स्नेहक (LUBRICANTS) के गुण तथा प्रकार

 

इस पोस्ट में हम जानेंगे स्नेहक(lubricants) क्या होते है लुब्रिकेंट्स के उद्देश्य तथा lubricants कितने प्रकार के होते हैं |

स्नेहक क्या होते हैं (introduction of lubricants)

जब दो पुर्जे (parts) आपस में रगड़ खाकर चलते हैं तो उनके बीच उत्पन्न होने वाले घर्षण को कम करने के लिए जो तरीके अपनाए जाते हैं उन्हें स्नेहक (lubricants) कहां जाता है |
जब किसी मशीन के दो पुर्जे (parts) आपस में रगड़ खाकर चलते हैं तो जल्दी घिस जाते हैं और खराब हो जाते हैं इन पुर्जो (parts) के बीच घर्षण को कम करने के लिए स्नेहको का प्रयोग किया जाता है|
स्नेहक के उचित प्रयोग से इनमें घर्षण कम होता है जिससे यह पुर्जे अधिक समय तक खराब नहीं होते तथा कम घिसते हैं|
स्नेहक(lubricant) के द्वारा पुर्जो के बीच में बहुत पतली परत बनाई जाती है यह परत संपर्क सतहो को अलग-अलग रखती है और पुर्जे घर्षण से बच जाते है |

स्नेहक के उद्देश्य (objects of lubricant)

स्नेहक के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं
1. मशीन या पुर्जे parts गर्म होने से बच जाते हैं |
2. मशीन या पुर्जो की गति बढ़ती है क्योंकि स्नेहक के उपयोग से गति प्रतिरोध कम होता है |
3. मशीन की यथार्थता बढ़ती है |
4. मशीन कम शक्ति खर्च करती है |
5. मशीन की उत्पादन क्षमता बढ़ती है |
6. मशीन या पुर्जो पर जंग नहीं लगता है |
7. मशीन के पार्ट्स कम घिसते हैं |

स्नेहक के गुण (properties of lubricants)

स्नेहक lubricants के मुख्यत 9 गुण होते हैं जो निम्नलिखित हैं |
1. श्यानता (viscosity)
2. चिकनाहट (oiliness)
3. स्फुरण बिंदु(flash point)
4. बहाव बिंदु (pour point)
5. अग्नि बिंदु(fire point)
6. वाष्पशीलता (volatality)
7. रासायनिक स्थिरता (chemical stability)
8. अम्लीयता (acidity)
9. इमल्सीफिकेशन (emulsification)

श्यानता (viscosity)

एक स्नेहक(lubricant) जब गति करता है तो इसके कण एक-दूसरे की गति का विरोध करते हैं | जिससे घर्षण प्रतिरोध उत्पन्न होता है, इसे ही श्यानता (viscosity)का गुण कहा जाता है |
अगर दूसरे शब्दों में कहा जाए तो किसी द्रव की आपेक्षिक तरलता को ही उसकी श्यानता कहा जाता है|
कम श्यानता वाले स्नेहक पतले होते हैं और आसानी से बह सकते हैं | जबकि अधिक से श्यानता वाले स्नेहक गाढे होती हैं और इनके बहने की क्षमता भी कम होती है |

चिकनाहट (oiliness)

किसी स्नेहक या तेल की परत सॉफ्ट की गति से उत्पन्न होती है जब सॉफ्ट स्थिर रहती है तो स्नेहक की परत हटकर निचली सतह पर जमा हो जाती है फिर भी ऊपरी सतह पर चिकनाहट रहती है |
यह क्रिया स्नेहक की चिकनाहट पर निर्भर करती है जिसके कारण वह स्नेहक का गीलापन छोड़ती है |
चिकनाहट के अभाव के कारण पुर्जों आदि में थोड़ी बहुत गिरावट आ सकती है |इसलिए चिकनाहट oiliness स्नेहक का वह गुण होता है, जिससे सतहे है चिकनी रहती है |

स्फुरण बिंदु(flash point)

स्फुरण बिंदु(flash point) वह तापमान होता है जिस पर स्नेहक गर्म होकर भाप के रूप में बदलने लगता है और बिना आग लगाए स्वत: ही आग पकड़ लेता है |
सभी स्नेहको का स्फुरण बिंदु(flash point) अलग अलग होता है
इसलिए एक अच्छे स्नेहक में अधिक स्फुरण बिंदु(flash point) होना आवश्यक है |

बहाव बिंदु (pour point)

वह तापमान जिस पर स्नेहक ठंडा होकर गाढ़ा हो जाता है तथा उसका बहाव रुक जाता है उसे बहाव बिंदु (pour point) कहा जाता है |
वे मशीनें जो निम्न टेंपरेचर के लिए उपयोग में ली जाती हैं उनमें इनका महत्व अधिक होता है | जैसे - बर्फ बनाने वाली मशीन तथा रेफ्रिजरेटर

अग्नि बिंदु(fire point)

वह तापमान जिस पर स्नेहक की वाष्प जलने लगती है और तेल आग पकड़ लेता है उसे हम अग्नि बिंदु(fire point) कहते हैं |

वाष्पशीलता (volatality)

यह स्नेहक का वह गुण होता है, जिसके कारण उसके भार में कमी आ जाती है |एक अच्छे स्नेहक की वाष्पशीलता (volatality) कम होनी चाहिए |

रासायनिक स्थिरता (chemical stability)

किसी एक अच्छे स्नेहक में उच्च स्थिरता होनी चाहिए और इसका किसी भी स्थिति में अपघटन या ऑक्सीकरण नहीं होना चाहिए जिससे गाढ़ा होने से इसके बहाव में कमी ना आए |

अम्लीयता (acidity)

स्नेहक में यदि अमल की मात्रा स्वतंत्र रूप से होगी तो सताह खराब होने से घर्षण बढ़ता है |
स्नेहा को अमल की मात्रा होने पर जंग लगने से सतह खराब हो सकती है |
इसलिए एक अच्छे स्नेहक में प्रत्यक्ष रूप से अमल नहीं होना चाहिए |

इमल्सीफिकेशन (emulsification)

जब कोई स्नेहक पानी के साथ मिलता है तो उसे इमल्सीफिकेशन (emulsification) कहते हैं |
एक अच्छी किस्म के स्नेहक में पानी नहीं खुलता है
इमल्सीफिकेशन (emulsification) की भाप इंजन, भाप टरबाइन या हाइड्रॉलिक टरबाइन आदी में होने की संभावना ज्यादा होती है |

स्नेहक के प्रकार (types of lubricants)

स्नेहको को तीन श्रेणियों में बांटा गया है जो निम्नलिखित है|
1. द्रव स्नेहक (liquid lubricants)
2. अर्ध ठोस स्नेहक (semi solid lubricant)
3. ठोस स्नेहक (solid lubricant)

1. द्रव स्नेहक (liquid lubricants)

द्रव स्नेहको को निम्नलिखित प्रकार से बांटा गया है|
A. कार्बनिक तेल (organic oil)
B. खनिज तेल (mineral oil)
C. कृत्रिम तेल (synthetic oil)

कार्बनिक तेल (organic oil)

कार्बनिक तेल को फैटी ऑयल या स्थिर आयल भी कहते हैं|
यह कार्बनिक तेल (organic oil) पशु(animal) वनस्पति और मछलियों से प्राप्त किए जाता हैं|
मछलियों के सिर से निकाला गया तेल भी स्नेहक के रूप में प्रयोग किया जाता है |

कार्बनिक तेल के गुण (properties of organic oil)

यह तेल अत्यधिक कीमती होता है |
नमी वाली वायु या जलीय साधन से जलयुक्त होने की प्रकृति के कारण क्रिया में अम्लीय होता है |
वायु के संपर्क में ऑक्सीजन * करने तथा गाढ़ा होने की अधिक प्रवृत्ति होती है |
यह तेल के छेद hole को बंद कर देता है |

खनिज तेल (mineral oil)

यह तेल पेट्रोलियम से प्राप्त होते हैं तथा यह पैराफिन या नैफ्थनिक तेल होते हैं |
नैफ्थनिक तेलो की अपेक्षा पैराफिन तेल उच्च तापमान पर स्वच्छता से टिकते हैं |
तापमान में वृद्धि के साथ पैराफिन तेलों की अपेक्षा नैफ्थनिक तेल स्नेहक के लिए निम्नलिखित स्तर के होते हैं|
कार्बनिक तेलों की अपेक्षा खनिज तेलों की श्यानता कम होती है | इसलिए इन्हें क्रूड आयल (crude oil) भी कहा जाता है |
खनिज तेलों की श्यानता की परास अधिक होती है तथा यह कम चिपचिपा और कार्बनिक तेलों से अधिक चिकनाहट वाला होता है |
इनकी क्षमता को बढ़ाने और इनको भारी बनाने के लिए इनमें 5% से 25% तक कार्बनिक तेलों को मिलाया जाता है जिसे संयुक्त तेल (compound oil) कहते हैं|
उपयोग के आधार पर खनिज तेल नो को पेट्रोलियम स्नेहक के रूप में निम्नलिखित रुप में कर सकते हैं |
सर्कुलेटिंग आयल, गियर आयल, मशीन या इंजन आयल, रेफ्रिजरेशन आयल, स्पिंडल ऑयल, स्टीम सिलेंडर ऑयल, वायर रोप स्नेहक आदि |

कृत्रिम तेल (synthetic oil)

सिंथेटिक ऑयल महंगे होते और इनका उपयोग सीमित स्थानों पर किया जाता है |
यह पोलीएल्कालीन ग्लेकोस तथा योगिक सिलिकॉन होते हैं|
यह सिलिकन कोल और बालू से तैयार किए जाते हैं |
इनमें सिलीकान कार्बाईड को अलग-अलग तत्वों के साथ सिलिकन और ऑक्सीजन में रासायनिक क्रिया द्वारा बदल दिया जाता है, जिसे सिलिकॉन स्नेहक कहते हैं |

2. अर्ध ठोस स्नेहक (semi solid lubricant)

यह स्नेहक साबुन के समान गाढ़ा खनिज तेल होता है |
यह तेल की अपेक्षा उच्च श्यानता वाला होता है |
इसके द्वारा अलग-अलग प्रकार की ग्रीस तैयार की जाती है|
इसे गाढा बनाने के लिए इसमें पेट्रोलियम और कृत्रिम तेल मिलाए जाते हैं |
इसमें सोडियम, कैल्शियम, एलमुनियम, बेरियम, लिथियम, और स्ट्रान्सियम के साबुन फैट मिलाये जाते है|
यह साबुन फैट और धातु आधार की रासायनिक क्रिया की उपज होते हैं |
अर्थ ठोस स्नेहक अर्थात ग्रीस का उपयोग उन स्थानों पर किया जाता है जहां पर उच्च तापमान पैदा होता है और जिसमें द्रर्व स्नेहको का प्रयोग करना संभव न हो |

3. ठोस स्नेहक (solid lubricant)

ऐसी जगह जहां दबाव व तापमान के कारण जहां तेल परत नहीं बन पाती, ऐसी जगह घर्षण को कम करने के लिए  ठोस स्नेहक (solid lubricant) का प्रयोग किया जाता है|
इस प्रकार के ठोस स्नेहक का प्रयोग अकेले अथवा इनके साथ तेल या ग्रीस मिलाकर किया जाता है | इसका सबसे अच्छा उदाहरण ग्रेफाइट होता है |
ग्रेफाइट के अलावा ठोस स्नेहक जैसे - सॉपस्टोन, टेल्क, वैक्स, माइका, और फ्रेंच चौक आदि होते हैं |


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ग्राइंडिंग मशीन के प्रकार और ग्राइंडिंग की विधियां | types of grinding machine and methods of grinding

इस पोस्ट में हम जानेंगे ग्राइंडिंग मशीन, ग्राइंडिंग मशीन के प्रकार एवं ग्राइंडिंग की विधियां, ग्राइंडिंग की चाल तथा फीड के बारे में

ग्राइंडिंग मशीन(grinding machine)

ग्राइंडिंग मशीन एक सूक्ष्म कर्तन औजार(cutting tool) होता है| जिसके द्वारा धातु को रफ व फिनिश के रूप में काटा जाता है |

ग्राइंडिंग मशीन में उच्च गुणवत्ता की सतह फिनिश करने की क्षमता पाई जाती है |

यह मशीन विभिन्न विधियों से धातु को ग्राइंड करती है जैसे फ्लैट सतह, आंतरिक और बाह्य बेलनाकार सतह, टेपर सतह, असमान सतह, आदि |

ग्राइन्डर मशीन के प्रकार (types of grinder machine)

मुख्य रूप से चार प्रकार के ग्राइंडर प्रयोग किए जाते हैं |

1. बेंच ग्राइन्डर(bench grinder)

2. पेडेस्टल ग्राइन्डर(pedestal grinder)

3. पोर्टेबल ग्राइन्डर(portable grinder)

4. फ्लैक्सिबल शाफ्ट ग्राइन्डर(flexible shaft grinder)

बेंच ग्राइन्डर(bench grinder)

इस प्रकार की ग्राइंडर को बेंच या मेज पर फिट किया जाता है| इसका प्रयोग हल्के कार्यों की ग्राइंडिंग करने के लिए किया जाता है |

Bench-grinder


यह ग्राइंडर एक मोटर के द्वारा चलता है जिसमें दो स्पिंडल लगे होते हैं जिस पर दो ग्राइंडिंग पहिए (grinding wheel) लगे होते हैं |

बेंच ग्राइन्डर मशीन के एक स्पिण्डल पर कोरस ग्रेन पहिया तथा दूसरे स्पिण्डल पर फाइन ग्रेन पहिया लगा होता है |

पेडेस्टल ग्राइन्डर(pedestal grinder)

पेडेस्टल ग्राइन्डर एक बेंच (pedestal) पर बना होता है, और यह है बेंच फर्श पर कसा जाता है |



पेडेस्टल ग्राइन्डर को एक मोटर के द्वारा चलाया जाता है |

इस ग्राइन्डर मैं भी दो स्पिण्डल लगे होते हैं जो कि ग्राइंडिंग पहियों से जुड़े होते हैं |

