फिनिश आती है |
वही लुब्रिकेंट्स के प्रयोग से मशीन की यथार्थता लंबे समय तक बनी रहती है |
6. इन दोनों के ही प्रयोग से मशीन व औजारों का जीवनकाल बढ़ता है|
7. शीतल के प्रयोग से प्रयोग किए जाने वाले औजारों पर जंग नहीं लगता है |
तथा स्नेहक के प्रयोग से मशीन के पुर्जो पर जंग नहीं लगता है|

दोस्तों हमारे इस पोस्ट से संबंधित आपके पास अगर कोई समस्या या सुझाव है तो कृपया हमें कमेंट करें धन्यवाद

स्नेहक (LUBRICANTS) के गुण तथा प्रकार

 

इस पोस्ट में हम जानेंगे स्नेहक(lubricants) क्या होते है लुब्रिकेंट्स के उद्देश्य तथा lubricants कितने प्रकार के होते हैं |

स्नेहक क्या होते हैं (introduction of lubricants)

जब दो पुर्जे (parts) आपस में रगड़ खाकर चलते हैं तो उनके बीच उत्पन्न होने वाले घर्षण को कम करने के लिए जो तरीके अपनाए जाते हैं उन्हें स्नेहक (lubricants) कहां जाता है |
जब किसी मशीन के दो पुर्जे (parts) आपस में रगड़ खाकर चलते हैं तो जल्दी घिस जाते हैं और खराब हो जाते हैं इन पुर्जो (parts) के बीच घर्षण को कम करने के लिए स्नेहको का प्रयोग किया जाता है|
स्नेहक के उचित प्रयोग से इनमें घर्षण कम होता है जिससे यह पुर्जे अधिक समय तक खराब नहीं होते तथा कम घिसते हैं|
स्नेहक(lubricant) के द्वारा पुर्जो के बीच में बहुत पतली परत बनाई जाती है यह परत संपर्क सतहो को अलग-अलग रखती है और पुर्जे घर्षण से बच जाते है |

स्नेहक के उद्देश्य (objects of lubricant)

स्नेहक के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं
1. मशीन या पुर्जे parts गर्म होने से बच जाते हैं |
2. मशीन या पुर्जो की गति बढ़ती है क्योंकि स्नेहक के उपयोग से गति प्रतिरोध कम होता है |
3. मशीन की यथार्थता बढ़ती है |
4. मशीन कम शक्ति खर्च करती है |
5. मशीन की उत्पादन क्षमता बढ़ती है |
6. मशीन या पुर्जो पर जंग नहीं लगता है |
7. मशीन के पार्ट्स कम घिसते हैं |

स्नेहक के गुण (properties of lubricants)

स्नेहक lubricants के मुख्यत 9 गुण होते हैं जो निम्नलिखित हैं |
1. श्यानता (viscosity)
2. चिकनाहट (oiliness)
3. स्फुरण बिंदु(flash point)
4. बहाव बिंदु (pour point)
5. अग्नि बिंदु(fire point)
6. वाष्पशीलता (volatality)
7. रासायनिक स्थिरता (chemical stability)
8. अम्लीयता (acidity)
9. इमल्सीफिकेशन (emulsification)

श्यानता (viscosity)

एक स्नेहक(lubricant) जब गति करता है तो इसके कण एक-दूसरे की गति का विरोध करते हैं | जिससे घर्षण प्रतिरोध उत्पन्न होता है, इसे ही श्यानता (viscosity)का गुण कहा जाता है |
अगर दूसरे शब्दों में कहा जाए तो किसी द्रव की आपेक्षिक तरलता को ही उसकी श्यानता कहा जाता है|
कम श्यानता वाले स्नेहक पतले होते हैं और आसानी से बह सकते हैं | जबकि अधिक से श्यानता वाले स्नेहक गाढे होती हैं और इनके बहने की क्षमता भी कम होती है |

चिकनाहट (oiliness)

किसी स्नेहक या तेल की परत सॉफ्ट की गति से उत्पन्न होती है जब सॉफ्ट स्थिर रहती है तो स्नेहक की परत हटकर निचली सतह पर जमा हो जाती है फिर भी ऊपरी सतह पर चिकनाहट रहती है |
यह क्रिया स्नेहक की चिकनाहट पर निर्भर करती है जिसके कारण वह स्नेहक का गीलापन छोड़ती है |
चिकनाहट के अभाव के कारण पुर्जों आदि में थोड़ी बहुत गिरावट आ सकती है |इसलिए चिकनाहट oiliness स्नेहक का वह गुण होता है, जिससे सतहे है चिकनी रहती है |

स्फुरण बिंदु(flash point)

स्फुरण बिंदु(flash point) वह तापमान होता है जिस पर स्नेहक गर्म होकर भाप के रूप में बदलने लगता है और बिना आग लगाए स्वत: ही आग पकड़ लेता है |
सभी स्नेहको का स्फुरण बिंदु(flash point) अलग अलग होता है
इसलिए एक अच्छे स्नेहक में अधिक स्फुरण बिंदु(flash point) होना आवश्यक है |

बहाव बिंदु (pour point)

वह तापमान जिस पर स्नेहक ठंडा होकर गाढ़ा हो जाता है तथा उसका बहाव रुक जाता है उसे बहाव बिंदु (pour point) कहा जाता है |
वे मशीनें जो निम्न टेंपरेचर के लिए उपयोग में ली जाती हैं उनमें इनका महत्व अधिक होता है | जैसे - बर्फ बनाने वाली मशीन तथा रेफ्रिजरेटर

अग्नि बिंदु(fire point)

वह तापमान जिस पर स्नेहक की वाष्प जलने लगती है और तेल आग पकड़ लेता है उसे हम अग्नि बिंदु(fire point) कहते हैं |

वाष्पशीलता (volatality)

यह स्नेहक का वह गुण होता है, जिसके कारण उसके भार में कमी आ जाती है |एक अच्छे स्नेहक की वाष्पशीलता (volatality) कम होनी चाहिए |

रासायनिक स्थिरता (chemical stability)

किसी एक अच्छे स्नेहक में उच्च स्थिरता होनी चाहिए और इसका किसी भी स्थिति में अपघटन या ऑक्सीकरण नहीं होना चाहिए जिससे गाढ़ा होने से इसके बहाव में कमी ना आए |

अम्लीयता (acidity)

स्नेहक में यदि अमल की मात्रा स्वतंत्र रूप से होगी तो सताह खराब होने से घर्षण बढ़ता है |
स्नेहा को अमल की मात्रा होने पर जंग लगने से सतह खराब हो सकती है |
इसलिए एक अच्छे स्नेहक में प्रत्यक्ष रूप से अमल नहीं होना चाहिए |

इमल्सीफिकेशन (emulsification)

जब कोई स्नेहक पानी के साथ मिलता है तो उसे इमल्सीफिकेशन (emulsification) कहते हैं |
एक अच्छी किस्म के स्नेहक में पानी नहीं खुलता है
इमल्सीफिकेशन (emulsification) की भाप इंजन, भाप टरबाइन या हाइड्रॉलिक टरबाइन आदी में होने की संभावना ज्यादा होती है |

स्नेहक के प्रकार (types of lubricants)

स्नेहको को तीन श्रेणियों में बांटा गया है जो निम्नलिखित है|
1. द्रव स्नेहक (liquid lubricants)
2. अर्ध ठोस स्नेहक (semi solid lubricant)
3. ठोस स्नेहक (solid lubricant)

1. द्रव स्नेहक (liquid lubricants)

द्रव स्नेहको को निम्नलिखित प्रकार से बांटा गया है|
A. कार्बनिक तेल (organic oil)
B. खनिज तेल (mineral oil)
C. कृत्रिम तेल (synthetic oil)

कार्बनिक तेल (organic oil)

कार्बनिक तेल को फैटी ऑयल या स्थिर आयल भी कहते हैं|
यह कार्बनिक तेल (organic oil) पशु(animal) वनस्पति और मछलियों से प्राप्त किए जाता हैं|
मछलियों के सिर से निकाला गया तेल भी स्नेहक के रूप में प्रयोग किया जाता है |

कार्बनिक तेल के गुण (properties of organic oil)

यह तेल अत्यधिक कीमती होता है |
नमी वाली वायु या जलीय साधन से जलयुक्त होने की प्रकृति के कारण क्रिया में अम्लीय होता है |
वायु के संपर्क में ऑक्सीजन * करने तथा गाढ़ा होने की अधिक प्रवृत्ति होती है |
यह तेल के छेद hole को बंद कर देता है |

खनिज तेल (mineral oil)

यह तेल पेट्रोलियम से प्राप्त होते हैं तथा यह पैराफिन या नैफ्थनिक तेल होते हैं |
नैफ्थनिक तेलो की अपेक्षा पैराफिन तेल उच्च तापमान पर स्वच्छता से टिकते हैं |
तापमान में वृद्धि के साथ पैराफिन तेलों की अपेक्षा नैफ्थनिक तेल स्नेहक के लिए निम्नलिखित स्तर के होते हैं|
कार्बनिक तेलों की अपेक्षा खनिज तेलों की श्यानता कम होती है | इसलिए इन्हें क्रूड आयल (crude oil) भी कहा जाता है |
खनिज तेलों की श्यानता की परास अधिक होती है तथा यह कम चिपचिपा और कार्बनिक तेलों से अधिक चिकनाहट वाला होता है |
इनकी क्षमता को बढ़ाने और इनको भारी बनाने के लिए इनमें 5% से 25% तक कार्बनिक तेलों को मिलाया जाता है जिसे संयुक्त तेल (compound oil) कहते हैं|
उपयोग के आधार पर खनिज तेल नो को पेट्रोलियम स्नेहक के रूप में निम्नलिखित रुप में कर सकते हैं |
सर्कुलेटिंग आयल, गियर आयल, मशीन या इंजन आयल, रेफ्रिजरेशन आयल, स्पिंडल ऑयल, स्टीम सिलेंडर ऑयल, वायर रोप स्नेहक आदि |

कृत्रिम तेल (synthetic oil)

सिंथेटिक ऑयल महंगे होते और इनका उपयोग सीमित स्थानों पर किया जाता है |
यह पोलीएल्कालीन ग्लेकोस तथा योगिक सिलिकॉन होते हैं|
यह सिलिकन कोल और बालू से तैयार किए जाते हैं |
इनमें सिलीकान कार्बाईड को अलग-अलग तत्वों के साथ सिलिकन और ऑक्सीजन में रासायनिक क्रिया द्वारा बदल दिया जाता है, जिसे सिलिकॉन स्नेहक कहते हैं |

2. अर्ध ठोस स्नेहक (semi solid lubricant)

यह स्नेहक साबुन के समान गाढ़ा खनिज तेल होता है |
यह तेल की अपेक्षा उच्च श्यानता वाला होता है |
इसके द्वारा अलग-अलग प्रकार की ग्रीस तैयार की जाती है|
इसे गाढा बनाने के लिए इसमें पेट्रोलियम और कृत्रिम तेल मिलाए जाते हैं |
इसमें सोडियम, कैल्शियम, एलमुनियम, बेरियम, लिथियम, और स्ट्रान्सियम के साबुन फैट मिलाये जाते है|
यह साबुन फैट और धातु आधार की रासायनिक क्रिया की उपज होते हैं |
अर्थ ठोस स्नेहक अर्थात ग्रीस का उपयोग उन स्थानों पर किया जाता है जहां पर उच्च तापमान पैदा होता है और जिसमें द्रर्व स्नेहको का प्रयोग करना संभव न हो |

