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लिमिट्स और फिट्स की विभिन्न प्रणालियां और मौलिक विचलन क्या है |

 इस पोस्ट में हम लिमिट्स और फिट्स की विभिन्न प्रणालियां, जैसे- ब्रिटिश प्रणाली, भारतीय प्रणाली, और मौलिक विचलन के बारे में विस्तार पूर्वक जानेंगे |

लिमिट्स और फिट्स की विभिन्न प्रणालियां (different systems of limits and fits)

लिमिट्स और फिट की मुख्यत: तीन प्रणालियां प्रचलित हैं|
1. न्यूअल प्रणाली(newell system)
2. ब्रिटिश मानक प्रणाली(British standard system)
3. भारतीय मानक प्रणाली(Indian standard system)

न्यूअल प्रणाली(newell system)

यह प्रणाली होल बेसिस सिस्टम पर आधारित है, जिसमें किसी भी प्रकार की फिटिंग प्राप्त करने के लिए छेद(hole) के व्यास को स्थिर रखा जाता है|
न्यूअल प्रणाली की खोज
इस प्रणाली की खोज न्यूअल इंजीनियरिंग कंपनी ने की, जिससे संसार की बहुत बड़े-बड़े कारखानों में विभिन्न प्रकार की फिटस दिए जाने वाले 1/2 इंच से 6 इंच व्यास तक के छेदों के लिए टोलरेंस निश्चित की |
न्यूअल प्रणाली की श्रेणियां
न्यूअल प्रणाली परीशुद्धता के आधार पर छेदों को A तथा B श्रेणियों में बांटा गया है|
A श्रेणी का प्रयोग अत्यधिक परिशुद्ध कार्यों के लिए किया जाता है|
एवं B श्रेणी का प्रयोग साधारण कार्यों के लिए किया जाता है|
इस प्रणाली में फोर्स फिट, ड्राइविंग फिट, पुश फिट तथा रनिंग फिट आती हैं|
इन फिटों को ड्राइंग पर दिखाने के लिए अक्षरों का प्रयोग किया जाता है, जैसे:- फोर्स फिट के लिए F और पूश फिट के लिए P अक्षर का प्रयोग किया जाता है|
परंतु फिट को दर्शाने के लिए अक्षर x, y, और z, का भी प्रयोग किया जाता है|

2. ब्रिटिश मानक प्रणाली(British standard system)

इस प्रणाली में 21 प्रकार की अलग-अलग फिट प्राप्त करने हेतु छेद (hole) के साइज पर एक तरफा(unilateral) या दो तरफा (bilateral) कुल 16 ग्रेड में टोलरेंस(tolerance) दी जाती है |
ब्रिटिश मानक प्रणाली में छेद(hole) को अंग्रेजी के बड़े अक्षरों में A,B,C, से Z तक दर्शाया जाता है |
तथा शाफ़्ट को अंग्रेजी की इन्हीं छोटे अक्षरों a,b,c,d, से z तक दर्शाया जाता है|
ब्रिटिश मानक प्रणाली की खोज
यह प्रणाली इंग्लैंड में सन 1953 में अपनाई गई थी|
जिसमें 16 ग्रेड की टोलरेंस 1 से 16 नवंबर तक दी जाती है|
यदि किसी छेद या शाफ़्ट पर टोलरेंस दी जाती है तो छेद या शाफ़्ट के निशान के साथ टोलरेंस की ग्रेड का नंबर भी लिया जाता है जैसे - H7, g6 आदि |

3. भारतीय मानक प्रणाली(Indian standard system)

इस प्रणाली में विभिन्न प्रकार की फिट प्राप्त करने के लिए 25 मौलिक विचलनों में बांटा गया है|
Limit-fits-ki-ISI-pranali


जिन्हें अंग्रेजी के बड़े अक्षरों द्वारा दर्शाया जाता है, जैसे:- छेद के लिए A,B,C,D,E,F,G,H,I,J,K,L,M,N,O,P,Q,R,S,T,U,V,W,X,Y,Z, तथा ZB, और ZC
एवं सॉफ्ट के लिए अंग्रेजी के यही अक्षर छोटे अक्षरों मैं प्रयोग किए जाते हैं|
za,zb, और, zc अधिकतम इंटरफियरेन्स प्राप्त करने के लिए प्रयोग में लाए जाते हैं|