पेडेस्टल ग्राइन्डर के एक स्पिण्डल पर कोरस ग्रेन पहिया तथा दूसरे स्पिण्डल पर फाइन ग्रेन पहिया लगा होता है |

इस प्रकार की ग्राइन्डर का प्रयोग भारी कार्यों के लिए किया जाता है |

पोर्टेबल ग्राइन्डर(portable grinder)

पोर्टेबल ग्राइन्डर मैं मोटर के बाहरी सिरे पर ग्राइंडिंग पहिया फिट होता है |

इस ग्राइंडर को हाथ से पकड़ कर प्रयोग में लाया जाता है |

पोर्टेबल ग्राइन्डर का प्रयोग भारी कार्यों के लिए किया जाता है |

इस ग्राइंडर का अधिकतर उपयोग कास्टिंग (casting) या लोकोमोटिव शॉप वेल्डिंग कीये हुए कार्यखंड या जॉब से अतिरिक्त धातु की ग्राइंडिंग करने के लिए किया जाता है |

फ्लैक्सिबल शाफ्ट ग्राइन्डर(flexible shaft grinder)

फ्लैक्सिबल शाफ्ट ग्राइन्डर कॉम हाथ से पकड़ कर काम में लिया जाता है |

इस ग्राइंडर में विद्युत मोटर के आगे एक फ्लैक्सिबल शाफ्ट लगी होती है | और शाफ्ट की सीरे पर ग्राइंडिंग पहिया लगा होता है|

फ्लैक्सिबल शाफ्ट ग्राइन्डर का उपयोग सेंडिंग बफिंग, रोटेटिंग, आदि कार्यों के लिए किया जाता है |

ग्राइंडिंग की विधियां (methods of grinding)

ग्राइंडिंग करते समय अलग-अलग प्रकार के कार्यों की ग्राइंडिंग के अनुसार अलग-अलग विधि प्रयोग में ली जाती है मुख्य रूप से सात विधियों का प्रयोग किया जाता है जो निम्नलिखित प्रकार हैं |

1 सतह ग्राइंडिंग(surface grinding)

2. फलक ग्राइंडिंग(face grinding)

3. बेलनाकार ग्राइंडिंग(cylindrical grinding)

4. आंतरिक ग्राइंडिंग(internal grinding)

5. प्लंज कट ग्राइंडिंग(plunge cut grinding)

6. फॉर्म ग्राइंडिंग(form grinding)

7. केंद्र रहित ग्राइंडिंग(centerless grinding)

सतह ग्राइंडिंग(surface grinding)

सतह ग्राइंडिंग विधि के द्वारा क्षैतिज सतहों (horizontal surface ) की ग्राइंडिंग की जाती है |



इस विधि में कार्यखंड या जॉब को आगे पीछे तथा दाएं बाएं गति करने वाली मेजों पर पकड़कर ग्राइंडिंग की जाती है |

फलक ग्राइंडिंग(face grinding)

फलक ग्राइंडिंग विधि के द्वारा ऊर्ध्वाधर (vertical) चौरस सतह की ग्राइंडिंग की जाती है |

बेलनाकार ग्राइंडिंग(cylindrical grinding)

इस विधि से बेलनाकार (cylindrical) तथा टेपर सतह की ग्राइंडिंग की जाती है |



टेपर सतह पर जो ग्राइंडिंग की जाती है उसे टेपर ग्राइंडिंग कहते हैं |

आंतरिक ग्राइंडिंग(internal grinding)

इस विधि से बेलनाकार (cylindrical) और छिद्रों के अंदर की ग्राइंडिंग की जाती है |

प्लंज कट ग्राइंडिंग(plunge cut grinding)

इस विधि के द्वारा छोटे कार्य खंड या जॉब की ग्राइंडिंग की जाती है|

इस विधि में पहिए को कार्य या जॉब की सतह में सीधा फीड किया जाता है |

फॉर्म ग्राइंडिंग(form grinding)

इस विधि के द्वारा कार्य खंड या जॉब की ग्राइंडिंग करके फाॅर्मड सताए प्राप्त करते हैं |

इस विधि में पहिए की ड्रेसिंग करके कार्य या जॉब की सतह पर फिड दिया जाता है |

केंद्र रहित ग्राइंडिंग(centerless grinding)

इस विधि में बेलनाकार सतहो पर बाहरी ग्राइंडिंग की जाती है|


यह बेलनाकार और टेपर जॉब या कार्यखंड जिनमें केंद्र(centre) नहीं होता है उनमें केंद्र रहित ग्राइंडिंग की जाती है |

ऑफहैंड ग्राइंडिंग (off hand grinding)

जिन कार्यखंड या जॉबो मैं एक अच्छी फिनिश और एक्यूरेसी की आवश्यकता नहीं होती है वहां ऑफहैंड ग्राइंडिंग की जाती है |

इस विधि के द्वारा जॉब पर हाथ से दबाव देकर ग्राइंडर के द्वारा घिसाई की जाती है |

ऑफहैंड ग्राइंडिंग बेंच ग्राइंडर तथा पेडेस्टल ग्राइंडर के द्वारा की जाती है |

ऑफहैंड ग्राइंडिंग के लिए औजार (tools for off hand grinding)

ऑफहैंड ग्राइंडिंग के लिए निम्नलिखित 5 औजार प्रयोग में लाए जाते हैं |

1. स्क्राइबर (scribers)

2. पंच (punches)

3. छैनी (chisel)

4. ट्विस्ट ड्रिल (twist drill)

5. एकल बिंदु कर्तन औजार (single point cutting tools)


ग्राइंडिंग पहिए की कर्तन चाल (cutting speed of grinding wheel)

ग्राइंडिंग पहिए की परिधि पर किसी बिंदु की परिधीय गति कर्तन चाल कहलाती है |

ग्राइंडिंग पहिए की कर्तन चाल को प्रति सेकण्ड में मापा जाता है |

ग्राइंडिंग पहिए की कर्तन गति का सूत्र

 v= πDN÷1000×60

यहां पर v=कर्तन गति

N= चक्कर प्रति मिनट (R.P.M)

D= पहिए का व्यास

ब्रिटिश प्रणाली में कर्तन गति फिट प्रति मिनट में ज्ञात करते हैं |

कर्तन गति = πDN÷12

ग्राइंडिंग पहिए की फीड (feed off grinding wheel)

किसी ग्राइंडिंग पहिए के द्वारा एक चक्कर में कार्य खंड्या जॉब पर चली गई दूरी को फीड (feed) कहते हैं |

फीड को मिली मीटर प्रति चक्कर से प्रदर्शित किया जाता है|

रफ कार्य के लिए फीड 0.025 से 0.01 होनी चाहिए तथा फिनिश कार्य के लिए 0.0625 से 0.0125 मिली मीटर तक होनी चाहिए |

यदि हम फीड को अधिक रखते हैं तो उत्पन्न स्पार्क की धारा भी अधिक होगी |


ग्राइंडिंग पहिए की ग्रेड, एवं ग्राइंडिंग पहिए का चयन कैसे करें

 

इस पोस्ट में हम ग्राइंडिंग पहिए की ग्रेड की बारे में जानेंगे ग्राइंडिंग पहिए का चयन कैसे करते हैं
ग्राइंडिंग पहिए की संरचना, तथा ग्राइंडिंग पहिए के विभिन्न ऑपरेशन जैसे लोडिंग, ग्लेजिंग, ड्रेसिंग, आदि के बारे में जानेंगे|

ग्राइंडिंग पहिए की ग्रेड क्या होती है( grade of grinding wheels)

ग्राइंडिंग पहिए के लिए बॉण्ड की कठोरता(hardness) को दर्शाना ही ग्रेड कहलाता है|
अगर दूसरे शब्दों में कहें तो बॉण्ड की सामर्थ्यता को ही ग्राइंडिंग पहिए कि ग्रेड कहा जाता है|
जिन ग्राइंडिंग पहियों में अपघर्षक (abrasive) जल्दी-जल्दी टूट कर गिर जाते हैं, वह मुलायम ग्रेड की होते हैं|
और जो कणों को मजबूती से जुड़े रखते हैं उन्हें कठोर ग्रेड के पहिए कहते हैं |
बॉण्ड की कठोरता A से Z तक होती है, A ग्रेड का पहिया मुलायम(soft) तथा Z ग्रेड का पहिया सबसे कठोर(hard) होते हैं |

ग्राइंडिंग पहिए की ग्रेड का चयन कैसे करें (grade selection of grinding wheels)

ग्राइंडिंग पहिए की ग्रेड का चयन मुख्य रूप से तीन बातों पर निर्भर करता है
1. घिसाई किए जाने वाले पदार्थ की कठोरता पर|
2. ग्राइंडिंग पहिए और कार्य की गति पर|
3. कार्य के संपर्क में ग्राइंडिंग पहिए के आर्क पर |

ग्राइंडिंग पहिए का उपयोग धातु एवं कार्य के अनुसार होता है जैसे कम कार्य के लिए कठोर पहिए की आवश्यकता होती है |और अधिक कार्य के लिए मुलायम पहिए की आवश्यकता होती है|
जिन कार्यों में कम्पन्न होने की संभावना हो वहां कठोर पहिए का प्रयोग किया जाता है|

ग्राइंडिंग पहिए की संरचना(structure of grinding wheel)

ग्राइंडिंग पहिए के घनत्व का बोध करना उसकी संरचना कहलाता है अथवा ग्राइंडिंग पहिए के अपघर्षक(abrasive) कणों के बीच के अंतर को ही उसकी संरचना कहते हैं|
ग्राइंडिंग पहिए में बॉण्ड का अनुपात उसके अनुपात का 10% से 30% तक होता है |
संगम संरचना वाले पहियो मैं अपघर्षक कण पास पास होते हैं और रन्र्धता(porosity) कम होती है तथा खुली संरचना वाले पहियों मैं अपघर्षक कण दूर दूर होते हैं एवं रन्र्धता(porosity) अधिक होती है|
ग्राइंडिंग पहिए की सघन संरचना 1 से 8 तक तथा खुली संरचना को 9 से 16 तक व्यक्त किया जाता है|


ग्राइंडिंग पहिए की संरचना का चयन(structure selection off grinding wheel)

ग्राइंडिंग पहिया की संरचना का चयन मुख्यतः तीन बातों पर निर्भर करता है
1. ग्राइंड की जाने वाली धातु की कठोरता पर
2. वांछित फिनिश के आधार पर
3. ग्राइंडिंग संक्रिया के आधार पर


कठोर और भंगुर पदार्थों की ग्राइंडिंग और फिनिशिंग के लिए सघन संरचना वाले पहिए का प्रयोग किया जाता है और मुलायम तथा अन्य पदार्थों की ग्राइंडिंग और फिनिशिंग के लिए खुली संरचना वाले ग्राइंडिंग पहिए का प्रयोग किया जाता है|


ग्राइंडिंग पहियों का साइज और  विनिर्देशन(size and specification of grinding wheel)

ग्राइंडिंग पहिए मानक साइज(standard size) के बनाए जाते हैं |
ग्राइंडिंग पहिए का साइज उनके ग्राइंडिंग व्यास, उनकी मोटाई और छेद(hole) के व्यास से व्यक्त होता है|
इसके अतिरिक्त कुछ संकेत अक्षर ग्राइंडिंग पहिए के ऊपर क्रम से लिखे जाते हैं जैसे
1. अपघर्षक का प्रकार(type of abrasive)
2. ग्रेन साइज(grain size)
3. ग्रेड(grade)
4. संरचना(structure)
5. बॉन्ड का प्रकार(types of bond)
6. उत्पादक का रिकॉर्ड(record of productor)


41A46HSV6

इसमें A - अपघर्षक(abrasive)
B - ग्रेन साइज(grain size) H- ग्रेड(grade) S- संरचना(structure) V- बॉन्ड का प्रकार(types of bond) 41ओर 6 उत्पादक के रिकॉर्ड के संकेत है|


ग्राइंडिंग पहिए का चयन कैसे करें(selection of grinding wheel)

ग्राइंडिंग पहिए का चयन हमेशा कार्य के अनुसार ही किया जाता है क्योंकि एक दूसरे से भिन्न होते हैं|
ग्राइंडिंग पहिए का चयन करते समय पांच बातों का ध्यान रखना अति आवश्यक होता है|
1. पहिए का साइज(size of wheel)
2.अपघर्षक(abrasive)
3. कणो का साइज(size of grain)
4. बॉण्ड(bond)
5. कार्य की गति(speed of work)


1. पहिए का साइज(size of wheel)

अलग-अलग साइज के अनुसार ग्राइंडिंग पहिए अलग-अलग प्रकार के होते हैं इनमें पतला पहिया(thik wheel) घिसाई(grinding) के लिए प्रयोग किया जाता है|
किसी भी कार्यखण्ड या जॉब के लिए एक अच्छे साइज के पहिए की आवश्यकता होती है |

2.अपघर्षक(abrasive)

कृत्रिम अपघर्षक मैं सिलीकान कार्बाईड के गुण तन्न सामर्थ्य(tensile strength) वाले पदार्थों को ग्राइंड करने के लिए उपयुक्त रहता है|

3. कणो का साइज(size of grain)

कार्यखण्ड अथवा जॉब की सफाई के लिए कणो का साइज उपयुक्त होना जरूरी होता है
एक अच्छी फिनिश प्राप्त करने के लिए ग्रेन साइज छोटा होना चाहिए| और जिस स्थान पर अच्छी फिनिश की आवश्यकता नहीं हो वहां मोटे ग्रेन साइज का उपयोग करना चाहिए|

4. बॉण्ड(bond)

बॉण्ड का चुनाव करना एक कठिन कार्य होता है|
इसमें नरम कार्य(soft work) के लिए सख्त पाहिए (Hard wheel) का इस्तेमाल करना चाहिए|
और सख्त(hard) कार्य के लिए नरम पहिए का उपयोग करना चाहिए|

5. कार्य की गति(speed of work)