3. ठोस स्नेहक (solid lubricant)

ऐसी जगह जहां दबाव व तापमान के कारण जहां तेल परत नहीं बन पाती, ऐसी जगह घर्षण को कम करने के लिए  ठोस स्नेहक (solid lubricant) का प्रयोग किया जाता है|
इस प्रकार के ठोस स्नेहक का प्रयोग अकेले अथवा इनके साथ तेल या ग्रीस मिलाकर किया जाता है | इसका सबसे अच्छा उदाहरण ग्रेफाइट होता है |
ग्रेफाइट के अलावा ठोस स्नेहक जैसे - सॉपस्टोन, टेल्क, वैक्स, माइका, और फ्रेंच चौक आदि होते हैं |


दोस्तों आपको हमारा यह पोस्ट कैसा लगा क्या यह आपके लिए उपयोगि था आप हमें अपनी प्रतिक्रिया कमेंट के माध्यम से दे सकते हैं धन्यवाद

होनिंग प्रक्रिया क्या है और इसके क्या लाभ है

 

दोस्तों इस पोस्ट में हम जानेंगे कि होनिंग प्रक्रिया क्या है और इसके क्या लाभ है | होनस क्या होते हैं होनिंग मशीनों का वर्गीकरण तथा होनिंग औजार के बारे में विस्तार पूर्वक जानेंगे|

होनिंग(honing)

यह एक घिसाई करने वाला प्रक्रम(process) होता है|
इस प्रोसेस के द्वारा पहले से मशीनिंग किए गए उत्पादों को फिनिश करने और उनका साइज़ ठीक करने के लिए प्रयोग किया जाता है|
होनिंग के द्वारा सभी फर्निशिंग सक्रियाओं में सबसे अधिक पदार्थ हटाया जा सकता है|
होनिंग विधि के द्वारा अलग की जाने वाली धातु की मात्रा 0.1 मिली मीटर से 0.25 मिली मीटर तक होती है|
लेकिन अगर पूछा जाए कि होनिंग विधि के द्वारा अधिकतम कितनी धातु को हटाया जा सकता है या अलग किया जा सकता है | तो सही उत्तर होगा 0.75 मिलीमीटर तक|

होनिंग का प्रयोग(use of honing)

इसको अधिकतर प्रयोग आंतरिक बेलनाकार सतहों जैसै ड्रिलिंग अथवा बोरिंग के द्वारा बनाए गए छेदों को फिनिश करने के लिए किया जाता है |

होनिंग औजार(honing tools)

यह तीन 4 या 6 भुजाओं वाला औजार(tool) होता है|
इसकी प्रत्येक भुजा पर होनिंग स्टिक लगी होती है| इस पर लगे समायोजन पेच(adjustable screw) की सहायता से ही होनस के साइज को घटाया या बढ़ाया जा सकता है|
यह लगभग समायोज्य रीमर की तरह कार्य करता है|

honing-tools
honing-tools


होनस(hones)

होनिंग के लिए प्रयोग किए जाने वाले औजार को होन(hone) कहते हैं|
यह एक प्रकार की धातु को पॉलिश करने वाली छड़ होती है, जोकि अल्युमिनियम ऑक्साइड, सिलीकान कार्बाईड, या डायमंड डस्ट के सूक्ष्म कणों को बोण्ड द्वारा जोड़कर बनाई जाती है|
इसे होनिंग स्टिक या होनिंग स्टोन भी कहां जाता है |
इसके द्वारा ढलवा लोहे, इस्पात, पीतल, कांसा, एलुमिनियम, चांदी, तथा कांच या प्लास्टिक आदि पर पॉलिश की जाती है|
होनस का वर्गीकरण (classification of hones)
होनस को तीन वर्गों में विभाजित किया जाता है|

1. कोरस या रफ होनस

इस प्रकार के होनस का प्रयोग जॉब पर बोरीग के बाद रफ होनिंग के लिए किया जाता है|

2. मीडियम या फिनिश होनस

इस प्रकार के होनस का प्रयोग होनिंग या semi-finished सतहों को फिनिश करने के लिए किया जाता है|

3. फाइन या पाॅलिश होनस

इस प्रकार की होनस का प्रयोग फिनिश होने के बाद जॉब की आंतरिक सतहों को फिनिशिंग पाॅलिश अर्थात जॉब को शीशे की तरह चमकाने के लिए किया जाता है|

होनिंग मशीन(honing machine)

होनिंग प्रकरण को सामान्य कार्य करने वाली मशीनों जैसें लेथ मशीन और ड्रिलिंग मशीन पर भी किया जा सकता है
कार्य के अनुसार स्थिर प्रकार की मशीनें उपयुक्त सिद्ध नहीं होती हैं, ऐसी स्थिति में उस कार्य को करने के लिए सुगराही ड्रिलिंग मशीन(portable drilling machine) एड्रिल के स्थान पर होन को लगाकर प्रयोग किया जा सकता है|
बहु उत्पादन के लिए नियमित होने की मशीनों का प्रयोग किया जा सकता है इन मशीनों से इस संतोषजनक और सस्ते परिणाम प्राप्त होते हैं|

होनिंग प्रक्रम (honing process)

होनिंग क्रिया एक आंर्द(wet) प्रक्रम(process) होता है|
इस प्रकरण में यह अनिवार्य है कि संक्रिया के समय पर्याप्त मात्रा में उपयुक्त शीतलक का प्रयोग किया जाना चाहिए|
छोटे उत्पादों में यह क्रिया हाथ से की जा सकती है इसके लिए एक होन लगातार घुमाया जाता है और कार्य खंड या जॉब को घूमते हुए औजार पर हाथ के द्वारा आगे पीछे चलाया जाता है|
honing-process
honing-process


होनिंग प्रक्रम मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं
1. ड्राई होनिंग(dry honing)
2. वैट होनिंग(wet honing)

ड्राई होनिंग(dry honing)

इस प्रकार की हानिंग क्रिया अधिक धातु और रफ कर्तन करने के लिए की जाती है|
इस क्रिया में किसी भी प्रकार का शीतलक(coolant) प्रयोग नहीं किया जाता है|
इसमें 80 से 120 अपघर्षक ग्रीट वाले होनस का प्रयोग किया जाता है|

वैट होनिंग(wet honing)

इस प्रकार की होनिंग अच्छी फिनिश और चमक के लिए की जाती है|
इस प्रक्रिया में धातु कम कटती है|
इस प्रकार की होनिंग में शीतलक का प्रयोग किया जाता है|
इस क्रिया में 120 से 300 अपघर्षक ग्रीट वाले होनस का प्रयोग किया जाता है|

होनिंग के लाभ (advantage of honing)

1. इससे शतहो में घर्षण लगभग सुनने के बराबर रह जाती है|
2. इससे घूमने वाले पुर्जे बड़ी सरलता से घूमते हैं|
3. होनिंग के माध्यम से पूर्जों को टॉलरेंस की अंतिम सीमा तक परिशुद्ध बना सकते हैं|
4. होनिंग के माध्यम से सतहो में अच्छी फिर्निशिंग पोलिश और स्मूदनेस लाकर उसकी विशेषता बढ़ा सकते हैं|
5. इससे भारी तथा टेढ़े मेढ़े जॉब या सिलेंडर आदि जिनको मशीन पर बांधकर आंतरिक ग्राइंडिंग नहीं की जा सकती उनकी आसानी से होर्निंग क्रिया की जा सकती है|

दोस्तों इस पोस्ट में हमने जाना होनिंग प्रक्रिया क्या है और इसके क्या लाभ है | होनस क्या होते हैं होनिंग मशीनों का वर्गीकरण तथा होनिंग औजार के बारे में विस्तार पूर्वक जानकारी साझा की है अगर आपको हमारा यह पोस्ट पसंद आया तो कृपया ज्यादा से ज्यादा शेयर करें और हम एक फॉलो करें
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आईटीआई पास स्टूडेंट को रेलवे दे रहा है नौकरी करने का मौका ऑनलाइन आवेदन करने की 24 जून है अन्तिम दिनांक

 रेलवे भर्ती सेल (आरआरसी), 


पश्चिम रेलवे, मुंबई ने पश्चिम रेलवे के अधिकार क्षेत्र के भीतर विभिन्न डिवीजनों की कार्यशालाओं में अलग-अलग ट्रेनों के लिए कुल 3591 रिक्तियों की भर्ती के लिए एक अधिसूचना की घोषणा की है। जिसके तहत रेलवे अपनी अलग-अलग डिवीजनो में सभी आईटीआई ट्रेड्स पास विद्यार्थियों को अलग-अलग पदों पर(कुल 17 पदों पर) नौकरी देने के लिए नोटिफिकेशन जारी किया है|

जिसमें निम्न में ट्रेनों के अभ्यर्थी आवेदन कर सकते हैं|
Fitter / Turner / Machinist / Carpenter
/ Painter (General) / Mechanic
(Diesel) / Programming & Systems
Administration Assistant / Electrician /
Wireman / Refrigerator AC Mechanic
/ Plumber/Draftsman (Civil)/Electrician/Electronics Mechanic/Stenographer
(English)/Pipe Fitter

ऑनलाइन फॉर्म भरने की अंतिम तिथि 24 जून2021 निर्धारित की गई है|

आवश्यक योग्यताएं

आयु

ऑनलाइन आवेदन करने के लिए अभ्यार्थी की आयु 15 वर्ष से कम तथा अंतिम तिथि तक 24 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए|
अन्य भर्तियों की तरह ही आयु में पिछड़े वर्गों और एक्स सर्विसमैन को छूट दी गई है|

शैक्षणिक योग्यता

ऑनलाइन आवेदन करने के लिए अभ्यर्थी को 10th क्लास में 50% अंकों के साथ पास होना आवश्यक है|
साथ ही संबंधित ट्रेड में आईटीआई का सर्टिफिकेट होना आवश्यक है|

आवेदन शुल्क

अभ्यार्थियों के लिए ₹100 आवेदन शुल्क रखा गया है|
पिछड़े वर्ग और महिलाओं (SC/ST/PWD/Women) के लिए आवेदन शुल्क फ्री रखा गया है|

चयन प्रक्रिया

अपरेंटिस अधिनियम, 1961 के तहत प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए योग्य आवेदकों का चयन अभ्यार्थी  द्वारा प्राप्त अंकों के प्रतिशत का औसत लेकर तैयार की जाने वाली मेरिट सूची पर आधारित होगा|
मैट्रिक दोनों में आवेदक [न्यूनतम 50 % (कुल) अंकों के साथ] और आईटीआई परीक्षा के कुल अंकों के प्राप्तांक के आधार पर दोनों को बराबर वेटेज दिया जाएगा।
दो आवेदकों के मामले में · समान अंक होने पर अधिक आयु वाले आवेदकों को प्राथमिकता दी जाएगी।
यदि जन्म तिथि भी समान है, तो · पहले मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले आवेदकों को पहले स्थान दिया जाएगा।
किसी भी प्रकार की कोई लिखित परीक्षा या वाइवा नहीं होगा।
अधिक जानकारी के लिए आरआरबी की ऑफिशियल वेबसाइट पर जाएं। Click here