भारतीय मानक प्रणाली की खोज

भारत में ब्रिटिश प्रणाली के आधार पर I.S.919 - 1959 के अनुसार पहले यह प्रणाली इंचों मे थी, जिसमें 16 लिमिट्स और फिट्स की प्रणालियां थी, जिन्हें IT 1 से IT 16 तक व्यक्त किया जाता था|
इसके बाद अब भारतीय मानक संस्थान ने I.S.I. प्रणाली के आधार पर I.S.919 - 1959 मे संशोधन करके एक नई प्रणाली 10 दिसंबर 1963 के नाम से प्रकाशित की,
जिसमें लिमिट् और फिट का विस्तार पूर्वक विवेचन किया|
इसके अंतर्गत 500 मिलीमीटर व्यास की शाफ़्ट तथा छेद़ में विभिन्न फिट प्राप्त करने के लिए 18 बेसिक टॉलरेंस की श्रेणियां हैं|
इन श्रेणियों को ITO 1, ITO और IT 1 से IT 16 द्वारा व्यक्त किया जाता है | इन्हें परिशुद्धता ग्रेड भी कहते हैं |

मौलिक विचलन (fundamental division)

Maulik-vichalan,fundamental-division


दो विचलनों (divisions) मे से किसी एक को शुन्य रेखा (zero line) के साथ संबंधित टोलरेंस जोन(tolerance zone) दिखाने में सुविधा हो, उसी मौलिक विचलन कहते हैं|

इस पोस्ट में हमने जाना लिमिट्स और फिट्स की विभिन्न प्रणालियां, जैसे- ब्रिटिश प्रणाली, भारतीय प्रणाली, और मौलिक विचलन के बारे में अगर आपको यह पोस्ट पसंद आया तो कृपया ज्यादा से ज्यादा शेयर करें

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फिट, और फिट के प्रकार

 इस पोस्ट में हम जानेंगे फिट और फिट के प्रकार, जैसे क्लीयरेंस फिट, इन्टरफीयरेंस फिट, ट्रांजिशन फिट और इनके सभी प्रकार के बारे में |

फिट(fit)

किसी भी मशीन या उपकरण को अलग-अलग अनेक पार्ट्स से असेंबल करके बनाया जाता है|
इनमें से कुछ विशेष पार्ट्स होते हैं जिनकी साइजों को सूक्ष्मता से बनाया जाता है और वे आपस में स्लाइडिंग करते हैं या घूमते है|
इस प्रकार से असेंबल किए जाने वाले पार्ट्स के बीच में क्लीयरेंस (अवकाश) या इन्टरफीयरेंस (व्यतिकरण) की मात्रा से बनने वाले संबंध को फिट कहते हैं |
अन्यथा संक्षेप में हम कह सकते हैं कि असेंबल की हुई 2 पार्ट्स के बीच के संबंध को फिट कहते हैं|

फिट के प्रकार(types of fit)

फिट मुख्य रूप से तीन प्रकार की होती है |
1. क्लीयरेंस फिट या अवकाश फिट (clearance fit)
2. व्यतिकरण फिट या इन्टरफीयरेंस फिट(interference fit)
3. ट्रांजिशन फिट(transition fit)

1. क्लीयरेंस फिट या अवकाश फिट (clearance fit)

जब शाफ्ट किसी होल के अंदर स्वतंत्र घूमे और उसमें किसी भी प्रकार की कोई रुकावट नहीं हो तो उसे क्लीयरेंस फिट कहते हैं |
क्लीयरेंस फिट में शाफ्ट का व्यास छेद के व्यास की अपेक्षा कम रखा जाता है| जिससे कि फिट होने के बाद भी कुछ क्लीयरेंस बनी रहे |

क्लीयरेंस फिट के प्रकार(types of clearance fit)

यह फिट दो प्रकार की होती है|
1. रनिंग फिट(running fit)
2. स्लाइडिंग फिट(sliding fit)

रनिंग फिट(running fit)

रनिंग फिट में धनात्मक अलाउंस रखा जाता है, ताकि दोनों पार्ट्स जब असेंबल किए जाते हैं तो क्लेयरेंस अधिक होने के कारण शाफ्ट छेद में आसानी से और स्वतंत्र रूप से घूम सकती है |
रनिंग फिट के उदाहरण:- बुश बियरिंग और शाफ्ट

स्लाइडिंग फिट(sliding fit)

इस फिट में रनिंग फिट की अपेक्षा थोड़ा कम धनात्मक अलाउंस रखा जाता है
जैसे:- ब्लैंकिंग पंच और शाफ्ट

2. व्यतिकरण फिट या इन्टरफीयरेंस फिट(interference fit)