ग्राइंडिंग पहिए का चुनाव करते समय जॉब की गति का भी ध्यान रखा जाना अति आवश्यक होता है|
इसमें अधिक गति वाले पहिए का बॉन्ड सख्त होना चाहिए तथा कम गति वाले पहिए का बॉन्ड मुलायम होना चाहिए|


ग्राइंडिंग व्हील का उपयोग गति के आधार पर हम इस टेबल के माध्यम से देख सकते हैं|

Grinding-cutting-speed-according-metal
Cutting-speed-of-grinding


लोडिंग (loading)

ग्राइंडिंग पहिए से नर्म (soft) पदार्थों की ग्राइंडिंग करते समय पदार्थ के छोटे-छोटे बारीक कण ग्राइंडिंग पहिए(grinding wheel) के छोटे-छोटे चित्रों में फंस जाते हैं इसे ही लोडिंग कहा जाता है|
यदि ग्राइंडिंग पहिए की गति कम और धातु कठोर हो तो लोडिंग हो जाती है|
यदि लोडिंग ग्राइंडिंग पहिए का उपयोग किया जाए तो जो पर निशान पड़ जाते हैं और बियरिंग भी ठीक कार्य नहीं कर पाता है| एवं पहिया भी एक तरफ होकर चलने लगता है|


ग्लेजिंग(glazing)

जब ग्राइंडिंग पहिए से अधिक ग्राइंडिंग की जाती है दोपहिया शीशे की तरह चिकना बन जाता है इसमें अपघर्षक कण बांड से जल्दी झड़ जाते हैं, ग्राइंडिंग पहिए की इस स्थिति को ग्लेजिंग कहते हैं |
यदि बॉन्ड भी अपघर्षक(abrasive) काणों के साथ घिसता जाता है तो पहिया सही हालत में रहता है और सही कटाई भी करता है|
ग्लेजिंग की समस्या से निपटने के लिए धातु वाला ग्राइंडिंग पहिया प्रयोग में लाया जाता है|


ड्रेसिंग(dressing)

अपघर्षक(abrasive) कणों को तोड़कर नए कण बाहर निकालने की क्रिया को ड्रेसिंग कहा जाता है
यह क्रिया एक ड्रेसर औजार(tool) की सहायता से की जाती है|

ड्रेसिंग औजार(dressing tool) हीरा कार्बाइड या टंगस्टन कार्बाईड का बना होता है|

ग्राइंडिंग पहिए में अनावश्यक पदार्थ भर जाने के कारण पहिए की घिसाई क्षमता के कम हो जाने से ड्रेसिंग करने की आवश्यकता होती है|
ड्रेसिंग प्रक्रिया के द्वारा भरे हुए अनावश्यक पदार्थों को निकाल दिया जाता है और नए घिसाई की स्थिति में निकल आते हैं|
यदि ग्राइंडिंग पहिया ठीक, साफ और तेज(sharp) होता है तो ग्राइंडिंग ठीक होती है
इस पोस्ट में हमने ग्राइंडिंग पहिए की संरचना, तथा ग्राइंडिंग पहिए के विभिन्न ऑपरेशन जैसे लोडिंग, ग्लेजिंग, ड्रेसिंग, आदि के बारे में जाना
अगर पोस्ट से संबंधित कोई शिकायत या सुझाव है कृपया हमें कमेंट करना ना भूलें
धन्यवाद

ग्राइंडिंग बॉन्ड के प्रकार | types of grinding bonds

 

दोस्तों इस पोस्ट में हम ग्राइंडिंग बॉन्ड के प्रकार के बारे में जानेगे |

ग्राइंडिंग बॉन्ड क्या है | what is grinding bonds

बॉन्ड के द्वारा अपघर्षक कणों को आपस में जोड़ने का काम किया जाता है |
इनका प्रयोग लगातार कर्तन(cutting) क्रिया करने के लिए किया जाता है| बांड के द्वारा धार लगाने वाले पत्थर तथा ग्राइंडिंग पहिए बनाए जाते हैं |

बॉन्ड के प्रकार (types of bonds)

ग्राइंडिंग बॉन्ड मुख्यतः सात प्रकार के होते हैं जो निम्नलिखित हैं|
1. वैट्रीफाइड बॉन्ड (vitrified bond)
2. सिलीकेट बॉन्ड (silicate bond)
3. चपटा बॉन्ड (shellac bond)
4. रेजिन बॉन्ड (resin bond)
5. रबड़ बॉन्ड (rubber bond)
6. ऑक्सिक्लोराइड बॉन्ड (oxycholoride bond)
7. मैटल बॉन्ड (metal bond)

1. वैट्रीफाइड बॉन्ड (vitrified bond)

वैट्रीफाइड बॉन्ड एक लाल भूरे रंग का क्ले बॉन्ड होता है|
जिसका आधार पदार्थ (base material) फेल्सपार होता है जो कि एक गलनीय मृतिका (fusible clay) होती है|
इसमें आवश्यक मात्रा में उच्च ताप को सहन करने के लिए पदार्थ मिलाए जाते हैं|
इन अवयवों को पानी में घोलकर तथा अपघर्षक कणों के साथ मिलाकर प्रेस इत्यादि में ढाल (casting) करके वांछित आकृति दी जाती है इसके पश्चात इनहे कमरे के ताप पर हवा द्वारा सुखाया जाता है|
सूखने के पश्चात इन पहियों को भट्टी में पकाते हैं और फिर इन्हें काट कर सही आकार में लाया जाता है |
वैट्रीफाइड बॉन्ड से बने पहिए (wheel) अच्छी सामर्थ्य(strength) तथा सरन्धृता (porosity) वाले होते हैं|
यह बॉन्ड झटकों के प्रति सुग्राही(sensitive) होते हैं|
यह उच्च ताप सहन करने योग्य भी होते हैं|
वैट्रीफाइड बॉन्ड से बने पहिए 200 मीटर प्रति मिनट की सरफेस स्पीड सहन कर सकते हैं|
व्यवसायिक रूप से इस बॉन्ड के पहिए को अंग्रेजी के अक्षर 'V' के द्वारा व्यक्त किया जाता है|
अधिकतर ग्राइंडिंग पहियों में इस प्रकार के बॉन्ड का प्रयोग किया जाता है |

2. सिलीकेट बॉन्ड (silicate bond)

सिलीकेट बॉन्ड के ग्राइंडिंग पहिए(grinding wheel) अपघर्षक कणों के साथ सिलीकेट मिलाकर तैयार किए जाते हैं |
इस बॉन्ड के मिश्रण बनाने, कुटाई करने(ramming) मोल्डिंग तथा सुखाने आदि की प्रक्रिया विट्रीफाइड बॉन्ड की तरह की होती है किंतु पकाने वाली भट्टी का तापमान केवल 260 डिग्री सेंटीग्रेड रखते हैं|
इस ताप के कारण ही इन भाइयों को उच्च तनन सामर्थ्य (high tensile strength) प्राप्त होती है|
कठोर तथा संहत कणो वाले पहिए बनाने के लिए विट्रीफाइड बॉन्ड की तरह ही इस मिश्रण कि लेई को द्रवीय(hydraulic) दाब द्वारा दबाया जाता है|
इस बॉन्ड से बने पहिए हल्के भूरे रंग के  जलरोधी (water proof)‌ होते हैं| इन गुणों के कारण इन पहियों का उपयोग वहां किया जाता है जहां पर कम घिसाव के साथ साथ शीतल कर्तन क्रिया करनी हो |
शीतल(cool) कर्तन क्रिया होने के कारण यह है कि यह बॉन्ड अपघर्षक कणों को विट्रीफाइड बॉन्ड की अपेक्षा अधिक तेजी से अलग करता है |
सिलीकेट बॉन्ड को अंग्रेजी के अक्षर 'S' के द्वारा व्यक्त किया जाता है |

3. चपटा बॉन्ड (shellac bond)

चपटा बॉन्ड (shellac bond) पहिए अपघर्षक पदार्थों को चपडा़ (shellac) के साथ मिलाकर तैयार किये जाते है |
इन पहियों के बॉन्ड तथा अपघर्षक कणों को एक माप तापित मिश्रण (steam heated mixer) मैं मिलाकर और फिर गर्म सांचो मै दाब के साथ ढालकर (cast) बनाया जाता है|
यह पहिए कुल कटिंग करते हैं और उच्च सर्फेस फिनिश प्रदान करते हैं|
इन्हें पानी के साथ बिना सुरक्षा के प्रयोग में लाया जा सकता है परंतु कास्टिक सोडा और तेल में इनका प्रयोग नहीं किया जा सकता |
यह पहिए अच्छी प्रत्यास्थता (elasticity) तथा सामर्थ्य (strength) वाले होते हैं|
इनका प्रयोग भारी कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं होता है बल्कि इनका प्रयोग चिल्ड आयरन, ढलवा लोहा, इस्पात,
तथा कठोर किए गए स्टील के कैम की ग्राइंडिंग में प्रयोग होते हैं|
चपटा बॉन्ड को अंग्रेजी के अक्षर 'E 'के द्वारा व्यक्त किया जाता है |

4. रेजिन बॉन्ड (resin bond)

यह ग्राइंडिंग पहिए अपघर्षक कणों को सिंथेटिक रेंजन तथा अन्य यौगिको (compounds) को मिलाकर तैयार किए जाते हैं इसके बाद इन्हें लगभग 200 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान तक गर्म करके पकाया जाता है|
रेजिंन बॉन्ड पहियों में बेकेलाइट और रेडमनांल (Redmanol) आदि रेंजिनो का प्रयोग किया जाता है, इसी कारण से इन पहियों को उच्च गति पर घुमाया जा सकता है|
यह पहिए अधिक सामर्थ्य या हाई स्ट्रैंथ वाले होते हैं इनके द्वारा धातु की कटिंग उच्च दर से कर सकते हैं|
रेजिन बॉन्ड को अंग्रेजी के अक्षर 'B' से व्यक्त किया जाता है |

5. रबड़ बॉन्ड (rubber bond)

रबड़ बॉन्ड  पहिए अपघर्षक पदार्थ, शुद्ध रबड़ तथा गंधक के मिश्रण को भट्टी में डालकर पकाकर तैयार किए जाते हैं|
यह पहिए पर्याप्त सामर्थ्य वाले होते हैं
इन्हें पतले अनुप्रस्थ काट में बनाया जा सकता है|
इनका प्रयोग मुख्य रूप से वहां किया जाता है जहां बहुत अधिक उच्च स्तर की सरफेस फिनिशिंग की तथा निकट डायमेंशन यथार्थता की आवश्यकता होती है|
रबड़ बॉन्ड के साथ संक्रिया करते समय कूलेन्ट के रूप में पानी का प्रयोग किया जा सकता है परंतु कास्टिक सोडा तथा तेल का प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि कास्टिक सोडा के प्रयोग से बॉन्ड विघटित होता है तथा तेल के संपर्क में आने से वह मुलायम बन जाता है|
इस बांड के पहियों का उपयोग अच्छी फिनिश प्राप्त करने के लिए किया जाता है|
रबड़ बॉन्ड को अंग्रेजी के अक्षर 'R' से व्यक्त किया जाता है|

6. ऑक्सिक्लोराइड बॉन्ड (oxycholoride bond)

ऑक्सिक्लोराइड बॉन्ड पहिए अपघर्षक पदार्थों तथा मैग्निशियम के ऑक्साइड और क्लोराइड के मिश्रण से भट्टी में पका कर तैयार कीये जाते है |
यह बॉन्ड ठंडी कटिंग क्रिया प्रदान करता है
परंतु इसके द्वारा ग्राइंडिंग हमेशा शुष्क अवस्था में की जाती है क्योंकि इस पर कुलेन्ट की क्रिया का बुरा प्रभाव तुरंत पड़ता है |
ऑक्सिक्लोराइड बॉन्ड के पहिए का उपयोग सामान्य डिस्क ग्राइंडिंग, कटलरी, रबड़ और चपड़ा बॉन्ड के पहिए फिनिश करने के लिए किया जाता है |

7. मैटल बॉन्ड (metal bond)

जब किसी ग्राइंडिंग व्हील में डायमंड पाउडर का प्रयोग किया जाता है तो अपघर्षको को पकड़ने के लिए यह बॉन्ड बहुत अच्छा रहता है|
डायमंड महंगा होता है अतः पाउडर की प्रभावी मोटाई को सीमित रखा जाता है और बॉन्ड पदार्थ को एक स्टील की प्लेट से जोड़ा जाता है|
मेटल बॉन्ड पहियों के निर्माण में मानक पाउडर मेटल टेक्निक (standard powder metal tequnic) का प्रयोग किया जाता है |

ग्रेन या ग्रिट (grain or grit) क्या होते हैं

ग्रेन या ग्रिट ग्राइंडिंग चाहिए के कणों के साइज को कहते हैं यह कार्यखण्ड या जॉब की फिनिशिंग को प्रभावित करता है |
अलग-अलग ग्राइंडिंग पहियों के अपघर्षक कण अलग-अलग साइज के हो सकते हैं इनको सरल और संयुक्त पहियों के नाम से जाना जाता है|
अधिक धातु काटने के लिए कोर्स ग्रेन तथा कम धातु काटने के लिए सूक्ष्म ग्रेन पहिए का प्रयोग किया जाता है |

ग्रेन या ग्रिट का चयन

ग्रेन या ग्रिट का चयन काटे जाने वाली धातु की मात्रा उसकी वांछित फिनिश और ग्राइंड किए जाने वाली धातु की कठोरता के अनुसार किया जाता है |


दोस्तों इस पोस्ट में हमने ग्राइंडिंग बॉन्ड के प्रकार के बारे में जाना आपको हमारा यह पोस्ट कैसा लगा इससे संबंधित कोई शिकायत या सुझाव हो तो हमें कमेंट करें |

इसी प्रकार की अन्य ITI fitter theory से संबंधित रोचक जानकारी और नोट्स के लिए हम से जुड़े रहे |
धन्यवाद

ग्राइण्डिंग क्या है | grinding kya hai और इसमें कौन से आपघर्षक (abrassive) प्रयोग किए जाते हैं

 