ऑनलाइन आवेदन करने के लिए क्लिक करें click here

लैपिंग क्या होती है | लैपिंग औजार एवं लैपिंग विधि और लैपिंग के क्या लाभ है

 इस पोस्ट में हम जानेंगे लैपिंग क्या होती है लैपिंग औजार एवं लैपिंग विधि और लैपिंग के क्या लाभ हैं|

लैपिंग(lapping)

यह एक सरफेस फिनिशिंग क्रिया का भाग है जब हम किसी धातु पर मशीनींग और ग्राइंडिंग करते हैं तो उसके पश्चात भी अधिक फिनिशिंग की आवश्यकता होती है | इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए जो संक्रिया की जाती है उसे लैपिंग कहते हैं|
लैपिंग विधि के द्वारा जॉब या कार्य खंड की घिसाई करके जॉब की सतह से अशुद्धता(roughness) और तरंगता(waviness) एवं अन्य अनियमितताओं को समाप्त किया जाता है तथापि फिनिशिंग में सुधार किया जाता है|
इस विधि का उपयोग अच्छी फिनिश वाले कार्य खंड पर किया जाता है, जैसे:- पिस्टन पिन, पिस्टन रिंग, गेज ब्लॉक, वाल्व सीट, मशीन औजारों की गाइड तथा स्लाइड मार्गों आदि पर |
यह क्रिया हाथ अथवा मशीन के द्वारा बाहरी एवं आंतरिक दोनों प्रकार की सतहों पर की जा सकती है |

लैपिंग औजार(lapping tool)

लैपिंग के लिए प्रयोग किए जाने वाले पदार्थ काम मुलायम होना जरूरी है, जिससे घिसने वाले कण आसानी से बैठाये जा सके|
यह एक काटने वाला औजार है, जो विभिन्न आकार में बनाया जा सकता है और यह घर्षण विधि के द्वारा काटता है|
लैप बनाने के लिए मृदु ढलवा लोहा(mild cast iron) तांबा, पीतल, सीसा और कभी-कभी कठोर लकड़ी का भी प्रयोग किया जाता है|

लैपिंग माध्यम(lapping media)

लैप को बनाने के लिए अलग-अलग प्रकार के अपघर्षक कणों को पेस्ट के रूप में प्रयोग किया जाता है| इन्हें चार्जिंग पदार्थ भी कहते हैं, जैसे:- हीरा, एमरी, कोंरडम, क्रोमियम ऑक्साइड, अल्युमिनियम ऑक्साइड तथा सिलिकॉन आदि|
अधिकतर लैपिंग के लिए डायमंड पाउडर का इस्तेमाल किया जाता है|
एलुमिनियम ऑक्साइड के अपघर्षक को उच्च फिनिश प्राप्ति हेतु प्रयोग में लाया जाता है|
तथा सिलीकान कार्बाईड वाले लेप अधिक धातु काटते हैं तथा इनके द्वारा सतह रफ बनती है |

लैपिंग पाउडर के ग्रेड(grades of lapping powder)

लैपिंग पाउडर कई फ्लोर साइजों में मिलते हैं शुक्षम कार्यों के लिए इनको तेल के साथ मिलाकर कुछ समय के लिए छोड़ दिया जाता है जो कम अधिक समय तक तेल में तैरते हैं, वे सबसे सूक्ष्म अपघर्षक होतै है|
लैपिंग करते समय इन अपघर्षको के साथ मोबिल आयल, लॉर्ड आयल, मिट्टी का तेल अथवा तारपीन का तेल उपयोग में लाया जाता है|

लैपिंग विधि(method of lapping)

लैपिंग में दो प्रकार की लैपिंग विधि प्रयोग की जाती है|
1. हस्त लैपिंग(hand lapping)
2. मशीन लैपिंग(machine lapping)

हस्त लैपिंग(hand lapping)

इस विधि के अनुसार लैप जॉब या कार्य खंड में से किसी एक को हाथ से पकड़ कर दूसरे को गति प्रदान की जाती है|
जिससे इन दोनों की सतह एक दूसरे के संपर्क में रहकर रगड़ खाती रहे|
Hand-lapping


लेकिन कुछ परिस्थितियों में लैपिंग कंपाउंड को दोनों संपर्क  सतहों के बीच में रखकर एक सतह को स्थिर तथा दूसरी सतह को उसके ऊपर रगड़ा जाता है|
इसका उपयोग इंजन के वाल्व और वाल्व सीट आदि की लैपिंग के लिए किया जाता है|

मशीन लैपिंग(machine lapping)

इस विधि का प्रयोग बेयरिंग के बाॅल, रोलर, रेस, गियरों, क्रैंक शाफ़्ट, पिस्टन पिनों, गेज ब्लॉक, एवं अन्य ऑटोमोबाइल पार्ट्स और माइक्रोमीटर के स्पिंडल आदि पर उच्च परिष्कृत सतह प्राप्त करने के लिए किया जाता है|
इस विधि में अनेक प्रकार की मशीनों का प्रयोग किया जाता है|
Machine-lapping


एक ऊर्ध्वाधर अक्ष लैपिंग मशीन के ऊर्ध्वाधर स्पिंण्डल पर दो पहिए एक ऊपर और दूसरा उसके नीचे होता है | जॉब या कार्य खंड इन दोनों के बीच में रहकर वाहक सहित ढीले कटाई वाले कणों को फिड किया जाता है|
इस मशीन का एक और उन्नत रुप वह है जिसमें घूमने वाले पहियों के स्थान पर दो बाॅण्डेड अपघर्षक पहिए लगे होते हैं|
इनके साथ ढीले काटने वाले कणों की आवश्यकता नहीं होती है|
इन दोनों प्रकार की मशीनों में नीचे वाला पहिया घूमता है और ऊपरवाला पहिया नहीं घूमता है परंतु जॉब या कार्य खंडों के ऊपर फ्लोट करता है|
इन दोनों मशीनों को केवल वृत्ताकार और चपटे कार्यों के लिए ही प्रयोग किया जाता है|
अपघर्षक बेल्ट लैपिंग मशीन का उपयोग क्रैंक शाफ़्ट पर बेयरिंग, केम शाफ़्ट कि सतह लैपिंग करने के लिए किया जाता है|
इसमें अपघर्षक काणो से लेपित कपड़े या कागज की बेल्ट का प्रयोग किया जाता है|
सेंटर लैस लैपिंग मशीन पर लगातार रूप से लैपिंग क्रिया गोल सातहो वाले पार्ट्स जैसे:- पिस्टन पिन, बियरिंग रेस, और कप, आदि पर की जाती है|

लैपिंग के लाभ(advantage of lapping)

1. लैपिंग से छोटे-छोटे पॉइंट तथा डॉट दूर हो जाते हैं|
2. जॉब पर उच्च कोटि की पॉलिश तथा फर्निशिंग आ जाती है|
3. जॉब पर जंग लगने का खतरा नहीं रहता है|
4. सत्य इतनी समतल एवं सूक्ष्म बन जाती है कि दोनों सतहों के मिलने पर वेक्यूम जाता है|
5. उच्च गति पर जॉब को चला सकते हैं|
6. लैपिंग के प्रयोग से इच्छित फिट प्राप्त की जा सकती है|

सरफेस फिनिश का परिचय, इसके मापने की इकाई, ग्रेड, मापन की विधियां, और सरफेस फिनिश के लाभ

 इस पोस्ट में हम जानेंगे सरफेस फिनिश का परिचय, इसके मापने की इकाई, ग्रेड, मापन की विधियां, और सर्फेस फिनिश के लाभ |

सरफेस फिनिश का परिचय(introduction of surface finish)

किसी भी पुर्जे (parts) की सतह(surface) पर स्मूथनेस(smoothness) और रफनैस(roughness) के संबंध को सरफेस फिनिश कहते हैं|
जैसा कि हम सब जानते हैं वर्तमान औद्योगिक युग में हर दिन नई नई मशीनों का आविष्कार हो रहा है | इन मशीनों में कुछ पुर्जे ऐसे होते हैं जिन्हें अधिक फिनिश की आवश्यकता नहीं होती है और कुछ ऐसे पुर्जे होते हैं, जिनको बहुत अधिक परिशुद्धता में फिनिश करने की आवश्यकता होती है इस प्रकार फनिशिंग किसी भी कार्य की प्रकृति पर निर्भर करता है|

सरफेस फिनिश से संबंधित पद(relative steps of surface finish)

1. सरफेस(surface)
2. प्रोफाइल(profile)
3. रफनैस(roughness)
4. वेवीनैस(weariness)
5. फ्लाॅज(flaws)
6.ले(lay)

Relative-steps-of-surface-finish


1. सरफेस(surface)

यह किसी जॉब या पदार्थ की वह सीमा होती है, जो किसी एक जॉब या पदार्थ को दूसरे से अलग करती है|

2. प्रोफाइल(profile)

किसी भी सरफेस की रूपरेखा या आकृति को प्रोफाइल कहते हैं|

3. रफनैस(roughness)

जब किसी जॉब के सतह  पर किसी औजार की कर्तन धार से जो बारीक तथा सूक्ष्म विषमताएं बनती है, उन्हें  रफनैस(roughness) कहते हैं |

4. वेवीनैस(weariness)

जब किसी जॉब की सतह पर रफनैस की अपेक्षा अधिक चोड़ी विषमताएं बनती है तो उन विषमताओं को वेवीनैस कहते हैं |

5. फ्लाॅज(flaws)

यह किसी जॉब की सतह पर वह विषमता होती है, जो किसी एक स्थान पर या कहीं-कहीं अनेक स्थान पर पड़ती हैं | जैसे:- स्क्रेच, लिए आदि |

6.ले(lay)

किसी जॉब की सतह पर जिस दिशा में फिनिशिंग की जाती है, उसे ले(lay) कहते हैं |

सरफेस फिनिश के माप की इकाई(unit measurement of surface finish)

सरफेस फिनिश की इकाई मीट्रिक प्रणाली में माइक्रोन होती है|
तथा ब्रिटिश प्रणाली में इसे माइक्रो इंच मे मापते हैं|
भारतीय मानक (I.S.I.) मैं RZ और ra सूत्रों के मान की इकाई को माइक्रोन से संबोधित करते हैं |
एक माइक्रोन = 0.001 मिली मीटर
एक माइक्रोन इंच = 0.0001 इंच

सरफेस फिनिश की ग्रेड(grade of surface finish)

भारतीय मानक (I.S.I.) में ra सूत्र की माप के अनुसार सर्फेस फिनिश के स्टैंडर्ड ग्रेड होते हैं, जिनको निम्न तालिका द्वारा प्रदर्शित किया जाता है|

Surface-finish-ki-grade


सरफेस फिनिश को मापने की विधियां(method of measuring surface finish)