इन्टरफीयरेंस फिट में 2 पार्ट्स को फिट करते समय थोड़ा सा बल लगाने की आवश्यकता होती है|
इस फिट में होल के साइज की माप को शाफ़्ट कि माप से थोड़ा कम या छोटा रखा जाता है|
इन्टरफीयरेंस फिट का उपयोग वहां किया जाता है जहां किसी पार्ट को स्थाई रूप से फिट करना हो |
इन्टरफीयरेंस फिट मैं ऋणात्मक अलाउंस रखा जाता है |

अधिकतम इन्टरफीयरेंस क्या होता है(maximum interference)

यह इन्टरफीयरेंस फिट में छेद की न्यूनतम माप एवं शाफ़्ट की अधिकतम माप का बीजगणितीय अंतर होता है

न्यूनतम इन्टरफीयरेंस (minimum interference)

यह इन्टरफीयरेंस होल के अधिकतम माप(साइज) तथा शाफ्ट के न्यूनतम माप का बीजगणितीय अंतर होता है|

इन्टरफीयरेंस फिट के प्रकार (types of interference fit)

1. फोर्स फिट(force fit)
2. ड्राइविंग फिट(driving fit)
3. श्रिंकेज फिट(shrinkage fit)

फोर्स फिट(force fit)

इस तरह की फिट में छेद(hole) के साइज को शाफ्ट के साइज की अपेक्षा छोटा रखा जाता है|
फोर्स फिट मैं दोनों पार्टस को किसी यांत्रिक प्रेशर के दबाव से फिट किया जाता है |
इस प्रकार की फिट में हाइड्रोलिक प्रेशर के द्वारा की पार्ट्स को अधिकतर फिट किया जाता है, जैसे- किसी बॉडी के हब मैं स्लीव को फिट करना |

श्रिंकेज फिट(shrinkage fit)

श्रिंकेज फिट में छेद वाले भाग को गर्म किया जाता है जिससे कि छेद का व्यास बढ़ जाता है, और शाफ्ट पर फिट हो जाता है |
इसके पश्चात इसे ठंडा कर लिया जाता है| ठंडा होने पर छेद वाला भाग सिकुड़ता है और मजबूती से शाफ्ट को पकड़ लेता है |
श्रिंकेज फिट का उदाहरण:- बैलगाड़ी के लकड़ी के पहिए पर लोहे की रिम चढ़ाना श्रिंकेज फिट का उदाहरण है |

3.ट्रांजिशन फिट(transition fit)

यह फिट क्लीयरेंस फिट तथा इन्टरफीयरेंस फिट के बीच की फिट होती है |
Transition-fit


ट्रांजिशन फिट छेद तथा शाफ्ट के बीच में इतना अलाउंस रखा जाता है कि मैं तो इससे अधिक क्लीयरेंस और ना ही अधिक इन्टरफीयरेंस रह सके |

पुश फिट(push fit)

इस प्रकार की फिट क्लीयरेंस फिट तथा इन्टरफीयरेंस फिट के बीच की फिट होती है |
इसमें ना तो अधिक क्लीयरेंस होता है और ना अधिक इंटरफीयरेन्स होता है |
पुश फिट में पार्ट को हाथ के दबाव से अथवा मेलेट की सहायता से फिट करते हैं|
पुश फिट का उदाहरण:- डॉवल पेन, लोकेटिंग प्लग आदि |


इस पोस्ट में हमने जाना फिट और फिट के प्रकार, जैसे क्लीयरेंस फिट, इन्टरफीयरेंस फिट, ट्रांजिशन फिट और इनके सभी प्रकार के बारे में |अगर आपको यह है पोस्ट अच्छा लगा तो कृपया शेयर करें|

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एलाउन्स क्या है और यह कितने प्रकार का होता है

 इस पोस्ट में हम जानेंगे एलाउन्स क्या है और यह कितने प्रकार का होता है तथा अधिकतम एलाउन्स और न्यूनतम एलाउन्स क्या होते हैं एवं टोलरेंस और एलाउन्स में क्या अंतर है|

एलाउन्स(allowance)

जब किसी निर्धारित फिट के अनुसार 2 पार्ट्स को बनाकर मिलाया जाता है तो इन दोनों पार्ट्स की माप मैं जानबूझकर जो अंतर रखा जाता है उसे एलाउन्स कहते हैं |
किसी भी प्रकार की फिट के अनुसार एलाउन्स धनात्मक(+) या ऋणात्मक(-) हो सकते हैं |
एलाउन्स का संबंध किसी भी फिट होने वाले 2 पार्ट्स से होता है ना की किसी एक पार्ट(पुर्जे) से होता है |