दोस्तों इस पोस्ट में हम जानेंगे ग्राइण्डिंग क्या है grinding kya hai और इसमें कौन से आपघर्षक (abrassive) प्रयोग किए जाते हैं|

ग्राइण्डिंग क्या है grinding kya hai

किसी धातु को बारीक (छोटे-छोटे) कणों के रूप में काटने की क्रिया ग्राइण्डिंग कहते हैं |

grinding,grinder
grinding


इस प्रक्रिया में ग्राइण्डिंग पहिया (grinding wheel) कर्तन औजार(cutting tool) का कार्य करता है|
यह ग्राइण्डिंग पहिया छोटे-छोटे तेज क्रिस्टलो के द्वारा बनाया जाता है| जोकि किसी भी धातु को छोटे-छोटे कणों के रूप में काटता है|
पहिए के ऊपर लगे क्रिस्टल को अपघर्षक (abrassive) कहते है | इसी के आधार पर इस पहिए को अपघर्षक पहिया (abrassive wheel) कहां जाता है|
यह सभी क्रिस्टल आपस में एक दूसरे से बंधे हुए होते हैं|
ग्राइंडिंग क्रिया के द्वारा हम 0.38 मिलीमीटर से 0.76 मिलीमीटर तक की धातु को काट सकते हैं |
ग्राइण्डिंग का उपयोग grinding ka upyog
ग्राइण्डिंग का उपयोग विभिन्न प्रकार के कर्तन औजार(cutting tools) जैसे - प्लेनर, लैथ, स्लोटर मशीन के औजार, ड्रिल, छेनी, रीमार, टेप, डाई, एवं मिलिंग कटर आदि की धार को तेज करने के लिए किया जाता है |
ग्राइण्डिंग द्वारा किसी धातु या जॉब पर से बर्र हटाकर उसे चिकना एवं स्मूथ बनाया जा सकता है |

आपघर्षक (abrassive)

यह किसी ग्राइण्डिंग पहिए (grinding wheel) का वह पदार्थ होता है जो कटिंग का कार्य करता है |
इन पदार्थों का उपयोग ग्राइंडिंग क्रिया के अतिरिक्त लैपिंग, होनिंग, बफिंग, और सुपर फिनिशिंग क्रियाओं के लिए भी किया जाता है |
एर्बेसिव छोटे-छोटे कणों के रूप में अत्यंत कठोर पदार्थ होते हैं जिनके अंदर अनेक प्रकार की तिव्र कोर तथा नोक(point) होते हैं |
एक अच्छे आपघर्षक (abrassive) को शुद्ध होना चाहिए तथा इसमें कड़ेपन(toughness) और कठोरता का गुण भी होना चाहिए |

आपघर्षक के प्रकार (types of abrassive)

आपघर्षक मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं|
1. प्राकृतिक आपघर्षक (natural abrassives)
2. कृत्रिम या निर्मित आकर्षक (artificial aur menufac tured abrassive)

1. प्राकृतिक आपघर्षक (natural abrassives)

इस प्रकार के आपघर्षको को खानों से प्राप्त किया जाता है
इन आपघर्षको मैं अशुद्धता होने के कारण इनको कम प्रयोग में लाया जाता है|
प्राकृतिक आपघर्षको में हीरा, एमरी, ठोस क्वार्ट्ज, कोरन्डम तथा बालू पत्थर(sand stone) आदि आते है |
इनमें बालू पत्थर से ग्राइंडिंग पत्थर (grinding stone) बनाए जाते हैं |
एमरी एलुमिनियम ऑक्साइड से बनाया जाता है इसमें 55% से 65% तक एलुमिना होता है |
कंडोम भी एल्यूमीनियम ऑक्साइड से बनाया जाता है इसमें 75% से 95% तक एलुमिना होता है |
हीरा (diamonds) को सीमेंटेड कार्बाइड टूल की ग्राइंडिंग के लिए प्रयोग में लाया जाता है |

2. कृत्रिम या निर्मित आकर्षक (artificial aur menufac tured abrassive)

ज्यादातर ग्राइंडिंग पहिए कृत्रिम अपघर्षक के द्वारा बनाए जाते हैं, क्योंकि यह शुद्ध होते हैं |
इन अपघर्षको को विद्युत भट्टीयो मैं बनाया जाता है क्योंकि ऐसा करने से इनकी अशुद्धियों को हटाया जा सकता है और रासायनिक क्रिया के लिए ताप प्राप्त हो जाता है |

कृत्रिम अपघर्षक के प्रकार (types of artificial abrasives)

कृत्रिम अपघर्षक मुख्यत चार प्रकार के होते हैं जो कि इस प्रकार है |
1. सिलीकन कार्बाईड या कार्बोरेण्डम (silicon carbide  or carborundum)
2. एल्यूमीनियम ऑक्साइड (aluminium oxide)
3. कृत्रिम हीरे (artificial diamonds)

1. सिलीकान कार्बाईड या कार्बोरेण्डम (silicon carbide  or carborundum)

सिलीकन कार्बाईड के कारण बहुत ही कठोर तथा भंगूर होते हैं इनके कारण इनका प्रयोग कम तनन सामर्थ्य (low tensile strength) वाली धातु को ग्राइंड करने में किया जाता है |
सिलिकॉन कार्बाइड को बनाने के लिए सिलिका सैंड, कोक सा डस्ट (saw dust) तथा नामक बराबर मात्रा में लेकर विद्युत भट्टी में 2000 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान पर गर्म किया जाता है |
गर्म करने से जो अशुद्धियां होती हैं, वह दूर हो जाती है |
भट्टी से जो रवे प्राप्त होते हैं उनको हथौड़ी की सहायता से अथवा रोलरो की सहायता से अपघर्षक कणों के रूप में बदल लिया जाता है|
इन कणों से विद्युत चुंबक की सहायता से लोहे के कणों को निकाल लिया जाता है, इसके बाद इनको अमल तथा छार में डालकर बची हुई अशुद्धियों को भी दूर किया जाता है|
सिलीकन कार्बाईड का रंग चमकदार काला तथा हरा होता है|
स्कोर ब्लैक सिलिकन कार्बाइड तथा ग्रीन सिलिकन कार्बाइड दो भागों में बांटा जाता है |

2. एल्यूमीनियम ऑक्साइड (aluminium oxide)

एल्यूमीनियम ऑक्साइड से बनाए गए ग्राइंडिंग पहिए का प्रयोग उच्च तनन सामर्थ्य (high tensile strength) वाली धातु की ग्राइंडिंग करने के लिए किया जाता है|
एल्यूमीनियम ऑक्साइड बॉक्साइट नामक खनिज (अयस्क) से बनाया जाता है |
एल्युमिनियम ऑक्साइड को बनाने के लिए भट्टी के इलेक्ट्रॉन को ऑक्साइड के संपर्क में लाया जाता है |
इलेक्ट्रॉडो में रखी ग्रेफाइट चालक का कार्य करती है |
ऑक्साइड के पिघलने के बाद एलुमिनियम ऑक्साइड को कणों के रूप में बाहर निकाल लेते हैं फिर इन्हें हथौड़ी के द्वारा या रोलरो की सहायता से छोटे-छोटे कणों में बदलकर छलनीयो की सहायता से छानकर ग्रेडिंग कर लेते हैं |
यह कण कठोर (hard) तथा कड़े (tough) होते हैं |
इन कणों का रंग नीला या भुरा होता है |
एलुमिनियम ऑक्साइड नियमित एलुमिनियम ऑक्साइड तथा व्हाइट एलुमिनम ऑक्साइड दो भागों में मिलते हैं |

3. कृत्रिम हीरे (artificial diamonds)

यह कृत्रिम रूप में पाये जाते हैं, जो कि प्राकृतिक हीरो की तरह कठोर होते है |
इनकी परिणाम बहुत अच्छे होते हैं |

फ्रोस्टिंग और प्रोटेक्टिव कोटिंग क्या है

 

दोस्तों इस पोस्ट में हम जानेंगे फ्रोस्टिंग और प्रोटेक्टिव कोटिंग क्या है| फ्रोस्टिंग संक्रिया, प्रोटेक्टिव कोटिंग के प्रकार, अस्थाई कोटिंग, अर्ध स्थाई कोटिंग, और स्थाई कोटिंग के बारे में विस्तारपूर्वक जानेंगे |

फ्रोस्टिंग(frosting)

फ्रोस्टिंग एक ऐसी संक्रिया(operation) है जिसके द्वारा जॉब की बाहरी सपाट सतह को चमकदार बनाया जाता है|
और नरम पदार्थ की बनी पिन तथा एमरी का प्रयोग करके गोलाकार के स्पोर्ट बनाए जाते हैं|

फ्रोस्टिंग संक्रिया (frosting operation)

फ्रोस्टिंग करने के लिए एक नरम पदार्थ की पिन को ड्रिलिंग मशीन के ड्रिल चक में बांध लिया जाता है |
जिस जॉब या कार्य खंड पर फ्रोस्टिंग करनी होती है उसे मशीन की मेज(table) के साथ बांध दिया जाता है और उस पर एमरी पेस्ट का लेप कर दिया जाता है|
इसके बाद मशीन को चालू करके पिन का हल्का सा दबाव कार्य खंड या जॉब पर दिया जाता है| जिससे जॉब या कार्यखंड पर गोल आकार के सपोर्ट बन जाते हैं |
इस प्रकार जॉब की पोजीशन बदलकर पूरे जॉब पर गोल आकार के स्पोर्ट बना लिए जाते हैं|
इस क्रिया को करने से सतह पर चमक बढ़ती है और देखने में यह अच्छी भी लगती है|

प्रोटेक्टिव कोटिंग (protective coating)

इसी जॉब या कार्य खंड को हवा और पानी के प्रभाव से बचाने के लिए कुछ उपचार किए जाते हैं, जिन्हें प्रोटेक्टिव कोटिंग कहा जाता है|
प्रोटेक्टिव कोटिंग करने के पश्चात जॉब या कार्यखंड पर जंग नहीं लगता है और जॉब की सतह देखने में सुंदर और आकर्षक लगती है|

प्रोटेक्टिव कोटिंग के प्रकार (types of protective coatings)

प्रोटेक्टिव कोटिंग मुख्यतः तीन प्रकार की होती है|
1. अस्थाई कोटिंग (temporary coating)
2. अर्ध स्थाई कोटिंग (semi permanent coating)
3. स्थाई कोटिंग (permanent coating)

1. अस्थाई कोटिंग (temporary coating)

इस प्रकार की कोटिंग जॉब पर अस्थाई रूप से की जाती है|
स्थाई कोटिंग के लिए जॉब को बनाने के पश्चात उसकी सतह पर तेल, ग्रीस, वार्निश, आदि लगा देते हैं| जिससे जॉब की सतह पर जंग नहीं लगती है और आवश्यकता पड़ने पर जॉब की सतह को साफ करके प्रयोग में लाया जा सकता है|

2. अर्ध स्थाई कोटिंग (semi permanent coating)

इस प्रकार की कोटिंग कार्य खंड या जॉब पर अर्ध स्थाई रूप से की जाती है|
अर्ध स्थाई कोटिंग ने निम्नलिखित विधियां आती हैं|
1. पेंटिंग(painting)
2. पीतल की कलरिंग(colouring off brush)
3. इस्पात की ब्लूइंग करना(bluing off steel)
4. इस्पात की ब्लैक फिनिश करना(black finishing of Steel)
5. टिनिंग(tinning)
6. गैल्वेनाइजिंग(galvanizing)

पेंटिंग(painting)

बाजारों में अनेक प्रकार के पेंट उपलब्ध होते हैं| पेंट के प्रयोग से जॉब की सतह की कोटिंग की जा सकती है |
जिससे कि जॉब की सतह पर पानी और हवा का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है|

पीतल की कलरिंग(colouring off brush)

इस विधि में पीतल को एक सुनहरे रंग में बदला जाता है |
इसमें पीतल के जॉब को 5 भाग कास्टिक सोडा, 10 भाग कॉपर कार्बोनेट और 50 भाग पानी के घोल में निश्चित समय के लिए डुबोकर रखा जाता है |
जब कार्य खंड पर इच्छा अनुसार परत आ जाती है, तब उसे घोल से बाहर निकाल कर अच्छी तरह साफ कर लिया जाता है|

इस्पात की ब्लूइंग करना(bluing off steel)

इस विधि में पोलिस कीये गये इस्पात के कार्य खंड को लकड़ी की राख, रेति या लकड़ी के कोयले के चुरे के साथ गर्म किया जाता है|
और जब जॉब पर नीला रंग आ जाता है, तब उसे ठंडा कर दिया जाता है |

इस्पात की ब्लैक फिनिश करना(black finishing of Steel)

इस विधि में कठोर किए गए इस्पात के जॉब को सिलेंडर ऑयल में डालकर टैम्पर किया जाता है और इसके तुरंत बाद तेल के साथ मिट्टी में लगभग 150 डिग्री सेंटीग्रेड से 175 डिग्री सेंटीग्रेड के तापमान पर लगभग 5 से 8 मिनट तक गर्म किया जाता है|
इसके बाद जो को निकाल कर ठंडा कर दिया जाता है, जिससे जॉब की सतह पर ब्लैक फिनिश आ जाती है |

टिनिंग(tinning)

इस विधि के द्वारा किसी जॉब या कार्य खंड पर टिन की कोटिंग की जाती है|
यह विधि ज्यादातर धातु चद्दर के ऊपर की जाती है|
इस पर टिनिंग करने के पश्चात अच्छी चमक लाने के लिए लकड़ी के बुरादे के साथ चद्दरओं को कई प्लेन रोलरओं में से निकाला जाता है|

गैल्वेनाइजिंग(galvanizing)

इस विधि से काली लोहे की चददरों पर जस्ते(zinc) की कोटिंग की जाती है|
इस विधि में जस्ते की कोटिंग करने के पश्चात जॉब पर अच्छी फिनिश लाने के लिए उन्हें वायर ब्रश वाले रोलरो के बीच से निकाला जाता है |

3. स्थाई कोटिंग (permanent coating)