सरफेस फिनिश को दो विधियों द्वारा मापा जा सकता है|
1. तुलना द्वारा( by comparison)
2. प्रत्यक्षमापी उपकरणों द्वारा(by direct measuring instruments)

1. तुलना द्वारा( by comparison)

जब किसी सरफेस फिनिश का निरीक्षण(inspection) तुलना द्वारा किया जाता है|
तो यह सात विधियां अपनाई जाती हैं|
1. स्पर्श निरीक्षण द्वारा
2. दृष्टिगत निरीक्षण द्वारा
3. माइक्रोस्कोपिक निरीक्षण द्वारा
4. सतह फोटोग्राफ द्वारा
5. रिफ्रैक्टिव लाइट इंटेसिटी द्वारा
6. माइक्रो इंटर फेयरोमीटर द्वारा
7. वाॅलाक सतह डायनमो मीटर द्वारा

2. प्रत्यक्षमापी उपकरणों द्वारा(by direct measuring instruments)

किसी भी सतह फिनिश का निरीक्षण प्रत्यक्ष माफी उपकरणों द्वारा भी किया जा सकता है |
इसके लिए यह 3 उपकरण प्रयोग में लाए  जाते है|
1. प्रोफाइलोमीटर(profilometer)
2. स्टाइल्स प्रोब उपकरण
3. टामलिम्सन सरफेस मीटर
4. टेलर हाॅबसन टेलीसर्फ

प्रोफाइलोमीटर(profilometer)

इस उपकरण के द्वारा किसी सतह की हिल्स और वैलीज को सूक्ष्म से सूक्ष्म 0.0025 मिलीमीटर तक माप सकते हैं|
प्रोफाइलोमीटर डायल टेस्ट इंडिकेटर की तरह ही कार्य करता है|
यह दो प्रकार के होते हैं
1. यांत्रिक(mechanical)
2. इलेक्ट्रॉनिक(electronic)

1. यांत्रिक(mechanical)

यांत्रिक(mechanical) उपकरण को स्टाइलस कहते है|
यह उपकरण की चाल को यांत्रिक विधि द्वारा पढ़कर इंडिकेटर की सहायता से हिल्स और वैलीज को मापा जा सकता है|
इसका स्टाइलस डायमंड धातु का बना होता है|

2. इलेक्ट्रॉनिक(electronic)

इस उपकरण को टेलीसर्फ के नाम से भी जाना जाता है|
यह इलेक्ट्रॉनिक उपकरण होता है, जिसका उपयोग प्रयोगशाला में किया जाता है|
यह एक मोटर की सहायता से चलता है यह चलती हुई सतह से प्राप्त विद्युत तरंगों को बढ़ाकर सतह एंपलीफायर एनालाइजर को भेजता है|
यह एनालाइजर सतह के पैरामीटर की गणना करके अक्षरों के रूप में दर्शाता है|

सरफेस फिनिश के लाभ (advantage of surface finish)

1. अच्छी सर्फेस फिनिश मशीन की गति बढ़ती है|
2. मशीन का जीवनकाल बढ़ता है|
3. मशीन के पुर्जे कम घिसते हैं|
4. घर्षण कम पैदा होता है|
5. लुब्रिकेंट का बहाव स्वतंत्र रूप से रहता है|


इस पोस्ट में हमने जाना सरफेस फिनिश का परिचय, इसके मापने की इकाई, ग्रेड, मापन की विधियां, और सर्फेस फिनिश के लाभ | अगर आपको यह पोस्ट पसंद आया था क्या इसलिए और कमेंट करना ना भूले

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लिमिट्स और फिट्स की विभिन्न प्रणालियां और मौलिक विचलन क्या है |

 इस पोस्ट में हम लिमिट्स और फिट्स की विभिन्न प्रणालियां, जैसे- ब्रिटिश प्रणाली, भारतीय प्रणाली, और मौलिक विचलन के बारे में विस्तार पूर्वक जानेंगे |

लिमिट्स और फिट्स की विभिन्न प्रणालियां (different systems of limits and fits)

लिमिट्स और फिट की मुख्यत: तीन प्रणालियां प्रचलित हैं|
1. न्यूअल प्रणाली(newell system)
2. ब्रिटिश मानक प्रणाली(British standard system)
3. भारतीय मानक प्रणाली(Indian standard system)

न्यूअल प्रणाली(newell system)

यह प्रणाली होल बेसिस सिस्टम पर आधारित है, जिसमें किसी भी प्रकार की फिटिंग प्राप्त करने के लिए छेद(hole) के व्यास को स्थिर रखा जाता है|
न्यूअल प्रणाली की खोज
इस प्रणाली की खोज न्यूअल इंजीनियरिंग कंपनी ने की, जिससे संसार की बहुत बड़े-बड़े कारखानों में विभिन्न प्रकार की फिटस दिए जाने वाले 1/2 इंच से 6 इंच व्यास तक के छेदों के लिए टोलरेंस निश्चित की |
न्यूअल प्रणाली की श्रेणियां
न्यूअल प्रणाली परीशुद्धता के आधार पर छेदों को A तथा B श्रेणियों में बांटा गया है|
A श्रेणी का प्रयोग अत्यधिक परिशुद्ध कार्यों के लिए किया जाता है|
एवं B श्रेणी का प्रयोग साधारण कार्यों के लिए किया जाता है|
इस प्रणाली में फोर्स फिट, ड्राइविंग फिट, पुश फिट तथा रनिंग फिट आती हैं|
इन फिटों को ड्राइंग पर दिखाने के लिए अक्षरों का प्रयोग किया जाता है, जैसे:- फोर्स फिट के लिए F और पूश फिट के लिए P अक्षर का प्रयोग किया जाता है|
परंतु फिट को दर्शाने के लिए अक्षर x, y, और z, का भी प्रयोग किया जाता है|

2. ब्रिटिश मानक प्रणाली(British standard system)

इस प्रणाली में 21 प्रकार की अलग-अलग फिट प्राप्त करने हेतु छेद (hole) के साइज पर एक तरफा(unilateral) या दो तरफा (bilateral) कुल 16 ग्रेड में टोलरेंस(tolerance) दी जाती है |
ब्रिटिश मानक प्रणाली में छेद(hole) को अंग्रेजी के बड़े अक्षरों में A,B,C, से Z तक दर्शाया जाता है |
तथा शाफ़्ट को अंग्रेजी की इन्हीं छोटे अक्षरों a,b,c,d, से z तक दर्शाया जाता है|
ब्रिटिश मानक प्रणाली की खोज
यह प्रणाली इंग्लैंड में सन 1953 में अपनाई गई थी|
जिसमें 16 ग्रेड की टोलरेंस 1 से 16 नवंबर तक दी जाती है|
यदि किसी छेद या शाफ़्ट पर टोलरेंस दी जाती है तो छेद या शाफ़्ट के निशान के साथ टोलरेंस की ग्रेड का नंबर भी लिया जाता है जैसे - H7, g6 आदि |

3. भारतीय मानक प्रणाली(Indian standard system)

इस प्रणाली में विभिन्न प्रकार की फिट प्राप्त करने के लिए 25 मौलिक विचलनों में बांटा गया है|
Limit-fits-ki-ISI-pranali


जिन्हें अंग्रेजी के बड़े अक्षरों द्वारा दर्शाया जाता है, जैसे:- छेद के लिए A,B,C,D,E,F,G,H,I,J,K,L,M,N,O,P,Q,R,S,T,U,V,W,X,Y,Z, तथा ZB, और ZC
एवं सॉफ्ट के लिए अंग्रेजी के यही अक्षर छोटे अक्षरों मैं प्रयोग किए जाते हैं|
za,zb, और, zc अधिकतम इंटरफियरेन्स प्राप्त करने के लिए प्रयोग में लाए जाते हैं|

भारतीय मानक प्रणाली की खोज

भारत में ब्रिटिश प्रणाली के आधार पर I.S.919 - 1959 के अनुसार पहले यह प्रणाली इंचों मे थी, जिसमें 16 लिमिट्स और फिट्स की प्रणालियां थी, जिन्हें IT 1 से IT 16 तक व्यक्त किया जाता था|
इसके बाद अब भारतीय मानक संस्थान ने I.S.I. प्रणाली के आधार पर I.S.919 - 1959 मे संशोधन करके एक नई प्रणाली 10 दिसंबर 1963 के नाम से प्रकाशित की,
जिसमें लिमिट् और फिट का विस्तार पूर्वक विवेचन किया|
इसके अंतर्गत 500 मिलीमीटर व्यास की शाफ़्ट तथा छेद़ में विभिन्न फिट प्राप्त करने के लिए 18 बेसिक टॉलरेंस की श्रेणियां हैं|
इन श्रेणियों को ITO 1, ITO और IT 1 से IT 16 द्वारा व्यक्त किया जाता है | इन्हें परिशुद्धता ग्रेड भी कहते हैं |

मौलिक विचलन (fundamental division)

Maulik-vichalan,fundamental-division


दो विचलनों (divisions) मे से किसी एक को शुन्य रेखा (zero line) के साथ संबंधित टोलरेंस जोन(tolerance zone) दिखाने में सुविधा हो, उसी मौलिक विचलन कहते हैं|

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फिट, और फिट के प्रकार

 इस पोस्ट में हम जानेंगे फिट और फिट के प्रकार, जैसे क्लीयरेंस फिट, इन्टरफीयरेंस फिट, ट्रांजिशन फिट और इनके सभी प्रकार के बारे में |

फिट(fit)

किसी भी मशीन या उपकरण को अलग-अलग अनेक पार्ट्स से असेंबल करके बनाया जाता है|
इनमें से कुछ विशेष पार्ट्स होते हैं जिनकी साइजों को सूक्ष्मता से बनाया जाता है और वे आपस में स्लाइडिंग करते हैं या घूमते है|
इस प्रकार से असेंबल किए जाने वाले पार्ट्स के बीच में क्लीयरेंस (अवकाश) या इन्टरफीयरेंस (व्यतिकरण) की मात्रा से बनने वाले संबंध को फिट कहते हैं |
अन्यथा संक्षेप में हम कह सकते हैं कि असेंबल की हुई 2 पार्ट्स के बीच के संबंध को फिट कहते हैं|

फिट के प्रकार(types of fit)

फिट मुख्य रूप से तीन प्रकार की होती है |
1. क्लीयरेंस फिट या अवकाश फिट (clearance fit)
2. व्यतिकरण फिट या इन्टरफीयरेंस फिट(interference fit)
3. ट्रांजिशन फिट(transition fit)

1. क्लीयरेंस फिट या अवकाश फिट (clearance fit)

जब शाफ्ट किसी होल के अंदर स्वतंत्र घूमे और उसमें किसी भी प्रकार की कोई रुकावट नहीं हो तो उसे क्लीयरेंस फिट कहते हैं |
क्लीयरेंस फिट में शाफ्ट का व्यास छेद के व्यास की अपेक्षा कम रखा जाता है| जिससे कि फिट होने के बाद भी कुछ क्लीयरेंस बनी रहे |

क्लीयरेंस फिट के प्रकार(types of clearance fit)