एलाउन्स के प्रकार(types of allowance)

एलाउन्स दो प्रकार के होते हैं|
1. अधिकतम एलाउन्स(maximum allowance)
2. न्यूनतम एलाउन्स(minimum allowance)

अधिकतम एलाउन्स(maximum allowance)

किसी भी छेद (hole)के साइज के हाई लिमिट और सॉफ्ट के साइज की लो लिमिट के अंतर को अधिकतम एलाउन्स कहते हैं |
अर्थात अधिकतम एलाउन्स प्राप्त करने के लिए छेद के हाई लिमिट साइज में से सॉफ्ट के लो लिमिट साइज को घटाया जाता है |
अधिकतम एलाउन्स में हमेशा छेद (hole)के साइज को सॉफ्ट के साइज से बड़ा रखा जाता है| अर्थात अधिकतम एलाउन्स
हमेशा धनात्मक(+) होता है|
अधिकतम एलाउन्स को रनिंग फिट मैं रखा जाता है|

न्यूनतम एलाउन्स(minimum allowance)

किसी भी छेद (hole)के साइज की लो लिमिट साइज और सॉफ्ट की हाई लिमिट साइज के अंतर को न्यूनतम एलाउन्स कहते हैं|
न्यूनतम एलाउन्स में छेद(hole) साइज को हमेशा सॉफ्ट के साइज से कम रखा जाता है |
न्यूनतम एलाउन्स प्राप्त करने के लिए छेद के लो लिमिट साइज में से सॉफ्ट के हाई लिमिट साइज को घटाया जाता है|

टोलरेंस फॉर एलाउन्स मे अंतर(difference between tolerance and allowance)

टोलरेंस(tolerance)
1. टोलरेंस एक ही जॉब के भिन्न-भिन्न साइजों पर अलग-अलग हो सकती है|
2. टॉलरेंस बेसिक साइज पर आधारित होती है|
3. टॉलरेंस ब्लूप्रिंट या ड्राइंग के अनुसार रखी जाती है|
एलाउन्स(allowance)
1.एलाउन्स दो मिलने या फिट होने वाले पार्ट्स पर दिया जाता है
2. एलाउन्स फिट के प्रकार पर आधारित होता है
3. यह इच्छित फिट प्राप्त करने के लिए जानबूझकर रखा जाता है|



टौलरेन्स क्या है और इसके क्या लाभ है

 

इस पोस्ट में हम जानेगे टौलरेन्स क्या है और इसके क्या लाभ है, तथा टौलरेन्स की पद्धतियां, यूनिलैटरल टौलरेन्स, बाइलेटरल टौलरेन्स, मौलिक टौलरेन्स, और टौलरेन्स जोन को विस्तार से जानेंगे |

टौलरेन्स(tolerance)

किसी पार्ट्स (पुर्जे) के बेसिक साइज पर दी गई हाई लिमिट और लो लिमिट के अंतर को टौलरेन्स कहते हैं |

टौलरेन्स के लाभ(advantage of tolerance)

1. इससे समय की बचत होती है और उत्पादन बढ़ता है|
2. कम कुशल कारीगर से काम लिया जा सकता है|
3. पार्ट्स (पुर्जे) कम रिजेक्ट होते हैं |
4. उत्पादन की लागत कम आती है|
नोट:- टौलरेन्स प्रत्येक पार्ट्स पर अलग-अलग हो सकती है|

टौलरेन्स की पद्धतियां (systems of tolerance)

टौलरेन्स दो प्रणालियों के अनुसार दी जाती है |
1. यूनिलैटरल टौलरेन्स(unilateral tolerance)
2. बाइलेटरल टौलरेन्स(bilateral tolerance)

यूनिलैटरल टौलरेन्स(unilateral tolerance)

इस प्रणाली के अनुसार टौलरेन्स बेसिक साइज पर केवल एक ही तरफ दी जाती है|
अर्थात यह टौलरेन्स केवल एक ही तरफ धनात्मक (+) या ऋणात्मक (-) मैं होती है|

बाइलेटरल टौलरेन्स(bilateral tolerance)

इस प्रणाली में टौलरेन्स बेसिक साइंज के दोनों तरफ की जाती है |
अर्थात यह टौलरेन्स दोनों ही तरफ धनात्मक (+) या ऋणात्मक (-) मैं होती है|