इस प्रकार की कोटिंग किसी जॉब या कार्यखंड पर स्थाई रूप से की जाती है|
स्थाई कोटिंग करने के लिए इलेक्ट्रोप्लाटिंग विधि अपनाई जाती है|
इलेक्ट्रोप्लेटिंग में विद्युत के द्वारा एक धातु की परत दूसरी धातु पर चढ़ाई जाती है|
इस विधि में जिससे धातु हटाई जाती है, उसे एनोड कहते हैं तथा जिस पर धातु चढ़ाई जाती है, उसे कैथोड कहते हैं|

इलेक्ट्रोप्लाटिंग की विधियां (method of electroplating)

इलेक्ट्रोप्लाटिंग में मुख्यतः तीन विधियों द्वारा की जाती है|
1. क्रोमियम प्लेटिंग (chromium plating)
2. निकिल प्लेटिंग (nickel plating)
3. सिल्वर प्लेटिंग (silver plating)

क्रोमियम प्लेटिंग (chromium plating)

इस विधि के द्वारा किसी जॉब या कार्य खंड पर क्रोमियम की पतली परत चढ़ाई जाती है|
इस विधि में जॉब को सल्फ्यूरिक अमल से साफ करने के पश्चात क्रोमियम के घोल में लगभग 1 घंटे तक डुबोकर रखा जाता है|
इस विधि में जॉब को कैथोड और घोल को एनोड से जोड़कर प्लेटिंग की जाती है|

निकिल प्लेटिंग (nickel plating)

इस विधि से जॉब पर निकिल   की प्लेटिंग की जाती है
प्लेटिंग करने के लिए जॉब पर लगे तेल गिरीश और जंग आदि को साफ करके प्राइमस पाउडर से चमका दिया जाता है|
इसके बाद जॉब को निकिल के घोल में लगभग 1 घंटे तक डुबोकर  रखा जाता है, यह क्रिया करने के लिए जॉब को कैथोड और कॉल को एनोड रखा जाता है |

सिल्वर प्लेटिंग (silver plating)

इस विधि से किसी जॉब पर सिल्वर की पतली परत चढ़ाई जाती है|
इस विधि में जॉब की सतह पर लगे तेल जंग, ग्रीश, आदि को साफ करने के पश्चात कॉपर प्लैटिग घोल में लगभग 1 घंटे तक रखकर अंडर कोटिंग की जाती है|
इसके बाद सिल्वर नाइट्रेट के गोल में अधिक विद्युत धारा पर जॉब को लगभग 1 मिनट तक डुबोकर रखा जाता है|
इसके बाद जॉब को साफ करके सिल्वर प्लेटिंग घोल डाल कर सिल्वर की पतली परत चढ़ा ली जाती है|

होनिंग प्रक्रिया क्या है और इसके क्या लाभ है

 

दोस्तों इस पोस्ट में हम जानेंगे कि होनिंग प्रक्रिया क्या है और इसके क्या लाभ है | होनस क्या होते हैं होनिंग मशीनों का वर्गीकरण तथा होनिंग औजार के बारे में विस्तार पूर्वक जानेंगे|

होनिंग(honing)

यह एक घिसाई करने वाला प्रक्रम(process) होता है|
इस प्रोसेस के द्वारा पहले से मशीनिंग किए गए उत्पादों को फिनिश करने और उनका साइज़ ठीक करने के लिए प्रयोग किया जाता है|
होनिंग के द्वारा सभी फर्निशिंग सक्रियाओं में सबसे अधिक पदार्थ हटाया जा सकता है|
होनिंग विधि के द्वारा अलग की जाने वाली धातु की मात्रा 0.1 मिली मीटर से 0.25 मिली मीटर तक होती है|
लेकिन अगर पूछा जाए कि होनिंग विधि के द्वारा अधिकतम कितनी धातु को हटाया जा सकता है या अलग किया जा सकता है | तो सही उत्तर होगा 0.75 मिलीमीटर तक|

होनिंग का प्रयोग(use of honing)

इसको अधिकतर प्रयोग आंतरिक बेलनाकार सतहों जैसै ड्रिलिंग अथवा बोरिंग के द्वारा बनाए गए छेदों को फिनिश करने के लिए किया जाता है |

होनिंग औजार(honing tools)

यह तीन 4 या 6 भुजाओं वाला औजार(tool) होता है|
इसकी प्रत्येक भुजा पर होनिंग स्टिक लगी होती है| इस पर लगे समायोजन पेच(adjustable screw) की सहायता से ही होनस के साइज को घटाया या बढ़ाया जा सकता है|
यह लगभग समायोज्य रीमर की तरह कार्य करता है|

honing-tools
honing-tools


होनस(hones)

होनिंग के लिए प्रयोग किए जाने वाले औजार को होन(hone) कहते हैं|
यह एक प्रकार की धातु को पॉलिश करने वाली छड़ होती है, जोकि अल्युमिनियम ऑक्साइड, सिलीकान कार्बाईड, या डायमंड डस्ट के सूक्ष्म कणों को बोण्ड द्वारा जोड़कर बनाई जाती है|
इसे होनिंग स्टिक या होनिंग स्टोन भी कहां जाता है |
इसके द्वारा ढलवा लोहे, इस्पात, पीतल, कांसा, एलुमिनियम, चांदी, तथा कांच या प्लास्टिक आदि पर पॉलिश की जाती है|
होनस का वर्गीकरण (classification of hones)
होनस को तीन वर्गों में विभाजित किया जाता है|

1. कोरस या रफ होनस

इस प्रकार के होनस का प्रयोग जॉब पर बोरीग के बाद रफ होनिंग के लिए किया जाता है|

2. मीडियम या फिनिश होनस

इस प्रकार के होनस का प्रयोग होनिंग या semi-finished सतहों को फिनिश करने के लिए किया जाता है|

3. फाइन या पाॅलिश होनस

इस प्रकार की होनस का प्रयोग फिनिश होने के बाद जॉब की आंतरिक सतहों को फिनिशिंग पाॅलिश अर्थात जॉब को शीशे की तरह चमकाने के लिए किया जाता है|

होनिंग मशीन(honing machine)

होनिंग प्रकरण को सामान्य कार्य करने वाली मशीनों जैसें लेथ मशीन और ड्रिलिंग मशीन पर भी किया जा सकता है
कार्य के अनुसार स्थिर प्रकार की मशीनें उपयुक्त सिद्ध नहीं होती हैं, ऐसी स्थिति में उस कार्य को करने के लिए सुगराही ड्रिलिंग मशीन(portable drilling machine) एड्रिल के स्थान पर होन को लगाकर प्रयोग किया जा सकता है|
बहु उत्पादन के लिए नियमित होने की मशीनों का प्रयोग किया जा सकता है इन मशीनों से इस संतोषजनक और सस्ते परिणाम प्राप्त होते हैं|

होनिंग प्रक्रम (honing process)

होनिंग क्रिया एक आंर्द(wet) प्रक्रम(process) होता है|
इस प्रकरण में यह अनिवार्य है कि संक्रिया के समय पर्याप्त मात्रा में उपयुक्त शीतलक का प्रयोग किया जाना चाहिए|
छोटे उत्पादों में यह क्रिया हाथ से की जा सकती है इसके लिए एक होन लगातार घुमाया जाता है और कार्य खंड या जॉब को घूमते हुए औजार पर हाथ के द्वारा आगे पीछे चलाया जाता है|
honing-process
honing-process


होनिंग प्रक्रम मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं
1. ड्राई होनिंग(dry honing)
2. वैट होनिंग(wet honing)

ड्राई होनिंग(dry honing)

इस प्रकार की हानिंग क्रिया अधिक धातु और रफ कर्तन करने के लिए की जाती है|
इस क्रिया में किसी भी प्रकार का शीतलक(coolant) प्रयोग नहीं किया जाता है|
इसमें 80 से 120 अपघर्षक ग्रीट वाले होनस का प्रयोग किया जाता है|

वैट होनिंग(wet honing)

इस प्रकार की होनिंग अच्छी फिनिश और चमक के लिए की जाती है|
इस प्रक्रिया में धातु कम कटती है|
इस प्रकार की होनिंग में शीतलक का प्रयोग किया जाता है|
इस क्रिया में 120 से 300 अपघर्षक ग्रीट वाले होनस का प्रयोग किया जाता है|

होनिंग के लाभ (advantage of honing)

1. इससे शतहो में घर्षण लगभग सुनने के बराबर रह जाती है|
2. इससे घूमने वाले पुर्जे बड़ी सरलता से घूमते हैं|
3. होनिंग के माध्यम से पूर्जों को टॉलरेंस की अंतिम सीमा तक परिशुद्ध बना सकते हैं|
4. होनिंग के माध्यम से सतहो में अच्छी फिर्निशिंग पोलिश और स्मूदनेस लाकर उसकी विशेषता बढ़ा सकते हैं|
5. इससे भारी तथा टेढ़े मेढ़े जॉब या सिलेंडर आदि जिनको मशीन पर बांधकर आंतरिक ग्राइंडिंग नहीं की जा सकती उनकी आसानी से होर्निंग क्रिया की जा सकती है|

दोस्तों इस पोस्ट में हमने जाना होनिंग प्रक्रिया क्या है और इसके क्या लाभ है | होनस क्या होते हैं होनिंग मशीनों का वर्गीकरण तथा होनिंग औजार के बारे में विस्तार पूर्वक जानकारी साझा की है अगर आपको हमारा यह पोस्ट पसंद आया तो कृपया ज्यादा से ज्यादा शेयर करें और हम एक फॉलो करें
धन्यवाद

आईटीआई पास स्टूडेंट को रेलवे दे रहा है नौकरी करने का मौका ऑनलाइन आवेदन करने की 24 जून है अन्तिम दिनांक

 रेलवे भर्ती सेल (आरआरसी), 


पश्चिम रेलवे, मुंबई ने पश्चिम रेलवे के अधिकार क्षेत्र के भीतर विभिन्न डिवीजनों की कार्यशालाओं में अलग-अलग ट्रेनों के लिए कुल 3591 रिक्तियों की भर्ती के लिए एक अधिसूचना की घोषणा की है। जिसके तहत रेलवे अपनी अलग-अलग डिवीजनो में सभी आईटीआई ट्रेड्स पास विद्यार्थियों को अलग-अलग पदों पर(कुल 17 पदों पर) नौकरी देने के लिए नोटिफिकेशन जारी किया है|

जिसमें निम्न में ट्रेनों के अभ्यर्थी आवेदन कर सकते हैं|
Fitter / Turner / Machinist / Carpenter
/ Painter (General) / Mechanic
(Diesel) / Programming & Systems
Administration Assistant / Electrician /
Wireman / Refrigerator AC Mechanic
/ Plumber/Draftsman (Civil)/Electrician/Electronics Mechanic/Stenographer
(English)/Pipe Fitter

ऑनलाइन फॉर्म भरने की अंतिम तिथि 24 जून2021 निर्धारित की गई है|

आवश्यक योग्यताएं

आयु

ऑनलाइन आवेदन करने के लिए अभ्यार्थी की आयु 15 वर्ष से कम तथा अंतिम तिथि तक 24 वर्ष से अधिक नहीं होनी चाहिए|
अन्य भर्तियों की तरह ही आयु में पिछड़े वर्गों और एक्स सर्विसमैन को छूट दी गई है|

शैक्षणिक योग्यता

ऑनलाइन आवेदन करने के लिए अभ्यर्थी को 10th क्लास में 50% अंकों के साथ पास होना आवश्यक है|
साथ ही संबंधित ट्रेड में आईटीआई का सर्टिफिकेट होना आवश्यक है|

आवेदन शुल्क

अभ्यार्थियों के लिए ₹100 आवेदन शुल्क रखा गया है|
पिछड़े वर्ग और महिलाओं (SC/ST/PWD/Women) के लिए आवेदन शुल्क फ्री रखा गया है|

चयन प्रक्रिया

अपरेंटिस अधिनियम, 1961 के तहत प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए योग्य आवेदकों का चयन अभ्यार्थी  द्वारा प्राप्त अंकों के प्रतिशत का औसत लेकर तैयार की जाने वाली मेरिट सूची पर आधारित होगा|
मैट्रिक दोनों में आवेदक [न्यूनतम 50 % (कुल) अंकों के साथ] और आईटीआई परीक्षा के कुल अंकों के प्राप्तांक के आधार पर दोनों को बराबर वेटेज दिया जाएगा।
दो आवेदकों के मामले में · समान अंक होने पर अधिक आयु वाले आवेदकों को प्राथमिकता दी जाएगी।
यदि जन्म तिथि भी समान है, तो · पहले मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले आवेदकों को पहले स्थान दिया जाएगा।
किसी भी प्रकार की कोई लिखित परीक्षा या वाइवा नहीं होगा।
अधिक जानकारी के लिए आरआरबी की ऑफिशियल वेबसाइट पर जाएं। Click here

ऑनलाइन आवेदन करने के लिए क्लिक करें click here

लैपिंग क्या होती है | लैपिंग औजार एवं लैपिंग विधि और लैपिंग के क्या लाभ है

 इस पोस्ट में हम जानेंगे लैपिंग क्या होती है लैपिंग औजार एवं लैपिंग विधि और लैपिंग के क्या लाभ हैं|

लैपिंग(lapping)

यह एक सरफेस फिनिशिंग क्रिया का भाग है जब हम किसी धातु पर मशीनींग और ग्राइंडिंग करते हैं तो उसके पश्चात भी अधिक फिनिशिंग की आवश्यकता होती है | इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए जो संक्रिया की जाती है उसे लैपिंग कहते हैं|
लैपिंग विधि के द्वारा जॉब या कार्य खंड की घिसाई करके जॉब की सतह से अशुद्धता(roughness) और तरंगता(waviness) एवं अन्य अनियमितताओं को समाप्त किया जाता है तथापि फिनिशिंग में सुधार किया जाता है|
इस विधि का उपयोग अच्छी फिनिश वाले कार्य खंड पर किया जाता है, जैसे:- पिस्टन पिन, पिस्टन रिंग, गेज ब्लॉक, वाल्व सीट, मशीन औजारों की गाइड तथा स्लाइड मार्गों आदि पर |
यह क्रिया हाथ अथवा मशीन के द्वारा बाहरी एवं आंतरिक दोनों प्रकार की सतहों पर की जा सकती है |