यह फिट दो प्रकार की होती है|
1. रनिंग फिट(running fit)
2. स्लाइडिंग फिट(sliding fit)

रनिंग फिट(running fit)

रनिंग फिट में धनात्मक अलाउंस रखा जाता है, ताकि दोनों पार्ट्स जब असेंबल किए जाते हैं तो क्लेयरेंस अधिक होने के कारण शाफ्ट छेद में आसानी से और स्वतंत्र रूप से घूम सकती है |
रनिंग फिट के उदाहरण:- बुश बियरिंग और शाफ्ट

स्लाइडिंग फिट(sliding fit)

इस फिट में रनिंग फिट की अपेक्षा थोड़ा कम धनात्मक अलाउंस रखा जाता है
जैसे:- ब्लैंकिंग पंच और शाफ्ट

2. व्यतिकरण फिट या इन्टरफीयरेंस फिट(interference fit)

इन्टरफीयरेंस फिट में 2 पार्ट्स को फिट करते समय थोड़ा सा बल लगाने की आवश्यकता होती है|
इस फिट में होल के साइज की माप को शाफ़्ट कि माप से थोड़ा कम या छोटा रखा जाता है|
इन्टरफीयरेंस फिट का उपयोग वहां किया जाता है जहां किसी पार्ट को स्थाई रूप से फिट करना हो |
इन्टरफीयरेंस फिट मैं ऋणात्मक अलाउंस रखा जाता है |

अधिकतम इन्टरफीयरेंस क्या होता है(maximum interference)

यह इन्टरफीयरेंस फिट में छेद की न्यूनतम माप एवं शाफ़्ट की अधिकतम माप का बीजगणितीय अंतर होता है

न्यूनतम इन्टरफीयरेंस (minimum interference)

यह इन्टरफीयरेंस होल के अधिकतम माप(साइज) तथा शाफ्ट के न्यूनतम माप का बीजगणितीय अंतर होता है|

इन्टरफीयरेंस फिट के प्रकार (types of interference fit)

1. फोर्स फिट(force fit)
2. ड्राइविंग फिट(driving fit)
3. श्रिंकेज फिट(shrinkage fit)

फोर्स फिट(force fit)

इस तरह की फिट में छेद(hole) के साइज को शाफ्ट के साइज की अपेक्षा छोटा रखा जाता है|
फोर्स फिट मैं दोनों पार्टस को किसी यांत्रिक प्रेशर के दबाव से फिट किया जाता है |
इस प्रकार की फिट में हाइड्रोलिक प्रेशर के द्वारा की पार्ट्स को अधिकतर फिट किया जाता है, जैसे- किसी बॉडी के हब मैं स्लीव को फिट करना |

श्रिंकेज फिट(shrinkage fit)

श्रिंकेज फिट में छेद वाले भाग को गर्म किया जाता है जिससे कि छेद का व्यास बढ़ जाता है, और शाफ्ट पर फिट हो जाता है |
इसके पश्चात इसे ठंडा कर लिया जाता है| ठंडा होने पर छेद वाला भाग सिकुड़ता है और मजबूती से शाफ्ट को पकड़ लेता है |
श्रिंकेज फिट का उदाहरण:- बैलगाड़ी के लकड़ी के पहिए पर लोहे की रिम चढ़ाना श्रिंकेज फिट का उदाहरण है |

3.ट्रांजिशन फिट(transition fit)

यह फिट क्लीयरेंस फिट तथा इन्टरफीयरेंस फिट के बीच की फिट होती है |
Transition-fit


ट्रांजिशन फिट छेद तथा शाफ्ट के बीच में इतना अलाउंस रखा जाता है कि मैं तो इससे अधिक क्लीयरेंस और ना ही अधिक इन्टरफीयरेंस रह सके |

पुश फिट(push fit)

इस प्रकार की फिट क्लीयरेंस फिट तथा इन्टरफीयरेंस फिट के बीच की फिट होती है |
इसमें ना तो अधिक क्लीयरेंस होता है और ना अधिक इंटरफीयरेन्स होता है |
पुश फिट में पार्ट को हाथ के दबाव से अथवा मेलेट की सहायता से फिट करते हैं|
पुश फिट का उदाहरण:- डॉवल पेन, लोकेटिंग प्लग आदि |


इस पोस्ट में हमने जाना फिट और फिट के प्रकार, जैसे क्लीयरेंस फिट, इन्टरफीयरेंस फिट, ट्रांजिशन फिट और इनके सभी प्रकार के बारे में |अगर आपको यह है पोस्ट अच्छा लगा तो कृपया शेयर करें|

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एलाउन्स क्या है और यह कितने प्रकार का होता है

 इस पोस्ट में हम जानेंगे एलाउन्स क्या है और यह कितने प्रकार का होता है तथा अधिकतम एलाउन्स और न्यूनतम एलाउन्स क्या होते हैं एवं टोलरेंस और एलाउन्स में क्या अंतर है|

एलाउन्स(allowance)

जब किसी निर्धारित फिट के अनुसार 2 पार्ट्स को बनाकर मिलाया जाता है तो इन दोनों पार्ट्स की माप मैं जानबूझकर जो अंतर रखा जाता है उसे एलाउन्स कहते हैं |
किसी भी प्रकार की फिट के अनुसार एलाउन्स धनात्मक(+) या ऋणात्मक(-) हो सकते हैं |
एलाउन्स का संबंध किसी भी फिट होने वाले 2 पार्ट्स से होता है ना की किसी एक पार्ट(पुर्जे) से होता है |

एलाउन्स के प्रकार(types of allowance)

एलाउन्स दो प्रकार के होते हैं|
1. अधिकतम एलाउन्स(maximum allowance)
2. न्यूनतम एलाउन्स(minimum allowance)

अधिकतम एलाउन्स(maximum allowance)

किसी भी छेद (hole)के साइज के हाई लिमिट और सॉफ्ट के साइज की लो लिमिट के अंतर को अधिकतम एलाउन्स कहते हैं |
अर्थात अधिकतम एलाउन्स प्राप्त करने के लिए छेद के हाई लिमिट साइज में से सॉफ्ट के लो लिमिट साइज को घटाया जाता है |
अधिकतम एलाउन्स में हमेशा छेद (hole)के साइज को सॉफ्ट के साइज से बड़ा रखा जाता है| अर्थात अधिकतम एलाउन्स
हमेशा धनात्मक(+) होता है|
अधिकतम एलाउन्स को रनिंग फिट मैं रखा जाता है|

न्यूनतम एलाउन्स(minimum allowance)

किसी भी छेद (hole)के साइज की लो लिमिट साइज और सॉफ्ट की हाई लिमिट साइज के अंतर को न्यूनतम एलाउन्स कहते हैं|
न्यूनतम एलाउन्स में छेद(hole) साइज को हमेशा सॉफ्ट के साइज से कम रखा जाता है |
न्यूनतम एलाउन्स प्राप्त करने के लिए छेद के लो लिमिट साइज में से सॉफ्ट के हाई लिमिट साइज को घटाया जाता है|

टोलरेंस फॉर एलाउन्स मे अंतर(difference between tolerance and allowance)

टोलरेंस(tolerance)
1. टोलरेंस एक ही जॉब के भिन्न-भिन्न साइजों पर अलग-अलग हो सकती है|
2. टॉलरेंस बेसिक साइज पर आधारित होती है|
3. टॉलरेंस ब्लूप्रिंट या ड्राइंग के अनुसार रखी जाती है|
एलाउन्स(allowance)
1.एलाउन्स दो मिलने या फिट होने वाले पार्ट्स पर दिया जाता है
2. एलाउन्स फिट के प्रकार पर आधारित होता है
3. यह इच्छित फिट प्राप्त करने के लिए जानबूझकर रखा जाता है|



टौलरेन्स क्या है और इसके क्या लाभ है

 

इस पोस्ट में हम जानेगे टौलरेन्स क्या है और इसके क्या लाभ है, तथा टौलरेन्स की पद्धतियां, यूनिलैटरल टौलरेन्स, बाइलेटरल टौलरेन्स, मौलिक टौलरेन्स, और टौलरेन्स जोन को विस्तार से जानेंगे |

टौलरेन्स(tolerance)

किसी पार्ट्स (पुर्जे) के बेसिक साइज पर दी गई हाई लिमिट और लो लिमिट के अंतर को टौलरेन्स कहते हैं |

टौलरेन्स के लाभ(advantage of tolerance)

1. इससे समय की बचत होती है और उत्पादन बढ़ता है|
2. कम कुशल कारीगर से काम लिया जा सकता है|
3. पार्ट्स (पुर्जे) कम रिजेक्ट होते हैं |
4. उत्पादन की लागत कम आती है|
नोट:- टौलरेन्स प्रत्येक पार्ट्स पर अलग-अलग हो सकती है|

टौलरेन्स की पद्धतियां (systems of tolerance)

टौलरेन्स दो प्रणालियों के अनुसार दी जाती है |
1. यूनिलैटरल टौलरेन्स(unilateral tolerance)
2. बाइलेटरल टौलरेन्स(bilateral tolerance)

यूनिलैटरल टौलरेन्स(unilateral tolerance)

इस प्रणाली के अनुसार टौलरेन्स बेसिक साइज पर केवल एक ही तरफ दी जाती है|
अर्थात यह टौलरेन्स केवल एक ही तरफ धनात्मक (+) या ऋणात्मक (-) मैं होती है|

बाइलेटरल टौलरेन्स(bilateral tolerance)

इस प्रणाली में टौलरेन्स बेसिक साइंज के दोनों तरफ की जाती है |
अर्थात यह टौलरेन्स दोनों ही तरफ धनात्मक (+) या ऋणात्मक (-) मैं होती है|

मौलिक टौलरेन्स(fundamental tolerance)

भारतीय मानक प्रणाली(Indian standard system) अर्थात I.S.I. के अनुसार 500 मिलीमीटर व्यास की सॉफ्ट के हॉल में विभिन्न फिट के लिए 18 मौलिक(fundamental) टौलरेन्स की श्रेणियां होती है|
इन श्रेणियों को I T O, I T, से 16 नंबरों द्वारा व्यक्त किया जाता है |
इसे टौलरेन्स की ग्रेड से भी जाना जाता है |
टौलरेन्स का ग्रेड निर्माण(manufacture) की परीशुद्धता के आधार पर निर्धारित किया जाता है |

टौलरेन्स साइज(tolerance size)

टौलरेन्स साइज के अंतर्गत मौलिक डेविएशन, टौलरेन्स का ग्रेड और बेसिक साइज दिया जाता है |
जैसे:- 30 H 5 से आप क्या समझते हैं ?
हल:- होल का बेसिक साइज 30 मिलीमीटर व्यास है|
मौलिक डेविएशन H से प्रकट किया गया है |
टौलरेन्स ग्रेड 5 नंबर से प्रकट किया गया है|

टौलरेन्स जोन(tolerance zone)

हाई लिमिट तथा लो लिमिट के अंतर को टौलरेन्स जोन कहते हैं|
Tolerance-zone,hole-basis-tolerance