मौलिक टौलरेन्स(fundamental tolerance)

भारतीय मानक प्रणाली(Indian standard system) अर्थात I.S.I. के अनुसार 500 मिलीमीटर व्यास की सॉफ्ट के हॉल में विभिन्न फिट के लिए 18 मौलिक(fundamental) टौलरेन्स की श्रेणियां होती है|
इन श्रेणियों को I T O, I T, से 16 नंबरों द्वारा व्यक्त किया जाता है |
इसे टौलरेन्स की ग्रेड से भी जाना जाता है |
टौलरेन्स का ग्रेड निर्माण(manufacture) की परीशुद्धता के आधार पर निर्धारित किया जाता है |

टौलरेन्स साइज(tolerance size)

टौलरेन्स साइज के अंतर्गत मौलिक डेविएशन, टौलरेन्स का ग्रेड और बेसिक साइज दिया जाता है |
जैसे:- 30 H 5 से आप क्या समझते हैं ?
हल:- होल का बेसिक साइज 30 मिलीमीटर व्यास है|
मौलिक डेविएशन H से प्रकट किया गया है |
टौलरेन्स ग्रेड 5 नंबर से प्रकट किया गया है|

टौलरेन्स जोन(tolerance zone)

हाई लिमिट तथा लो लिमिट के अंतर को टौलरेन्स जोन कहते हैं|
Tolerance-zone,hole-basis-tolerance


टौलरेन्स जोन के माप में बना किसी भी साइज का जॉब सही होता है |
टौलरेन्स जोन की दो प्रणालियां प्रचलित हैं|
1. होल बेसिस टौलरेन्स (hole basis tolerance)
2. शाफ्ट बेसिस टौलरेन्स (shaft basis tolerance)

होल बेसिस टौलरेन्स (hole basis tolerance)

इस प्रणाली में शाफ्ट का साइज स्थिर(fix) रखा जाता है और टौलरेन्स केवल छेद(hole) के साइज पर दी जाती है |
इस प्रणाली का उपयोग अधिकतम किया जाता है | क्योंकि किसी भी मानक साइज के छेद को आसानी से और शुद्धता में बनाया जा सकता है |

शाफ्ट बेसिस टौलरेन्स (shaft basis tolerance)

इस प्रणाली में शाफ्ट का साइज स्थिर रखा जाता है|
और टौलरेन्स केवल छेद के साइज पर दी जाती है |
इस प्रणाली का उपयोग होल बेसिस प्रणाली की अपेक्षा कम किया जाता है |

दोस्तों इस पोस्ट में हमने जाना टौलरेन्स क्या है और इसके क्या लाभ है, तथा टौलरेन्स की पद्धतियां, यूनिलैटरल टौलरेन्स, बाइलेटरल टौलरेन्स, मौलिक टौलरेन्स, और टौलरेन्स जोन को विस्तार से जाना |


लिमिट क्या हैं और यह कितने प्रकार की होती है

 इस पोस्ट में हम जानेंगे की लिमिट क्या है, यह क्यों जरूरी है, और यह कितने प्रकार की होती है तथा हाई लिमिट और लो लिमिट को जानेंगे

लिमिट क्या है

जॉब को बनाते समय उसके बेसिक साइंस से कुछ कम या अधिक बनाने की छूट दी जाती है | बेसिक साइज पर स्वीकृत अधिकतम तथा न्यूनतम सीमा जिस सीमा में पार्ट के साइज बनाए जा सकते हैं, उसे लिमिट (Limit) कहते हैं|

लिमिट को धन (+) या ऋण (-) चिन्हों से दर्शाया जाता है|

लिमिट क्यों जरूरी है

कार्यशाला में जब पुर्जो का उत्पादन किया जाता है तो कारीगर को पूर्जों के बेसिक साइजों को थोड़ा सा बड़ा या छोटा बनाने की छूट दी जाती है जिससे पुर्जो(parts) की गुणवत्ता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है क्योंकि कई कारण ऐसे होते हैं जिनके कारण पूर्जों(parts) को बिल्कुल परिशुद्ध साइज में नहीं बनाया जा सकता है|

इसके अतिरिक्त यदि पार्ट को सही परिशुद्ध बना भी लिया जाता है तो समय अधिक लगता है|

इसलिए पार्ट को बनाने के लिए सीमा निर्धारित कर दी जाती है की पार्ट को बेसिक साइज से कितनी सीमा से अधिक या कम साइज में बनाया जा सकता है|