लैपिंग औजार(lapping tool)

लैपिंग के लिए प्रयोग किए जाने वाले पदार्थ काम मुलायम होना जरूरी है, जिससे घिसने वाले कण आसानी से बैठाये जा सके|
यह एक काटने वाला औजार है, जो विभिन्न आकार में बनाया जा सकता है और यह घर्षण विधि के द्वारा काटता है|
लैप बनाने के लिए मृदु ढलवा लोहा(mild cast iron) तांबा, पीतल, सीसा और कभी-कभी कठोर लकड़ी का भी प्रयोग किया जाता है|

लैपिंग माध्यम(lapping media)

लैप को बनाने के लिए अलग-अलग प्रकार के अपघर्षक कणों को पेस्ट के रूप में प्रयोग किया जाता है| इन्हें चार्जिंग पदार्थ भी कहते हैं, जैसे:- हीरा, एमरी, कोंरडम, क्रोमियम ऑक्साइड, अल्युमिनियम ऑक्साइड तथा सिलिकॉन आदि|
अधिकतर लैपिंग के लिए डायमंड पाउडर का इस्तेमाल किया जाता है|
एलुमिनियम ऑक्साइड के अपघर्षक को उच्च फिनिश प्राप्ति हेतु प्रयोग में लाया जाता है|
तथा सिलीकान कार्बाईड वाले लेप अधिक धातु काटते हैं तथा इनके द्वारा सतह रफ बनती है |

लैपिंग पाउडर के ग्रेड(grades of lapping powder)

लैपिंग पाउडर कई फ्लोर साइजों में मिलते हैं शुक्षम कार्यों के लिए इनको तेल के साथ मिलाकर कुछ समय के लिए छोड़ दिया जाता है जो कम अधिक समय तक तेल में तैरते हैं, वे सबसे सूक्ष्म अपघर्षक होतै है|
लैपिंग करते समय इन अपघर्षको के साथ मोबिल आयल, लॉर्ड आयल, मिट्टी का तेल अथवा तारपीन का तेल उपयोग में लाया जाता है|

लैपिंग विधि(method of lapping)

लैपिंग में दो प्रकार की लैपिंग विधि प्रयोग की जाती है|
1. हस्त लैपिंग(hand lapping)
2. मशीन लैपिंग(machine lapping)

हस्त लैपिंग(hand lapping)

इस विधि के अनुसार लैप जॉब या कार्य खंड में से किसी एक को हाथ से पकड़ कर दूसरे को गति प्रदान की जाती है|
जिससे इन दोनों की सतह एक दूसरे के संपर्क में रहकर रगड़ खाती रहे|
Hand-lapping


लेकिन कुछ परिस्थितियों में लैपिंग कंपाउंड को दोनों संपर्क  सतहों के बीच में रखकर एक सतह को स्थिर तथा दूसरी सतह को उसके ऊपर रगड़ा जाता है|
इसका उपयोग इंजन के वाल्व और वाल्व सीट आदि की लैपिंग के लिए किया जाता है|

मशीन लैपिंग(machine lapping)

इस विधि का प्रयोग बेयरिंग के बाॅल, रोलर, रेस, गियरों, क्रैंक शाफ़्ट, पिस्टन पिनों, गेज ब्लॉक, एवं अन्य ऑटोमोबाइल पार्ट्स और माइक्रोमीटर के स्पिंडल आदि पर उच्च परिष्कृत सतह प्राप्त करने के लिए किया जाता है|
इस विधि में अनेक प्रकार की मशीनों का प्रयोग किया जाता है|
Machine-lapping


एक ऊर्ध्वाधर अक्ष लैपिंग मशीन के ऊर्ध्वाधर स्पिंण्डल पर दो पहिए एक ऊपर और दूसरा उसके नीचे होता है | जॉब या कार्य खंड इन दोनों के बीच में रहकर वाहक सहित ढीले कटाई वाले कणों को फिड किया जाता है|
इस मशीन का एक और उन्नत रुप वह है जिसमें घूमने वाले पहियों के स्थान पर दो बाॅण्डेड अपघर्षक पहिए लगे होते हैं|
इनके साथ ढीले काटने वाले कणों की आवश्यकता नहीं होती है|
इन दोनों प्रकार की मशीनों में नीचे वाला पहिया घूमता है और ऊपरवाला पहिया नहीं घूमता है परंतु जॉब या कार्य खंडों के ऊपर फ्लोट करता है|
इन दोनों मशीनों को केवल वृत्ताकार और चपटे कार्यों के लिए ही प्रयोग किया जाता है|
अपघर्षक बेल्ट लैपिंग मशीन का उपयोग क्रैंक शाफ़्ट पर बेयरिंग, केम शाफ़्ट कि सतह लैपिंग करने के लिए किया जाता है|
इसमें अपघर्षक काणो से लेपित कपड़े या कागज की बेल्ट का प्रयोग किया जाता है|
सेंटर लैस लैपिंग मशीन पर लगातार रूप से लैपिंग क्रिया गोल सातहो वाले पार्ट्स जैसे:- पिस्टन पिन, बियरिंग रेस, और कप, आदि पर की जाती है|

लैपिंग के लाभ(advantage of lapping)

1. लैपिंग से छोटे-छोटे पॉइंट तथा डॉट दूर हो जाते हैं|
2. जॉब पर उच्च कोटि की पॉलिश तथा फर्निशिंग आ जाती है|
3. जॉब पर जंग लगने का खतरा नहीं रहता है|
4. सत्य इतनी समतल एवं सूक्ष्म बन जाती है कि दोनों सतहों के मिलने पर वेक्यूम जाता है|
5. उच्च गति पर जॉब को चला सकते हैं|
6. लैपिंग के प्रयोग से इच्छित फिट प्राप्त की जा सकती है|

सरफेस फिनिश का परिचय, इसके मापने की इकाई, ग्रेड, मापन की विधियां, और सरफेस फिनिश के लाभ

 इस पोस्ट में हम जानेंगे सरफेस फिनिश का परिचय, इसके मापने की इकाई, ग्रेड, मापन की विधियां, और सर्फेस फिनिश के लाभ |

सरफेस फिनिश का परिचय(introduction of surface finish)

किसी भी पुर्जे (parts) की सतह(surface) पर स्मूथनेस(smoothness) और रफनैस(roughness) के संबंध को सरफेस फिनिश कहते हैं|
जैसा कि हम सब जानते हैं वर्तमान औद्योगिक युग में हर दिन नई नई मशीनों का आविष्कार हो रहा है | इन मशीनों में कुछ पुर्जे ऐसे होते हैं जिन्हें अधिक फिनिश की आवश्यकता नहीं होती है और कुछ ऐसे पुर्जे होते हैं, जिनको बहुत अधिक परिशुद्धता में फिनिश करने की आवश्यकता होती है इस प्रकार फनिशिंग किसी भी कार्य की प्रकृति पर निर्भर करता है|

सरफेस फिनिश से संबंधित पद(relative steps of surface finish)

1. सरफेस(surface)
2. प्रोफाइल(profile)
3. रफनैस(roughness)
4. वेवीनैस(weariness)
5. फ्लाॅज(flaws)
6.ले(lay)

Relative-steps-of-surface-finish


1. सरफेस(surface)

यह किसी जॉब या पदार्थ की वह सीमा होती है, जो किसी एक जॉब या पदार्थ को दूसरे से अलग करती है|

2. प्रोफाइल(profile)

किसी भी सरफेस की रूपरेखा या आकृति को प्रोफाइल कहते हैं|

3. रफनैस(roughness)

जब किसी जॉब के सतह  पर किसी औजार की कर्तन धार से जो बारीक तथा सूक्ष्म विषमताएं बनती है, उन्हें  रफनैस(roughness) कहते हैं |

4. वेवीनैस(weariness)

जब किसी जॉब की सतह पर रफनैस की अपेक्षा अधिक चोड़ी विषमताएं बनती है तो उन विषमताओं को वेवीनैस कहते हैं |

5. फ्लाॅज(flaws)

यह किसी जॉब की सतह पर वह विषमता होती है, जो किसी एक स्थान पर या कहीं-कहीं अनेक स्थान पर पड़ती हैं | जैसे:- स्क्रेच, लिए आदि |

6.ले(lay)

किसी जॉब की सतह पर जिस दिशा में फिनिशिंग की जाती है, उसे ले(lay) कहते हैं |

सरफेस फिनिश के माप की इकाई(unit measurement of surface finish)

सरफेस फिनिश की इकाई मीट्रिक प्रणाली में माइक्रोन होती है|
तथा ब्रिटिश प्रणाली में इसे माइक्रो इंच मे मापते हैं|
भारतीय मानक (I.S.I.) मैं RZ और ra सूत्रों के मान की इकाई को माइक्रोन से संबोधित करते हैं |
एक माइक्रोन = 0.001 मिली मीटर
एक माइक्रोन इंच = 0.0001 इंच

सरफेस फिनिश की ग्रेड(grade of surface finish)

भारतीय मानक (I.S.I.) में ra सूत्र की माप के अनुसार सर्फेस फिनिश के स्टैंडर्ड ग्रेड होते हैं, जिनको निम्न तालिका द्वारा प्रदर्शित किया जाता है|

Surface-finish-ki-grade


सरफेस फिनिश को मापने की विधियां(method of measuring surface finish)

सरफेस फिनिश को दो विधियों द्वारा मापा जा सकता है|
1. तुलना द्वारा( by comparison)
2. प्रत्यक्षमापी उपकरणों द्वारा(by direct measuring instruments)

1. तुलना द्वारा( by comparison)

जब किसी सरफेस फिनिश का निरीक्षण(inspection) तुलना द्वारा किया जाता है|
तो यह सात विधियां अपनाई जाती हैं|
1. स्पर्श निरीक्षण द्वारा
2. दृष्टिगत निरीक्षण द्वारा
3. माइक्रोस्कोपिक निरीक्षण द्वारा
4. सतह फोटोग्राफ द्वारा
5. रिफ्रैक्टिव लाइट इंटेसिटी द्वारा
6. माइक्रो इंटर फेयरोमीटर द्वारा
7. वाॅलाक सतह डायनमो मीटर द्वारा

2. प्रत्यक्षमापी उपकरणों द्वारा(by direct measuring instruments)

किसी भी सतह फिनिश का निरीक्षण प्रत्यक्ष माफी उपकरणों द्वारा भी किया जा सकता है |
इसके लिए यह 3 उपकरण प्रयोग में लाए  जाते है|
1. प्रोफाइलोमीटर(profilometer)
2. स्टाइल्स प्रोब उपकरण
3. टामलिम्सन सरफेस मीटर
4. टेलर हाॅबसन टेलीसर्फ

प्रोफाइलोमीटर(profilometer)

इस उपकरण के द्वारा किसी सतह की हिल्स और वैलीज को सूक्ष्म से सूक्ष्म 0.0025 मिलीमीटर तक माप सकते हैं|
प्रोफाइलोमीटर डायल टेस्ट इंडिकेटर की तरह ही कार्य करता है|
यह दो प्रकार के होते हैं
1. यांत्रिक(mechanical)
2. इलेक्ट्रॉनिक(electronic)

1. यांत्रिक(mechanical)

यांत्रिक(mechanical) उपकरण को स्टाइलस कहते है|
यह उपकरण की चाल को यांत्रिक विधि द्वारा पढ़कर इंडिकेटर की सहायता से हिल्स और वैलीज को मापा जा सकता है|
इसका स्टाइलस डायमंड धातु का बना होता है|

2. इलेक्ट्रॉनिक(electronic)

इस उपकरण को टेलीसर्फ के नाम से भी जाना जाता है|
यह इलेक्ट्रॉनिक उपकरण होता है, जिसका उपयोग प्रयोगशाला में किया जाता है|
यह एक मोटर की सहायता से चलता है यह चलती हुई सतह से प्राप्त विद्युत तरंगों को बढ़ाकर सतह एंपलीफायर एनालाइजर को भेजता है|
यह एनालाइजर सतह के पैरामीटर की गणना करके अक्षरों के रूप में दर्शाता है|

सरफेस फिनिश के लाभ (advantage of surface finish)

1. अच्छी सर्फेस फिनिश मशीन की गति बढ़ती है|
2. मशीन का जीवनकाल बढ़ता है|
3. मशीन के पुर्जे कम घिसते हैं|
4. घर्षण कम पैदा होता है|
5. लुब्रिकेंट का बहाव स्वतंत्र रूप से रहता है|


इस पोस्ट में हमने जाना सरफेस फिनिश का परिचय, इसके मापने की इकाई, ग्रेड, मापन की विधियां, और सर्फेस फिनिश के लाभ | अगर आपको यह पोस्ट पसंद आया था क्या इसलिए और कमेंट करना ना भूले

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लिमिट्स और फिट्स की विभिन्न प्रणालियां और मौलिक विचलन क्या है |

 इस पोस्ट में हम लिमिट्स और फिट्स की विभिन्न प्रणालियां, जैसे- ब्रिटिश प्रणाली, भारतीय प्रणाली, और मौलिक विचलन के बारे में विस्तार पूर्वक जानेंगे |

लिमिट्स और फिट्स की विभिन्न प्रणालियां (different systems of limits and fits)

लिमिट्स और फिट की मुख्यत: तीन प्रणालियां प्रचलित हैं|
1. न्यूअल प्रणाली(newell system)
2. ब्रिटिश मानक प्रणाली(British standard system)
3. भारतीय मानक प्रणाली(Indian standard system)

न्यूअल प्रणाली(newell system)