टौलरेन्स जोन के माप में बना किसी भी साइज का जॉब सही होता है |
टौलरेन्स जोन की दो प्रणालियां प्रचलित हैं|
1. होल बेसिस टौलरेन्स (hole basis tolerance)
2. शाफ्ट बेसिस टौलरेन्स (shaft basis tolerance)

होल बेसिस टौलरेन्स (hole basis tolerance)

इस प्रणाली में शाफ्ट का साइज स्थिर(fix) रखा जाता है और टौलरेन्स केवल छेद(hole) के साइज पर दी जाती है |
इस प्रणाली का उपयोग अधिकतम किया जाता है | क्योंकि किसी भी मानक साइज के छेद को आसानी से और शुद्धता में बनाया जा सकता है |

शाफ्ट बेसिस टौलरेन्स (shaft basis tolerance)

इस प्रणाली में शाफ्ट का साइज स्थिर रखा जाता है|
और टौलरेन्स केवल छेद के साइज पर दी जाती है |
इस प्रणाली का उपयोग होल बेसिस प्रणाली की अपेक्षा कम किया जाता है |

दोस्तों इस पोस्ट में हमने जाना टौलरेन्स क्या है और इसके क्या लाभ है, तथा टौलरेन्स की पद्धतियां, यूनिलैटरल टौलरेन्स, बाइलेटरल टौलरेन्स, मौलिक टौलरेन्स, और टौलरेन्स जोन को विस्तार से जाना |


लिमिट क्या हैं और यह कितने प्रकार की होती है

 इस पोस्ट में हम जानेंगे की लिमिट क्या है, यह क्यों जरूरी है, और यह कितने प्रकार की होती है तथा हाई लिमिट और लो लिमिट को जानेंगे

लिमिट क्या है

जॉब को बनाते समय उसके बेसिक साइंस से कुछ कम या अधिक बनाने की छूट दी जाती है | बेसिक साइज पर स्वीकृत अधिकतम तथा न्यूनतम सीमा जिस सीमा में पार्ट के साइज बनाए जा सकते हैं, उसे लिमिट (Limit) कहते हैं|

लिमिट को धन (+) या ऋण (-) चिन्हों से दर्शाया जाता है|

लिमिट क्यों जरूरी है

कार्यशाला में जब पुर्जो का उत्पादन किया जाता है तो कारीगर को पूर्जों के बेसिक साइजों को थोड़ा सा बड़ा या छोटा बनाने की छूट दी जाती है जिससे पुर्जो(parts) की गुणवत्ता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है क्योंकि कई कारण ऐसे होते हैं जिनके कारण पूर्जों(parts) को बिल्कुल परिशुद्ध साइज में नहीं बनाया जा सकता है|

इसके अतिरिक्त यदि पार्ट को सही परिशुद्ध बना भी लिया जाता है तो समय अधिक लगता है|

इसलिए पार्ट को बनाने के लिए सीमा निर्धारित कर दी जाती है की पार्ट को बेसिक साइज से कितनी सीमा से अधिक या कम साइज में बनाया जा सकता है|

इससे कारीगर(worker) को पुर्जे(parts) को सही साइज में बनाने में आसानी रहती है और इस सीमा में बने पुर्जे(parts) सही रहते हैं और वह अपना कार्य अच्छे ढंग से करते हैं|

इसीलिए हमें लिमिट की जरूरत होती है जिससे पार्ट्स को बनाने में आसानी हो सके|

लिमिट के प्रकार (types of limit)

लिमिट दो प्रकार की होती हैं|

1. हाई लिमिट(high limit)

2. लो लिमिट(low limit)


हाई लिमिट(high limit)

किसी पार्ट्स के बेसिक साइज पर स्वीकृत सीमा जिससे पुर्जे(parts) को अधिक से अधिक जिस सीमा में उसकी साइज को बनाया जा सकता है, उसे हाई लिमिट कहते हैं|


लो लिमिट(low limit)

किसी पार्ट के बेसिक साइज पर स्वीकृत सीमा जिससे पार्ट को कम से कम जिस सीमा में उसकी साइज को बनाया जा सकता है उसे लो लिमिट कहते हैं |

limit,high-limit,low-limit


दोस्तों इस पोस्ट में हमने जाना की लिमिट क्या है, यह क्यों जरूरी है, और यह कितने प्रकार की होती है तथा हाई लिमिट और लो लिमिट, अगर आपको यह पोस्ट पसंद आया तो कृपया इसे शेयर करें और कमेंट करना ना भूलें|

धन्यवाद

स्क्रु थ्रेड का छोटा व्यास कैसे मापे

 इस पोस्ट में हम स्क्रु थ्रेड का छोटा व्यास कैसे मापे और इसे मापने वाले उपकरणों के बारे में विस्तार से जानेंगे|

स्क्रु थ्रेड का छोटा व्यास कैसे मापे

स्क्रु थ्रेड के छोटे व्यास को चेक करने के लिए विभिन्न प्रकार के मापी उपकरणों का प्रयोग किया जाता है जो इस प्रकार हैं|

1. वर्नियर कैलीपर(Vernier caliper)

2. प्रिज्म(prism)

3. स्लिप गेज तथा प्रीसीजन रोलर्स के द्वारा(slip gauge and precision rollers)

4. टेपर पैरेलल के द्वारा(by taper parallel)

5. ऑप्टिकल प्रोजेक्टर के द्वार(by optical projector)


वर्नियर कैलीपर(Vernier caliper)

वर्नियर कैलीपर की द्वारा भी बाहरी माइनर डायमीटर चेक किया जा सकता है|

इसमें वर्नियर कैलीपर की नाइफ एज प्वाइंटों के द्वारा मापा जाता है|

प्रिज्म(prism)

प्रिज्म की 3 पॉइंट से भी थ्रेड के माइनर डायमीटर को चेक किया जा सकता है|

Prism-se-chudi-mapna



यह प्रिज्म अलग-अलग साइजों मैं उपलब्ध होती हैं, जिससे साइजों के अनुसार ही थ्रेड चेक की जाती है|

स्लिप गेज तथा प्रीसीजन रोलर्स के द्वारा(slip gauge and precision rollers)

इस विधि में नट या बेलनाकार चूड़ीदार पार्ट के अंदर स्लिप गेज को सेट इस तरह किया जाता है कि रोलर्स को स्लाइड नहीं कर सके |

Slip-gauge-and-precision-rollers

इस विधि में रोलर तथा स्लिप गेज को प्रयोग करते समय व्यास के प्रीसीजन रोलर को बोल्ट के व्यास में विपरीत साइड में सेट किया जाता है|

टेपर पैरेलल के द्वारा(by taper parallel)

इस विधि में आंतरिक बेलनाकार चूड़ी के बीच में टेपर पैरेलल को फंसा कर सेट किया जाता है|

taper-paraller

इसकी सही सेटिंग के बाद आउटसाइड माइक्रोमीटर के द्वारा माप लिया जाता है|

ऑप्टिकल प्रोजेक्टर के द्वार(by optical projector)

Optical-projector


इस विधि में बाहरी इस ग्रुप ट्रेड की प्रोफाइल को उत्तल लेंस द्वारा बड़ा करके देखने पर उसकी प्रतिबिंब की कौण को प्रोजेक्टर के द्वारा स्क्रीन पर स्पष्ट देख सकते हैं और कौण को आसानी से मापा जा सकता है|

चूड़ियों (थ्रेड) को चेक करने के लिए मापने वाले यंत्र

 इस पोस्ट में हम चूड़ियों (थ्रेड) को चेक करने के लिए मापने वाले यंत्र जैसे- स्क्रु पिच गेज, थ्रेड गेज, रिंग गेज, स्क्रु थ्रेड कैलीपर गेज, स्क्रु थ्रेड माइक्रोमीटर, थ्री वायर विधि आदि के बारे में विस्तार से जानेंगे |

चूड़ियों (थ्रेड) को चेक करने के लिए मापने वाले यंत्र

चूड़ी बनाने के बाद उनकी एक्यूरेसी एवं उनकी उपयोगिता के आधार पर जो एक निश्चित माप होनी चाहिए उसको चेक करने के लिए हम चूड़ियों को विभिन्न प्रकार के गेज के माध्यम से जांच करते हैं जो निम्नलिखित हैं|
1. स्क्रु पिच गेज(screw pitch gauge)
2. थ्रेड गेज(thread gauge)
3. थ्रेड रिंग गेज(thread ring gauge)
4. स्क्रु थ्रेड कैलीपर गेज(screw thread caliper gauge)
5. स्क्रु थ्रेड माइक्रोमीटर(screw thread micrometre)
6. थ्री वायर विधि(3 wire process)

स्क्रु पिच गेज(screw pitch gauge)

screw-pitch-gauge
screw-pitch-gauge


स्क्रु पिच गेज के द्वारा चूड़ी के आंतरिक भाग तथा बाहरी भाग को चेक किया जाता है |
इसमें पिच के अनुसार अलग-अलग ब्लेड लगे होते हैं तथा इन ब्लेडो पर नंबर और साइज लिखा होता है|
पिच की शुद्धता चेक करने के लिए स्क्रु पिच गेज एक अच्छा साधन है|

थ्रेड गेज(thread gauge)

थ्रेड गेज से यह चेक किया जाता है की चूड़ी की दी गई टोलरेंस लिमिट में है अथवा नहीं |
इस गेज से किसी जॉब की आंतरिक चूड़ियों को चेक किया जाता है|
Thread-gauge


इस गेज के GO सिरे की तरफ से प्रोफाइल कौण, पिच, मेजर डायमीटर, माइनर डायमीटर, और प्रभावी व्यास आदि को चेक किया जाता है|

थ्रेड रिंग गेज(thread ring gauge)

यह गेज GO तथा NOT GO दो गेज के सेट के रूप में मिलते हैं|
Thread-ring-gauge


थ्रेड रिंग गेज की सहायता से बाहरी चूड़ियों को शुद्धता से चेक किया जा सकता है|
इसके द्वारा यह चेक किया जाता है कि किसी जॉब कि थ्रेड दी गई टोलरेंस लिमिट में है अथवा नहीं|

स्क्रु थ्रेड कैलीपर गेज(screw thread caliper gauge)

इस गेज का इस्तेमाल(उपयोग) अन्य गेजो की तुलना में अधिक किया जाता है|
इस प्रकार की गेज का प्रयोग बाहरी चूड़ियां चेक करने के लिए किया जाता है|
Screw-thread-caliper-gauge


स्क्रु थ्रेड कैलीपर गेज 2 एंन्विल  लगे होते हैं, जिनके बीच में चूड़ियों को लगाकर चेक किया जाता है|
यह गेज एक उच्च प्रभावी गेज होता है|

स्क्रु थ्रेड माइक्रोमीटर(screw thread micrometre)

यह माइक्रोमीटर आउटसाइड माइक्रोमीटर की तरह ही बना होता है|
Screw-thread-micrometre


इसके द्वारा स्क्रु थ्रेड के प्रभावी व्यास(effective diameter) को चेक किया जा सकता है|
इस माइक्रोमीटर की एंन्विल तथा स्पिंडल के प्वाइंटों को बदला जा सकता है|

थ्री वायर विधि(three wire process)