इससे कारीगर(worker) को पुर्जे(parts) को सही साइज में बनाने में आसानी रहती है और इस सीमा में बने पुर्जे(parts) सही रहते हैं और वह अपना कार्य अच्छे ढंग से करते हैं|

इसीलिए हमें लिमिट की जरूरत होती है जिससे पार्ट्स को बनाने में आसानी हो सके|

लिमिट के प्रकार (types of limit)

लिमिट दो प्रकार की होती हैं|

1. हाई लिमिट(high limit)

2. लो लिमिट(low limit)


हाई लिमिट(high limit)

किसी पार्ट्स के बेसिक साइज पर स्वीकृत सीमा जिससे पुर्जे(parts) को अधिक से अधिक जिस सीमा में उसकी साइज को बनाया जा सकता है, उसे हाई लिमिट कहते हैं|


लो लिमिट(low limit)

किसी पार्ट के बेसिक साइज पर स्वीकृत सीमा जिससे पार्ट को कम से कम जिस सीमा में उसकी साइज को बनाया जा सकता है उसे लो लिमिट कहते हैं |

limit,high-limit,low-limit


दोस्तों इस पोस्ट में हमने जाना की लिमिट क्या है, यह क्यों जरूरी है, और यह कितने प्रकार की होती है तथा हाई लिमिट और लो लिमिट, अगर आपको यह पोस्ट पसंद आया तो कृपया इसे शेयर करें और कमेंट करना ना भूलें|

धन्यवाद

विनिमयशीलता या इंटरचेंजेबिलिटी, और एसैम्बलिंग क्या है, और इनके क्या लाभ है

 इस पोस्ट में हम विनिमयशीलता या इंटरचेंजेबिलिटी, और एसैम्बलिंग क्या है, और इनके क्या लाभ है के बारे में विस्तार से जानेंगे|

विनिमयशीलता या इंटरचेंजेबिलिटी का परिचय(introduction of interchangeability)

जब कभी हमें एक ही तरह के पार्ट्स अधिक मात्रा में बनाने हो जो कि बिल्कुल एक ही साइज, एक ही आकार और परिशुद्धता में एक दूसरे के स्थान पर फिट हो जाएं तो इसे विनिमयशीलता या इंटरचेंजेबिलिटी(interchangeability) कहते हैं|


जब कभी मशीन के किसी खराब या घिसे हुए पुर्जे(parts) को बदलना पड़े तो उसके स्थान पर फिट किए जाने वाला पुर्जा किसी भी कंपनी से मंगवाया गया हो या नया हो तो यह खुर्जा बिना मशीनिंग संक्रिया(machining operation) के आसानी से फिट हो जाए और मशीन पहले की तरह कार्य करने लगे तो पूर्जों के फिट होने कि इस गुण को भी विनिमयशीलता या इंटरचेंजेबिलिटी कहते हैं|
अतः अगर दूसरे शब्दों में कहें तो मशीन या उपकरण में घिसे और टूटे-फूटे पुर्जो के स्थान पर नए पूजों की अदला-बदली को इंटरचेंजेबिलिटी कहते हैं|


एसैम्बलिंग क्या है


जब कोई भी उपकरण या मशीन बनाने के लिए अलग-अलग आकार की पूर्जो(parts) की आवश्यकता होती है, जिन्हें विभिन्न विधियों से बना कर और आपस में जोड़कर उपकरण या मशीन का नाम दिया जाता है इन पार्ट्स को जोड़ने की क्रिया को एसैम्बलिंग(assembling) कहा जाता है|


विनिमयशीलता या इंटरचेंजेबिलिटी के लाभ


विनिमयशीलता या इंटरचेंजेबिलिटी के अनेक लाभ हैं जो इस प्रकार है|
1. असेंबलिंग में कम समय लगता है|
2. पार्ट का रिजेक्शन(rejection) कम होता है|
3. उत्पादन तथा उपयोग के क्षेत्र में बढ़ोतरी होती है|
4. घिसे और टूटे मशीन पुर्जो को बदलने में सुविधा होती है क्योंकि बाजार में मिलने वाले पुर्जे मूल पुर्जे के विवरण के अनुसार बने होते है|


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आधार कार्ड में दस्तावेज़ अपलोड Document upload in Aadhar Card

 इस पोस्ट में हम जानेगे आधार कार्ड में दस्तावेज़ अपलोड करना क्यों जरुरी है और आधार कार्ड में दस्तावेज़ अपलोड करने की प्रक्रिया क्या है | आधा...