यह प्रणाली होल बेसिस सिस्टम पर आधारित है, जिसमें किसी भी प्रकार की फिटिंग प्राप्त करने के लिए छेद(hole) के व्यास को स्थिर रखा जाता है|
न्यूअल प्रणाली की खोज
इस प्रणाली की खोज न्यूअल इंजीनियरिंग कंपनी ने की, जिससे संसार की बहुत बड़े-बड़े कारखानों में विभिन्न प्रकार की फिटस दिए जाने वाले 1/2 इंच से 6 इंच व्यास तक के छेदों के लिए टोलरेंस निश्चित की |
न्यूअल प्रणाली की श्रेणियां
न्यूअल प्रणाली परीशुद्धता के आधार पर छेदों को A तथा B श्रेणियों में बांटा गया है|
A श्रेणी का प्रयोग अत्यधिक परिशुद्ध कार्यों के लिए किया जाता है|
एवं B श्रेणी का प्रयोग साधारण कार्यों के लिए किया जाता है|
इस प्रणाली में फोर्स फिट, ड्राइविंग फिट, पुश फिट तथा रनिंग फिट आती हैं|
इन फिटों को ड्राइंग पर दिखाने के लिए अक्षरों का प्रयोग किया जाता है, जैसे:- फोर्स फिट के लिए F और पूश फिट के लिए P अक्षर का प्रयोग किया जाता है|
परंतु फिट को दर्शाने के लिए अक्षर x, y, और z, का भी प्रयोग किया जाता है|

2. ब्रिटिश मानक प्रणाली(British standard system)

इस प्रणाली में 21 प्रकार की अलग-अलग फिट प्राप्त करने हेतु छेद (hole) के साइज पर एक तरफा(unilateral) या दो तरफा (bilateral) कुल 16 ग्रेड में टोलरेंस(tolerance) दी जाती है |
ब्रिटिश मानक प्रणाली में छेद(hole) को अंग्रेजी के बड़े अक्षरों में A,B,C, से Z तक दर्शाया जाता है |
तथा शाफ़्ट को अंग्रेजी की इन्हीं छोटे अक्षरों a,b,c,d, से z तक दर्शाया जाता है|
ब्रिटिश मानक प्रणाली की खोज
यह प्रणाली इंग्लैंड में सन 1953 में अपनाई गई थी|
जिसमें 16 ग्रेड की टोलरेंस 1 से 16 नवंबर तक दी जाती है|
यदि किसी छेद या शाफ़्ट पर टोलरेंस दी जाती है तो छेद या शाफ़्ट के निशान के साथ टोलरेंस की ग्रेड का नंबर भी लिया जाता है जैसे - H7, g6 आदि |

3. भारतीय मानक प्रणाली(Indian standard system)

इस प्रणाली में विभिन्न प्रकार की फिट प्राप्त करने के लिए 25 मौलिक विचलनों में बांटा गया है|
Limit-fits-ki-ISI-pranali


जिन्हें अंग्रेजी के बड़े अक्षरों द्वारा दर्शाया जाता है, जैसे:- छेद के लिए A,B,C,D,E,F,G,H,I,J,K,L,M,N,O,P,Q,R,S,T,U,V,W,X,Y,Z, तथा ZB, और ZC
एवं सॉफ्ट के लिए अंग्रेजी के यही अक्षर छोटे अक्षरों मैं प्रयोग किए जाते हैं|
za,zb, और, zc अधिकतम इंटरफियरेन्स प्राप्त करने के लिए प्रयोग में लाए जाते हैं|

भारतीय मानक प्रणाली की खोज

भारत में ब्रिटिश प्रणाली के आधार पर I.S.919 - 1959 के अनुसार पहले यह प्रणाली इंचों मे थी, जिसमें 16 लिमिट्स और फिट्स की प्रणालियां थी, जिन्हें IT 1 से IT 16 तक व्यक्त किया जाता था|
इसके बाद अब भारतीय मानक संस्थान ने I.S.I. प्रणाली के आधार पर I.S.919 - 1959 मे संशोधन करके एक नई प्रणाली 10 दिसंबर 1963 के नाम से प्रकाशित की,
जिसमें लिमिट् और फिट का विस्तार पूर्वक विवेचन किया|
इसके अंतर्गत 500 मिलीमीटर व्यास की शाफ़्ट तथा छेद़ में विभिन्न फिट प्राप्त करने के लिए 18 बेसिक टॉलरेंस की श्रेणियां हैं|
इन श्रेणियों को ITO 1, ITO और IT 1 से IT 16 द्वारा व्यक्त किया जाता है | इन्हें परिशुद्धता ग्रेड भी कहते हैं |

मौलिक विचलन (fundamental division)

Maulik-vichalan,fundamental-division


दो विचलनों (divisions) मे से किसी एक को शुन्य रेखा (zero line) के साथ संबंधित टोलरेंस जोन(tolerance zone) दिखाने में सुविधा हो, उसी मौलिक विचलन कहते हैं|

इस पोस्ट में हमने जाना लिमिट्स और फिट्स की विभिन्न प्रणालियां, जैसे- ब्रिटिश प्रणाली, भारतीय प्रणाली, और मौलिक विचलन के बारे में अगर आपको यह पोस्ट पसंद आया तो कृपया ज्यादा से ज्यादा शेयर करें

धन्यवाद

फिट, और फिट के प्रकार

 इस पोस्ट में हम जानेंगे फिट और फिट के प्रकार, जैसे क्लीयरेंस फिट, इन्टरफीयरेंस फिट, ट्रांजिशन फिट और इनके सभी प्रकार के बारे में |

फिट(fit)

किसी भी मशीन या उपकरण को अलग-अलग अनेक पार्ट्स से असेंबल करके बनाया जाता है|
इनमें से कुछ विशेष पार्ट्स होते हैं जिनकी साइजों को सूक्ष्मता से बनाया जाता है और वे आपस में स्लाइडिंग करते हैं या घूमते है|
इस प्रकार से असेंबल किए जाने वाले पार्ट्स के बीच में क्लीयरेंस (अवकाश) या इन्टरफीयरेंस (व्यतिकरण) की मात्रा से बनने वाले संबंध को फिट कहते हैं |
अन्यथा संक्षेप में हम कह सकते हैं कि असेंबल की हुई 2 पार्ट्स के बीच के संबंध को फिट कहते हैं|

फिट के प्रकार(types of fit)

फिट मुख्य रूप से तीन प्रकार की होती है |
1. क्लीयरेंस फिट या अवकाश फिट (clearance fit)
2. व्यतिकरण फिट या इन्टरफीयरेंस फिट(interference fit)
3. ट्रांजिशन फिट(transition fit)

1. क्लीयरेंस फिट या अवकाश फिट (clearance fit)

जब शाफ्ट किसी होल के अंदर स्वतंत्र घूमे और उसमें किसी भी प्रकार की कोई रुकावट नहीं हो तो उसे क्लीयरेंस फिट कहते हैं |
क्लीयरेंस फिट में शाफ्ट का व्यास छेद के व्यास की अपेक्षा कम रखा जाता है| जिससे कि फिट होने के बाद भी कुछ क्लीयरेंस बनी रहे |

क्लीयरेंस फिट के प्रकार(types of clearance fit)

यह फिट दो प्रकार की होती है|
1. रनिंग फिट(running fit)
2. स्लाइडिंग फिट(sliding fit)

रनिंग फिट(running fit)

रनिंग फिट में धनात्मक अलाउंस रखा जाता है, ताकि दोनों पार्ट्स जब असेंबल किए जाते हैं तो क्लेयरेंस अधिक होने के कारण शाफ्ट छेद में आसानी से और स्वतंत्र रूप से घूम सकती है |
रनिंग फिट के उदाहरण:- बुश बियरिंग और शाफ्ट

स्लाइडिंग फिट(sliding fit)

इस फिट में रनिंग फिट की अपेक्षा थोड़ा कम धनात्मक अलाउंस रखा जाता है
जैसे:- ब्लैंकिंग पंच और शाफ्ट

2. व्यतिकरण फिट या इन्टरफीयरेंस फिट(interference fit)

इन्टरफीयरेंस फिट में 2 पार्ट्स को फिट करते समय थोड़ा सा बल लगाने की आवश्यकता होती है|
इस फिट में होल के साइज की माप को शाफ़्ट कि माप से थोड़ा कम या छोटा रखा जाता है|
इन्टरफीयरेंस फिट का उपयोग वहां किया जाता है जहां किसी पार्ट को स्थाई रूप से फिट करना हो |
इन्टरफीयरेंस फिट मैं ऋणात्मक अलाउंस रखा जाता है |

अधिकतम इन्टरफीयरेंस क्या होता है(maximum interference)

यह इन्टरफीयरेंस फिट में छेद की न्यूनतम माप एवं शाफ़्ट की अधिकतम माप का बीजगणितीय अंतर होता है

न्यूनतम इन्टरफीयरेंस (minimum interference)

यह इन्टरफीयरेंस होल के अधिकतम माप(साइज) तथा शाफ्ट के न्यूनतम माप का बीजगणितीय अंतर होता है|

इन्टरफीयरेंस फिट के प्रकार (types of interference fit)

1. फोर्स फिट(force fit)
2. ड्राइविंग फिट(driving fit)
3. श्रिंकेज फिट(shrinkage fit)

फोर्स फिट(force fit)

इस तरह की फिट में छेद(hole) के साइज को शाफ्ट के साइज की अपेक्षा छोटा रखा जाता है|
फोर्स फिट मैं दोनों पार्टस को किसी यांत्रिक प्रेशर के दबाव से फिट किया जाता है |
इस प्रकार की फिट में हाइड्रोलिक प्रेशर के द्वारा की पार्ट्स को अधिकतर फिट किया जाता है, जैसे- किसी बॉडी के हब मैं स्लीव को फिट करना |

श्रिंकेज फिट(shrinkage fit)

श्रिंकेज फिट में छेद वाले भाग को गर्म किया जाता है जिससे कि छेद का व्यास बढ़ जाता है, और शाफ्ट पर फिट हो जाता है |
इसके पश्चात इसे ठंडा कर लिया जाता है| ठंडा होने पर छेद वाला भाग सिकुड़ता है और मजबूती से शाफ्ट को पकड़ लेता है |
श्रिंकेज फिट का उदाहरण:- बैलगाड़ी के लकड़ी के पहिए पर लोहे की रिम चढ़ाना श्रिंकेज फिट का उदाहरण है |

3.ट्रांजिशन फिट(transition fit)

यह फिट क्लीयरेंस फिट तथा इन्टरफीयरेंस फिट के बीच की फिट होती है |
Transition-fit


ट्रांजिशन फिट छेद तथा शाफ्ट के बीच में इतना अलाउंस रखा जाता है कि मैं तो इससे अधिक क्लीयरेंस और ना ही अधिक इन्टरफीयरेंस रह सके |

पुश फिट(push fit)

इस प्रकार की फिट क्लीयरेंस फिट तथा इन्टरफीयरेंस फिट के बीच की फिट होती है |
इसमें ना तो अधिक क्लीयरेंस होता है और ना अधिक इंटरफीयरेन्स होता है |
पुश फिट में पार्ट को हाथ के दबाव से अथवा मेलेट की सहायता से फिट करते हैं|
पुश फिट का उदाहरण:- डॉवल पेन, लोकेटिंग प्लग आदि |


इस पोस्ट में हमने जाना फिट और फिट के प्रकार, जैसे क्लीयरेंस फिट, इन्टरफीयरेंस फिट, ट्रांजिशन फिट और इनके सभी प्रकार के बारे में |अगर आपको यह है पोस्ट अच्छा लगा तो कृपया शेयर करें|

धन्यवाद


एलाउन्स क्या है और यह कितने प्रकार का होता है

 इस पोस्ट में हम जानेंगे एलाउन्स क्या है और यह कितने प्रकार का होता है तथा अधिकतम एलाउन्स और न्यूनतम एलाउन्स क्या होते हैं एवं टोलरेंस और एलाउन्स में क्या अंतर है|

एलाउन्स(allowance)

जब किसी निर्धारित फिट के अनुसार 2 पार्ट्स को बनाकर मिलाया जाता है तो इन दोनों पार्ट्स की माप मैं जानबूझकर जो अंतर रखा जाता है उसे एलाउन्स कहते हैं |
किसी भी प्रकार की फिट के अनुसार एलाउन्स धनात्मक(+) या ऋणात्मक(-) हो सकते हैं |
एलाउन्स का संबंध किसी भी फिट होने वाले 2 पार्ट्स से होता है ना की किसी एक पार्ट(पुर्जे) से होता है |

एलाउन्स के प्रकार(types of allowance)

एलाउन्स दो प्रकार के होते हैं|
1. अधिकतम एलाउन्स(maximum allowance)
2. न्यूनतम एलाउन्स(minimum allowance)

अधिकतम एलाउन्स(maximum allowance)

किसी भी छेद (hole)के साइज के हाई लिमिट और सॉफ्ट के साइज की लो लिमिट के अंतर को अधिकतम एलाउन्स कहते हैं |
अर्थात अधिकतम एलाउन्स प्राप्त करने के लिए छेद के हाई लिमिट साइज में से सॉफ्ट के लो लिमिट साइज को घटाया जाता है |
अधिकतम एलाउन्स में हमेशा छेद (hole)के साइज को सॉफ्ट के साइज से बड़ा रखा जाता है| अर्थात अधिकतम एलाउन्स
हमेशा धनात्मक(+) होता है|
अधिकतम एलाउन्स को रनिंग फिट मैं रखा जाता है|

न्यूनतम एलाउन्स(minimum allowance)

किसी भी छेद (hole)के साइज की लो लिमिट साइज और सॉफ्ट की हाई लिमिट साइज के अंतर को न्यूनतम एलाउन्स कहते हैं|
न्यूनतम एलाउन्स में छेद(hole) साइज को हमेशा सॉफ्ट के साइज से कम रखा जाता है |
न्यूनतम एलाउन्स प्राप्त करने के लिए छेद के लो लिमिट साइज में से सॉफ्ट के हाई लिमिट साइज को घटाया जाता है|

टोलरेंस फॉर एलाउन्स मे अंतर(difference between tolerance and allowance)

टोलरेंस(tolerance)
1. टोलरेंस एक ही जॉब के भिन्न-भिन्न साइजों पर अलग-अलग हो सकती है|
2. टॉलरेंस बेसिक साइज पर आधारित होती है|
3. टॉलरेंस ब्लूप्रिंट या ड्राइंग के अनुसार रखी जाती है|
एलाउन्स(allowance)
1.एलाउन्स दो मिलने या फिट होने वाले पार्ट्स पर दिया जाता है
2. एलाउन्स फिट के प्रकार पर आधारित होता है
3. यह इच्छित फिट प्राप्त करने के लिए जानबूझकर रखा जाता है|