यह एक प्रकार का आउटसाइड माइक्रोमीटर होता है|
इसके स्पिंडल के सिरे पर एक तार(wire) तथा एंन्विल के सिर पर दो तार होल्डरों में फिक्स होते हैं|

three-wire-process
three-wire-process


यह तीनों तार उच्च डिग्री की शुद्धता पर फिनिश करके बनाए जाते हैं|
इस विधि से थ्रेड के प्रभावी व्यास तथा फ्लैंक की आकार को चेक किया जाता है|

दोस्तों इस पोस्ट में हमने जाना चूड़ियों (थ्रेड) को चेक करने के लिए मापने वाले यंत्र के बारे में अगर आपको यह पोस्ट अच्छा लगा तो शेयर करें |

धन्यवाद

चाल के आधार पर चूड़ियों के प्रकार तथा पिच और लीड में अंतर

इस पोस्ट में हम चाल के आधार पर चूड़ियों के प्रकार तथा पिच और लीड के बीच अंतर एवंम सिंगल स्टार्ट चुड़ी तथा मल्टी स्टार्ट चूड़ियों में अंतर के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे|

चाल के आधार पर चूड़ियों के प्रकार

चाल के आधार पर चूड़ियां तीन प्रकार की होती हैं
1. सिंगल स्टार्ट थ्रेड(single start thread)
2. डबल स्टार्ट थ्रेड(double start thread)
3. मल्टी स्टार्ट थ्रेड(multi start thread)

सिंगल स्टार्ट थ्रेड(single start thread)

इन चूड़ियों में चूड़ी केवल एक स्थान से शुरू होकर अंत तक चली जाती है|
सिंगल स्टार्ट थ्रेड चूड़ी की लीड चूड़ी के पिच के बराबर होती है|

डबल स्टार्ट थ्रेड(double start thread)

डबल स्टार्ट थ्रेड मैं चूड़ी कि लीड चूड़ी की पिच के 2 गुना हो जाती है|
इस प्रकार की चूड़ियों में दो चूड़ियां दो अलग-अलग स्थानों से शुरू होकर अंत तक चली जाती हैं|

मल्टी स्टार्ट थ्रेड(multi start thread)

मल्टी स्टार्ट थ्रेड मे तीन या अधिक चूड़ियां अलग-अलग स्थानों से शुरू होकर अंत तक चली जाती है|
इन चूड़ियों में जितने स्टार्ट की चूड़ियां होती हैं उसमें लीड उस की पिच की उतने ही गुनी हो जाती है, जैसे- तीन स्टार्ट वाली चूड़ी की पिक्चर की तीन गुनी होगी|

पिच और लीड में अंतर(difference between pitch and lead)

1. पिच(pitch)

एक चूड़ी के केंद्र से दूसरी चूड़ी तक के बीच की दूरी को पिच कहते हैं |
पिच चूड़ियों के प्रति इन संख्या पर निर्भर करती है अर्थात पिच= 1/T.P.I.
एक मुंह वाली चूड़ी की पिच व लीड समान होती है|

लीड(Lead)

बोल्ट या पेच एक चक्कर पूरा करने में अपनी दूरी पर जितनी दूर आगे पीछे बड़ता है, उस दूरी को लीड कहते हैं |
लीड चूड़ी की पिक और उसके स्टार्ट पर निर्भर करती है अर्थात लीड= पिच×नंबर ऑफ स्टार्ट
जितने मुंह की चूड़ी होती है लिड पिच से उतनी ही गुना होती है |

सिंगल स्टार्ट चुड़ी तथा मल्टी स्टार्ट चूड़ियों में अंतर(difference between single start thread and multi start thread)

इकहरी चाल चूड़ी(single start thread)

यह एक चाल की चूड़ी होती है |
इन चूड़ियों का प्रारंभिक सिरा एक होता है |
इकहरी चाल चूड़ियां की पूरी लंबाई मैं केवल एक ही चूड़ी शुरू से अंत तक चलती है |
इकहरी चाल चूड़ी मैं लीड और पिच बराबर होते हैं|
यह चूड़ियां दो या दो से अधिक पार्ट्स को जोड़ने के लिए प्रयोग की जाती है|

बहु चाल चूड़ी(multi start thread)

यह चूड़ियां एक से अधिक चाल की जुड़ी होती है|
इन चूड़ियों में एक से अधिक प्रारंभिक सिरे होते हैं|
बहु चाल चूड़ी में समान दूरी पर दो या तीन या इससे अधिक एक ही माप वाली अलग-अलग चूड़ियां एक दूसरे के समांतर चलती हैं |
इस प्रकार की चूड़ी मे जितनी चूड़ियां अधिक होती है लिड उतनी ही गुना हो जाती है|
यह चूड़ियां शीघ्र चाल(quick drive) हेतु प्रयोग में लाई जाती है |

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धन्यवाद

डायल टेस्ट इन्डिकेटर के सिद्धांत, भागों के नाम, अल्पतमांक, और प्रकार,

दोस्तों इस पोस्ट में हम जानेंगे डायल टेस्ट इन्डिकेटर के सिद्धांत उसके भागों के नाम, डायल टेस्ट इंडिकेटर का अल्पतमांक, और उसके प्रकारों के बारे में |

डायल टेस्ट इंडिकेटर | dial test indicator

यह एक सूक्ष्म मापी यंत्र होता है|
डायल टेस्ट इंडिकेटर को डायल गेज या इन्डिकेटर गेज भी कहते हैं|
डायल टेस्ट इंडिकेटर का उपयोग किसी कार्य खंड्या जॉब के प्रष्ठ(surface), की समतलता (flatness), समानांतरता(parallelism), टेपरनैस(ढलान) छड़ों की उभारपन(ovelness), सीधापन(straightness) चेक करने में किया जाता है|इसके अलावा लेथ मशीन पर जॉब की सत्यता(trueness) भी चेक कर सकते हैं|

डायल टेस्ट इंडिकेटर का अल्पतमांक | dial test indicator list count

डायल टेस्ट इंडिकेटर का अल्पतमांक मीट्रिक प्रणाली में 0.01 मिलीमीटर तथा इससे भी अधिक परिशुद्धता में 0.001 मिली मीटर होता है|
और ब्रिटिश प्रणाली में इसका अल्पतमांक 0.001 इंच तथा इससे भी अधिक परिशुद्धता में 0.0001 इंच होता है|

डायल टेस्ट इंडिकेटर की नीडिल के चक्कर निकालने का सूत्र

मीट्रिक प्रणाली में=ड्राइवर/ड्रिवन

ब्रिटिश प्रणाली में=ड्रिवन/ड्राइवर

डायल टेस्ट इंडिकेटर का सिद्धांत | principle of dial test indicator

डायल टेस्ट इंडिकेटर रैंक और पीनियन के सिद्धांत पर कार्य करता है अथवा डायल टेस्ट इंडिकेटर में रैंक ओर पिनियन के द्वारा साइज के अंतर को यांत्रिक विधि (mechanical process) के द्वारा बड़ा करके डायल पर दिखाया जाता है|


डायल टेस्ट इंडिकेटर के भागों के नाम | dial test indicator parts name

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Dial-test-indicator-ke-bhag


1. प्वाइंटर(pointer)
2. घूमने वाला बैजल(rotateble bazzel)
3. बैजल क्लेम्प(bazzel clamp)
4. बैक लग(back lug)
5. ट्रांसपेरेंट डायल कवर(transparent dial cover)
6. स्टैम(stam)
7. प्लंजर(plunger)
8. एन्वील(anvil)
9. रिवोलवेशन काउंटर(Revolvation counter)

डायल टेस्ट इंडिकेटर के प्रकार | types of dial test indicator

1. प्लन्जर टाइप डायल टेस्ट इंडिकेटर (plunger type dial test indicator)
2. लीवर टाइप डायल टेस्ट इंडिकेटर(lever type dial test indicator)

प्लन्जर टाइप डायल टेस्ट इंडिकेटर (plunger type dial test indicator)
प्लन्जर टाइप डायल टेस्ट इंडिकेटर एक साधारण डायल टेस्ट इंडिकेटर होता है ऊपर दिखाए गए सभी भाग प्लन्जर टाइप डायल टेस्ट इंडिकेटर की ही भाग है|

लीवर टाइप डायल टेस्ट इंडिकेटर(lever type dial test indicator)

इस प्रकार का डायल टेस्ट इंडिकेटर लीवर और स्क्रोल की चाल पर निर्भर करता है|
इसके अगले सिरे पर एक स्टाइलस लगा होता है तथा स्टाइलस के अगले भाग पर एक गेंद बनी होती है |
लीवर टाइप डायल टेस्ट इंडिकेटर का उपयोग ऐसी जगह किया जाता है, जहां पर प्लन्जर टाइप डायल टेस्ट इंडिकेटर का प्रयोग नहीं किया जा सकता हो|

लीवर टाइप डायल टेस्ट इंडिकेटर के भाग | parts name of lever type dial test indicator

लीवर टाइप डायल टेस्ट इंडिकेटर के मुख्यत: 10 भाग होते हैं| 
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Lever-type-dial-test-indicator-ke-bhag

1. होल्डर(holder)
2. बॉडी(body)
3. स्टाइलस(stylus)
4. डायल(dial)
5. घूमने वाला बैजल(rotateble bazzel)
6. पीवट(pivet)
7. लिवर(lever)
8. नीडिल(needle)
9. स्क्रोल(scroll)
10. रिटर्न स्प्रिंग(return spring)

डायल टेस्ट इंडिकेटर के आधार

कार्य एवं उपयोग के अनुसार डायल टेस्ट इंडिकेटर के साथ विभिन्न प्रकार के आधार प्रयोग किए जाते हैं जो मुख्यतः है|
1. ठोस आधार(solid base)
2. समतल आधार(plane base)
3. वी प्रकार का आधार(v type base)
4. लचीला पोस्ट चुंबक सहित(flexible post with magnetic stand)


डायल टेस्ट इंडिकेटर के साथ अटैचमेंट (attachment)

डायल टेस्ट इंडिकेटर के साथ निम्नलिखित अटैचमेंट प्रयोग किए जाते हैं| 
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Dial-test-indicator-attachment


1. सी क्लैम्प (c clamp)
2. स्तंभ(piller)
3. इंडिकेटर(indicator)
4. लीवर(lever)
5. कैस या डायल(case or dial)
6. स्नग(snug)

डायल टेस्ट इंडिकेटर के स्टेण्ड के प्रकार | types of dial test indicator stand

डायल टेस्ट इंडिकेटर के साथ तीन प्रकार के स्टैंड प्रयोग किए जाते हैं| 
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Universal-clamp-sahit-chumbakiy-stand


1. यूनिवर्सल क्लेम सहित चुंबकीय स्टैंड(magnetic stand with universal clamp)

Lachile-post-sahit-chumbakiy-stand,magnetic-stand-with-flexible-post
Lachile-post-sahit-chumbakiy-stand


2. लचीले पोस्ट सहित चुंबकीय स्टैंड(magnetic stand with flexible post)

Cast-iron-base-ke-sath-sadharan-holder,general-purpose-holder-with-cast-iron-base
Cast-iron-base-ke-sath-sadharan-holder


3. कास्ट आयरन बेस के साथ साधारण होल्डर(general purpose holder with cast iron base)


दोस्तों आपको हमारी यह पोस्ट कैसी लगी इस पोस्ट के बारे में कोई सुझाव व शिकायत हो तो इसके लिए अब हमें कमेंट करें|
धन्यवाद

SAFETY SYMBOL | सुरक्षा संकेत

सुरक्षा संकेत

 हेलो दोस्तों आज हम जानेंगे सुरक्षा संकेतों के बारे में सुरक्षा संकेतों के जरिए हमें पता लगता है कि हमें किस चीज को हाथ लगाना है और किसे नहीं किसी वर्कशॉप कार्यशाला में इनका बहुत महत्व होता हैं तथा किसी भी ड्राइवर (driver exam) की भर्ती मे इस बारे में पूछा जाता है |

SAFETY SYMBOL, ppe
SAFETY SYMBOL


क्योंकि प्रत्येक कारीगर को यह सुनिश्चित नहीं होता कि उसे किस चीज को छूना है और किसी नहीं उसे मौखिक रूप से समझाएं गए निर्देशों को वह भूल भी सकता है

किंतु कार्यशाला में जो सुरक्षा संकेत लगाए जाते हैं उनसे वह भली-भांति यह जान पाता है कि उसे किस चीज से खतरा है और किस से नहीं

आइए देखते हैं विभिन्न प्रकार की सुरक्षा संकेतों के बारे में

सुरक्षा संकेत

1. निषेधात्मक संकेत(prohibition symbols)

SAFETY SYMBOL, nishedhatmak Sanket
SAFETY SYMBOL


यह संकेत लाल रंग की बॉर्डर तथा क्रॉसबार और सफेद पृष्ठभूमि पर काली आकृति से प्रदर्शित किए जाते हैं इनके द्वारा किसी कार्य को करने को मना किया जाता है
 जैसे - do not run, do not smoke आदि

2. अनिवार्य संकेत(mandatory symbols)

SAFETY SYMBOL, mandatory symbols, anivarya Sanket
SAFETY SYMBOL


इनके द्वारा कारीगर को सुरक्षात्मक संकेत दिए जाते हैं यह संकेत नीली पृष्ठभूमि पर सफेद संघ के द्वारा वृत्त के अंदर बनाए जाते हैं
जैसे- हेलमेट पहनने का निशान

3.चेतावनी संकेत(warning symbol)



इनके द्वारा कारीगर को चेतावनी दी जाती है यह त्रिभुजाकार आकृति में पीली पृष्ठभूमि पर काले चित्र बनाकर प्रदर्शित किए जाते हैं
जैसे - risk of fire, risk of shock 

4. सूचनात्मक संकेत (informational symbol)

यह संकेत कारीगर को विशेष सूचना देते हैं इन्हें वर्गाकार आकृति में हरी पृष्ठभूमि पर सफेद रंग की आकृति द्वारा प्रदर्शित किया जाता है जैसे-exit, first add, enter

तो दोस्तों यह था हमारा आज का ब्लॉक जिसमें हमने सुरक्षा चिन्हों के बारे में बेसिक नॉलेज प्राप्त की लगातार इसी तरह के ब्लॉक देखने के लिए कृपया हमेशा स्क्राइब करें
तथा यह ब्लॉग आपको कैसा लगा हमें कमेंट जरूर करें
धन्यवाद


Fitter theory (safety) PPEs

 PPEs

हेलो दोस्तों आज हम बात करेंगे फिटर थ्योरी के पहले भाग दोस्तों  फिटर थ्योरी की प्रथम अध्याय में हम सेफ्टी के बारे में पड़ेंगे

दोस्तों सुरक्षा के लिए पहने गए उपकरणों कोPPEs का नाम दिया गया है

PPEs क्या है|what is PPEs

इसका अर्थ है व्यक्तिगत सुरक्षा साधन(personal protective equipment) जैसे कपडे हेलमेट जूते आदी


पीपीई के प्रकार जिनका आप उपयोग कर सकते हैं


नयन ई

खतरा

रासायनिक या धातु छप, धूल, प्रक्षेप्य, गैस और वाष्प, विकिरण

विकल्प

सुरक्षा चश्मा, काले चश्मे, चेहरे की स्क्रीन, फ़ेशियल, विज़र्स

ध्यान दें

सुनिश्चित करें कि चुनी गई आंखों की सुरक्षा में कार्य के लिए प्रभाव / धूल / छप / पिघली हुई धातु की आंख की सुरक्षा का सही संयोजन है और उपयोगकर्ता को ठीक से फिट बैठता है

सर और गर्दन

खतरा

गिरने या उड़ने वाली वस्तुओं से प्रभाव, सिर के टकरा जाने का खतरा, मशीनरी में बाल उलझ जाना, रासायनिक टपकना या छींटे, जलवायु का तापमान

विकल्प



औद्योगिक सुरक्षा हेलमेट, बम्प कैप, हेयरनेट और अग्निशामक के हेलमेट

ध्यान दें

  • कुछ सुरक्षा हेलमेट विशेष रूप से डिजाइन किए गए आंख या श्रवण सुरक्षा के साथ शामिल किए जाते हैं या फिट किए जा सकते हैं
  • गर्दन की सुरक्षा मत भूलना, जैसे वेल्डिंग के दौरान उपयोग के लिए स्कार्फ
  • क्षतिग्रस्त होने पर सिर की सुरक्षा बदलें

कान

खतरा

शोर - ध्वनि के स्तर और एक्सपोज़र की अवधि का एक संयोजन, बहुत उच्च-स्तरीय ध्वनियां छोटी अवधि के साथ भी एक खतरा हैं

विकल्प

इयरप्लग, ईयरमफ्स, सेमी-इंसर्ट / कैनाल कैप्स

ध्यान दें

  • काम के प्रकार के लिए सही श्रवण रक्षक प्रदान करें, और सुनिश्चित करें कि श्रमिकों को पता है कि उन्हें कैसे फिट करना है
  • सुरक्षा और संचार के लिए अनुमति देते समय सुरक्षा कवच चुनें जो एक स्वीकार्य स्तर तक शोर को कम करते हैं

हाथ और बांह


खतरा



घर्षण, तापमान चरम, कटौती और पंचर, प्रभाव, रसायन, बिजली के झटके, विकिरण, जैविक एजेंटों और पानी में लंबे समय तक विसर्जन

विकल्प

दस्ताने, एक कफ, गंटलेट और आस्तीन के साथ दस्ताने, जो भाग या सभी हाथ को कवर करते हैं

ध्यान दें

  • दस्ताने से बचें जब ऑपरेटिंग मशीन जैसे बेंच ड्रिल करते हैं जहां दस्ताने पकड़े जा सकते हैं
  • कुछ सामग्री रसायनों द्वारा जल्दी से प्रवेश कर जाती हैं - चयन में ध्यान रखें, एचएसई की त्वचाा को देखें
  • बैरियर क्रीम अविश्वसनीय हैं और उचित पीपीई के लिए कोई विकल्प नहीं हैं
  • लंबे समय तक दस्ताने पहनने से त्वचा गर्म और पसीने से तर हो सकती है, जिससे त्वचा की समस्याएं हो सकती हैं। अलग-अलग सूती भीतरी दस्ताने का उपयोग करने से इसे रोकने में मदद मिल सकती है

पैर और पैर

खतरा

गीली, गर्म और ठंडी स्थिति, इलेक्ट्रोस्टैटिक बिल्ड-अप, फिसल, कट और पंचर, गिरने वाली वस्तुएं, भारी भार, धातु और रासायनिक छप, वाहन

विकल्प

सुरक्षा जूते और सुरक्षात्मक टापैप्स और पैठ-प्रतिरोधी, मध्य-एकमात्र वेलिंगटन जूते और विशिष्ट जूते, जैसे फाउंड्री जूते और जंजीरों के जूते

ध्यान दें

  • विभिन्न प्रकार की परिस्थितियों में तेल या रासायनिक प्रतिरोधी तलवों को रोकने में मदद करने के लिए जूते में विभिन्न प्रकार के एकमात्र पैटर्न और सामग्री हो सकती है। यह विरोधी स्थैतिक, विद्युत प्रवाहकीय या थर्मल रूप से इन्सुलेट भी हो सकता है
  • पहचाने गए जोखिमों के लिए उपयुक्त जूते का चयन किया जाना चाहिए

फेफड़े

खतरा

  • ऑक्सीजन की कमी वाले वातावरण, धूल, गैस और वाष्प

विकल्प - श्वसन सुरक्षा उपकरण (RPE)

  • कुछ श्वासयंत्र कार्यस्थल की हवा से दूषित पदार्थों को छानने पर भरोसा करते हैं। इनमें साधारण फ़िल्टरिंग फेसपीस और रेस्पिरेटर और पावर-असिस्टेड रेस्पिरेटर शामिल हैं
  • सुनिश्चित करें कि यह ठीक से फिट बैठता है, उदाहरण के लिए तंग-फिटिंग श्वासयंत्र (फ़िल्टरिंग फेसपीस, आधा और पूर्ण मास्क)
  • श्वसन तंत्र के भी प्रकार होते हैं जो सांस लेने वाली हवा की एक स्वतंत्र आपूर्ति देते हैं, उदाहरण के लिए ताज़ी हवा की नली, संपीड़ित एयरलाइन और स्व-निहित श्वास उपकरण

ध्यान दें

  • सही प्रकार के रेस्पिरेटर फ़िल्टर का उपयोग किया जाना चाहिए क्योंकि प्रत्येक पदार्थ की एक सीमित श्रृंखला के लिए प्रभावी है
  • फिल्टर का एक सीमित जीवन होता है। जहां ऑक्सीजन की कमी है या हानिकारक धुएं के उच्च स्तर के कारण चेतना खोने का कोई खतरा है, केवल श्वसन तंत्र का उपयोग करें - कभी भी फ़िल्टरिंग कारतूस का उपयोग न करें
  • आपको एक सीमित स्थान पर या कार्य क्षेत्र में ऑक्सीजन की कमी का मौका होने पर श्वास तंत्र का उपयोग करने की आवश्यकता होगी
  • यदि आप श्वसन सुरक्षा उपकरण का उपयोग कर रहे हैं, तो काम पर एचएसई के प्रकाशन 

पूरा शरीर

खतरा

गर्मी, रासायनिक या धातु के छींटे, दबाव लीक या स्प्रे बंदूक से स्प्रे, दूषित धूल, प्रभाव या पैठ, अत्यधिक पहनने या अपने कपड़ों के उलझने

विकल्प

पारंपरिक या डिस्पोजेबल चौग़ा, बॉयलर सूट, एप्रन, रासायनिक सूट


दोस्तों यह तो हमारा आज का ब्लॉक आपको हमारा ब्लॉक कैसा लगा कर के हम ही कमेंट जरुर करें

धन्यवाद



आधार कार्ड में दस्तावेज़ अपलोड Document upload in Aadhar Card

 इस पोस्ट में हम जानेगे आधार कार्ड में दस्तावेज़ अपलोड करना क्यों जरुरी है और आधार कार्ड में दस्तावेज़ अपलोड करने की प्रक्रिया क्या है | आधा...