टौलरेन्स क्या है और इसके क्या लाभ है

 

इस पोस्ट में हम जानेगे टौलरेन्स क्या है और इसके क्या लाभ है, तथा टौलरेन्स की पद्धतियां, यूनिलैटरल टौलरेन्स, बाइलेटरल टौलरेन्स, मौलिक टौलरेन्स, और टौलरेन्स जोन को विस्तार से जानेंगे |

टौलरेन्स(tolerance)

किसी पार्ट्स (पुर्जे) के बेसिक साइज पर दी गई हाई लिमिट और लो लिमिट के अंतर को टौलरेन्स कहते हैं |

टौलरेन्स के लाभ(advantage of tolerance)

1. इससे समय की बचत होती है और उत्पादन बढ़ता है|
2. कम कुशल कारीगर से काम लिया जा सकता है|
3. पार्ट्स (पुर्जे) कम रिजेक्ट होते हैं |
4. उत्पादन की लागत कम आती है|
नोट:- टौलरेन्स प्रत्येक पार्ट्स पर अलग-अलग हो सकती है|

टौलरेन्स की पद्धतियां (systems of tolerance)

टौलरेन्स दो प्रणालियों के अनुसार दी जाती है |
1. यूनिलैटरल टौलरेन्स(unilateral tolerance)
2. बाइलेटरल टौलरेन्स(bilateral tolerance)

यूनिलैटरल टौलरेन्स(unilateral tolerance)

इस प्रणाली के अनुसार टौलरेन्स बेसिक साइज पर केवल एक ही तरफ दी जाती है|
अर्थात यह टौलरेन्स केवल एक ही तरफ धनात्मक (+) या ऋणात्मक (-) मैं होती है|

बाइलेटरल टौलरेन्स(bilateral tolerance)

इस प्रणाली में टौलरेन्स बेसिक साइंज के दोनों तरफ की जाती है |
अर्थात यह टौलरेन्स दोनों ही तरफ धनात्मक (+) या ऋणात्मक (-) मैं होती है|

मौलिक टौलरेन्स(fundamental tolerance)

भारतीय मानक प्रणाली(Indian standard system) अर्थात I.S.I. के अनुसार 500 मिलीमीटर व्यास की सॉफ्ट के हॉल में विभिन्न फिट के लिए 18 मौलिक(fundamental) टौलरेन्स की श्रेणियां होती है|
इन श्रेणियों को I T O, I T, से 16 नंबरों द्वारा व्यक्त किया जाता है |
इसे टौलरेन्स की ग्रेड से भी जाना जाता है |
टौलरेन्स का ग्रेड निर्माण(manufacture) की परीशुद्धता के आधार पर निर्धारित किया जाता है |

टौलरेन्स साइज(tolerance size)

टौलरेन्स साइज के अंतर्गत मौलिक डेविएशन, टौलरेन्स का ग्रेड और बेसिक साइज दिया जाता है |
जैसे:- 30 H 5 से आप क्या समझते हैं ?
हल:- होल का बेसिक साइज 30 मिलीमीटर व्यास है|
मौलिक डेविएशन H से प्रकट किया गया है |
टौलरेन्स ग्रेड 5 नंबर से प्रकट किया गया है|

टौलरेन्स जोन(tolerance zone)

हाई लिमिट तथा लो लिमिट के अंतर को टौलरेन्स जोन कहते हैं|
Tolerance-zone,hole-basis-tolerance


टौलरेन्स जोन के माप में बना किसी भी साइज का जॉब सही होता है |
टौलरेन्स जोन की दो प्रणालियां प्रचलित हैं|
1. होल बेसिस टौलरेन्स (hole basis tolerance)
2. शाफ्ट बेसिस टौलरेन्स (shaft basis tolerance)

होल बेसिस टौलरेन्स (hole basis tolerance)

इस प्रणाली में शाफ्ट का साइज स्थिर(fix) रखा जाता है और टौलरेन्स केवल छेद(hole) के साइज पर दी जाती है |
इस प्रणाली का उपयोग अधिकतम किया जाता है | क्योंकि किसी भी मानक साइज के छेद को आसानी से और शुद्धता में बनाया जा सकता है |

शाफ्ट बेसिस टौलरेन्स (shaft basis tolerance)

इस प्रणाली में शाफ्ट का साइज स्थिर रखा जाता है|
और टौलरेन्स केवल छेद के साइज पर दी जाती है |
इस प्रणाली का उपयोग होल बेसिस प्रणाली की अपेक्षा कम किया जाता है |

दोस्तों इस पोस्ट में हमने जाना टौलरेन्स क्या है और इसके क्या लाभ है, तथा टौलरेन्स की पद्धतियां, यूनिलैटरल टौलरेन्स, बाइलेटरल टौलरेन्स, मौलिक टौलरेन्स, और टौलरेन्स जोन को विस्तार से जाना |


लिमिट क्या हैं और यह कितने प्रकार की होती है

 इस पोस्ट में हम जानेंगे की लिमिट क्या है, यह क्यों जरूरी है, और यह कितने प्रकार की होती है तथा हाई लिमिट और लो लिमिट को जानेंगे

लिमिट क्या है

जॉब को बनाते समय उसके बेसिक साइंस से कुछ कम या अधिक बनाने की छूट दी जाती है | बेसिक साइज पर स्वीकृत अधिकतम तथा न्यूनतम सीमा जिस सीमा में पार्ट के साइज बनाए जा सकते हैं, उसे लिमिट (Limit) कहते हैं|

लिमिट को धन (+) या ऋण (-) चिन्हों से दर्शाया जाता है|

लिमिट क्यों जरूरी है

कार्यशाला में जब पुर्जो का उत्पादन किया जाता है तो कारीगर को पूर्जों के बेसिक साइजों को थोड़ा सा बड़ा या छोटा बनाने की छूट दी जाती है जिससे पुर्जो(parts) की गुणवत्ता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है क्योंकि कई कारण ऐसे होते हैं जिनके कारण पूर्जों(parts) को बिल्कुल परिशुद्ध साइज में नहीं बनाया जा सकता है|

इसके अतिरिक्त यदि पार्ट को सही परिशुद्ध बना भी लिया जाता है तो समय अधिक लगता है|

इसलिए पार्ट को बनाने के लिए सीमा निर्धारित कर दी जाती है की पार्ट को बेसिक साइज से कितनी सीमा से अधिक या कम साइज में बनाया जा सकता है|

इससे कारीगर(worker) को पुर्जे(parts) को सही साइज में बनाने में आसानी रहती है और इस सीमा में बने पुर्जे(parts) सही रहते हैं और वह अपना कार्य अच्छे ढंग से करते हैं|

इसीलिए हमें लिमिट की जरूरत होती है जिससे पार्ट्स को बनाने में आसानी हो सके|

लिमिट के प्रकार (types of limit)

लिमिट दो प्रकार की होती हैं|

1. हाई लिमिट(high limit)

2. लो लिमिट(low limit)


हाई लिमिट(high limit)

किसी पार्ट्स के बेसिक साइज पर स्वीकृत सीमा जिससे पुर्जे(parts) को अधिक से अधिक जिस सीमा में उसकी साइज को बनाया जा सकता है, उसे हाई लिमिट कहते हैं|


लो लिमिट(low limit)

किसी पार्ट के बेसिक साइज पर स्वीकृत सीमा जिससे पार्ट को कम से कम जिस सीमा में उसकी साइज को बनाया जा सकता है उसे लो लिमिट कहते हैं |

limit,high-limit,low-limit


दोस्तों इस पोस्ट में हमने जाना की लिमिट क्या है, यह क्यों जरूरी है, और यह कितने प्रकार की होती है तथा हाई लिमिट और लो लिमिट, अगर आपको यह पोस्ट पसंद आया तो कृपया इसे शेयर करें और कमेंट करना ना भूलें|

धन्यवाद

विनिमयशीलता या इंटरचेंजेबिलिटी, और एसैम्बलिंग क्या है, और इनके क्या लाभ है

 इस पोस्ट में हम विनिमयशीलता या इंटरचेंजेबिलिटी, और एसैम्बलिंग क्या है, और इनके क्या लाभ है के बारे में विस्तार से जानेंगे|

विनिमयशीलता या इंटरचेंजेबिलिटी का परिचय(introduction of interchangeability)

जब कभी हमें एक ही तरह के पार्ट्स अधिक मात्रा में बनाने हो जो कि बिल्कुल एक ही साइज, एक ही आकार और परिशुद्धता में एक दूसरे के स्थान पर फिट हो जाएं तो इसे विनिमयशीलता या इंटरचेंजेबिलिटी(interchangeability) कहते हैं|


जब कभी मशीन के किसी खराब या घिसे हुए पुर्जे(parts) को बदलना पड़े तो उसके स्थान पर फिट किए जाने वाला पुर्जा किसी भी कंपनी से मंगवाया गया हो या नया हो तो यह खुर्जा बिना मशीनिंग संक्रिया(machining operation) के आसानी से फिट हो जाए और मशीन पहले की तरह कार्य करने लगे तो पूर्जों के फिट होने कि इस गुण को भी विनिमयशीलता या इंटरचेंजेबिलिटी कहते हैं|
अतः अगर दूसरे शब्दों में कहें तो मशीन या उपकरण में घिसे और टूटे-फूटे पुर्जो के स्थान पर नए पूजों की अदला-बदली को इंटरचेंजेबिलिटी कहते हैं|


एसैम्बलिंग क्या है


जब कोई भी उपकरण या मशीन बनाने के लिए अलग-अलग आकार की पूर्जो(parts) की आवश्यकता होती है, जिन्हें विभिन्न विधियों से बना कर और आपस में जोड़कर उपकरण या मशीन का नाम दिया जाता है इन पार्ट्स को जोड़ने की क्रिया को एसैम्बलिंग(assembling) कहा जाता है|


विनिमयशीलता या इंटरचेंजेबिलिटी के लाभ


विनिमयशीलता या इंटरचेंजेबिलिटी के अनेक लाभ हैं जो इस प्रकार है|
1. असेंबलिंग में कम समय लगता है|
2. पार्ट का रिजेक्शन(rejection) कम होता है|
3. उत्पादन तथा उपयोग के क्षेत्र में बढ़ोतरी होती है|
4. घिसे और टूटे मशीन पुर्जो को बदलने में सुविधा होती है क्योंकि बाजार में मिलने वाले पुर्जे मूल पुर्जे के विवरण के अनुसार बने होते है|


दोस्तों इस पोस्ट में हमने जाना विनिमयशीलता या इंटरचेंजेबिलिटी, और एसैम्बलिंग क्या है, और इनके क्या लाभ हैं | अगर आपको हमारा पोस्ट पसंद आया कृपया फॉलो करें और ज्यादा से ज्यादा शेयर करें
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स्क्रु थ्रेड का छोटा व्यास कैसे मापे

 इस पोस्ट में हम स्क्रु थ्रेड का छोटा व्यास कैसे मापे और इसे मापने वाले उपकरणों के बारे में विस्तार से जानेंगे|

स्क्रु थ्रेड का छोटा व्यास कैसे मापे

स्क्रु थ्रेड के छोटे व्यास को चेक करने के लिए विभिन्न प्रकार के मापी उपकरणों का प्रयोग किया जाता है जो इस प्रकार हैं|

1. वर्नियर कैलीपर(Vernier caliper)

2. प्रिज्म(prism)

3. स्लिप गेज तथा प्रीसीजन रोलर्स के द्वारा(slip gauge and precision rollers)

4. टेपर पैरेलल के द्वारा(by taper parallel)

5. ऑप्टिकल प्रोजेक्टर के द्वार(by optical projector)


वर्नियर कैलीपर(Vernier caliper)

वर्नियर कैलीपर की द्वारा भी बाहरी माइनर डायमीटर चेक किया जा सकता है|

इसमें वर्नियर कैलीपर की नाइफ एज प्वाइंटों के द्वारा मापा जाता है|

प्रिज्म(prism)

प्रिज्म की 3 पॉइंट से भी थ्रेड के माइनर डायमीटर को चेक किया जा सकता है|

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यह प्रिज्म अलग-अलग साइजों मैं उपलब्ध होती हैं, जिससे साइजों के अनुसार ही थ्रेड चेक की जाती है|

स्लिप गेज तथा प्रीसीजन रोलर्स के द्वारा(slip gauge and precision rollers)

इस विधि में नट या बेलनाकार चूड़ीदार पार्ट के अंदर स्लिप गेज को सेट इस तरह किया जाता है कि रोलर्स को स्लाइड नहीं कर सके |

Slip-gauge-and-precision-rollers

इस विधि में रोलर तथा स्लिप गेज को प्रयोग करते समय व्यास के प्रीसीजन रोलर को बोल्ट के व्यास में विपरीत साइड में सेट किया जाता है|

टेपर पैरेलल के द्वारा(by taper parallel)

इस विधि में आंतरिक बेलनाकार चूड़ी के बीच में टेपर पैरेलल को फंसा कर सेट किया जाता है|

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इसकी सही सेटिंग के बाद आउटसाइड माइक्रोमीटर के द्वारा माप लिया जाता है|

ऑप्टिकल प्रोजेक्टर के द्वार(by optical projector)

Optical-projector


इस विधि में बाहरी इस ग्रुप ट्रेड की प्रोफाइल को उत्तल लेंस द्वारा बड़ा करके देखने पर उसकी प्रतिबिंब की कौण को प्रोजेक्टर के द्वारा स्क्रीन पर स्पष्ट देख सकते हैं और कौण को आसानी से मापा जा सकता है|

आधार कार्ड में दस्तावेज़ अपलोड Document upload in Aadhar Card

 इस पोस्ट में हम जानेगे आधार कार्ड में दस्तावेज़ अपलोड करना क्यों जरुरी है और आधार कार्ड में दस्तावेज़ अपलोड करने की प्रक्रिया क्या है | आधा...