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शीतलक (coolant) क्या है और इसके क्या लाभ है

 

दोस्तों इस पोस्ट में हम जानेंगे शीतलक (coolant) क्या होता है यह कितने प्रकार का होता है तथा इसके क्या लाभ हैं, शीतलक ओर स्नेहक मैं अंतर |

शीतलक (coolant)

जब हम किसी कार्यखण्ड या जॉब पर कटिंग का कार्य करते हैं तो बहुत अधिक ऊष्मा उत्पन्न होती है | इस ऊष्मा को अपने साथ बहाकर ले जाने वाले पदार्थ को हम शीतलक (coolant) कहते हैं |



अगर देखा जाए तो पानी एक अच्छा शीतलक (coolant) होता है और इसकी शीतल (cool) करने की क्षमता भी अच्छी होती है |
पानी का उपयोग उष्मा उपचार तथा रोलिंग कार्य में शीतलक के रूप में प्रयोग किया जाता है |
पानी एक सस्ता, आसानी से प्राप्त होने वाला, और ऊष्मा का अच्छा चालक तथा इसकी विशिष्ट ऊष्मा के आधार पर एक अच्छा शीतलक माना जाता है |
लेकिन पानी को जब हम शीतलक के रूप में प्रयोग करते हैं तो यह सावधानी बरतनी चाहिए की मशीन पर जंग नहीं लगे | इसके लिए सोडा वाटर मिश्रण को सस्ते शीतलक के रूप में प्रयोग करना चाहिए | यह सोडियम कार्बोनेट और पानी का मिश्रण होता है | जिसे गाढ़ा बनाने के लिए मुलायम साबुन मिला दिया जाता है | इसमें स्नेहन (lubricating) गुणों को बढ़ाने के लिए लॉर्ड तेल भी मिलाया जाता है |
टर्निंग, मीलिंग और ड्रिलिंग आदि संक्रियाओं (operations) के लिए सस्ते मिश्रण का प्रयोग किया जाता है | जिससे सोडियम कार्बोनेट लार्ड तेल तथा मुलायम साबुन बराबर बराबर मात्रा में मिलाकर शेष भाग में पानी को मिलाया जाता है, जिसे जलीय विलियन कहते हैं |

रासायनिक शीतलक (chemical coolant)

पानी के अंदर बहुत से रासायनिक अवयवों के घुले हुए मिश्रण को रासायनिक शीतलक कहते हैं | इनमें से कुछ अवयव स्नेहक (lubricant) के गुण को भी प्रदर्शित करते हैं |
शीतलक (coolant) का प्रवाह (flow) आंशिक शीतलन के द्वारा तन्यता (ductility) को कम करते हुए छीलन (chips) को तोड़ने का कार्य भी करता है |
शुद्ध शीतलक जंग निरोधक होते हैं |
रासायनिक शीतलको के उपयोग से मशीनन (machining) करते समय धातु को अधिक तेजी  से हटाया जा सकता है |
रासायनिक शीतलक अन्य शीतलको की तुलना में अधिक समय तक रहते हैं तथा छीलन (chips) को बैठने तथा प्राप्त करने में सहायक होते हैं |
केवल उन धातुओं को छोड़कर जिनमें शुष्क (dry) मशीनिंग लाभकारी होता है इनके अलावा सभी धातुओं में शीतलक (coolant) का प्रयोग किया जाता है |

शीतलक के लाभ (advantage of coolant)

अगर देखा जाए तो शीतलक के विभिन्न लाभ हैं कुछ विशेष लाभ के बारे में हम यहां दर्शा रहे हैं |
इसको अधिक उच्च चालो (high speed) पर प्रयोग किया जा सकता है |
इसके प्रयोग से औजारों (tools) का जीवनकाल बढ़ जाता है |
शीतलक का प्रयोग औजारों में धार लगाते समय किया जाता है |
अनेक शीतलक स्नेहक (lubricant) का कार्य करते हैं उनके प्रयोग से औजार(tools) तथा जॉब के बीच घर्षण कम होता है |

शीतलक का प्रयोग करते समय सावधानियां (precaution of coolant)

जब भी शीतलक का प्रयोग करते हैं तब हमें निम्नलिखित सावधानियां अपनानी चाहिए -
1. औजार की धार (cutting edge) तथा कार्य खंड या जॉब की सतह दोनों पर ही पर्याप्त मात्रा में प्रयोग करना चाहिए |
2. शीतलक की मात्रा को संक्रिया (operation) के अनुसार समायोजित (adjust) करना चाहिए |
3. शीतलक का बहाव अधिक दाब (high pressure) में नहीं होना चाहिए |
4. मशीन संक्रिया (machine operation) शुरू होते ही शीतलक का प्रवाह(flow) भी शुरू हो जाना चाहिए |
5. शीतलक को लगातार धार (jet) के रूप में प्रयोग किया जाना चाहिए |
6. कर्तन चाल (cutting speed) के बढ़ने के साथ-साथ शीतलक का प्रवाह भी बढ़ना चाहिए |
7.शीतलक (coolant) का टैंक एक बड़े आकार का होना चाहिए जिससे कि शीतलक हमेशा ठंडा रह सके |
8. कार्बाइड औजारों द्वारा मशीनिंग करते समय शीतलक (coolant) की आवश्यकता नहीं होती है |

शीतलक और स्नेहक में अंतर (difference between coolant and lubricants)

शीतलक और स्नेहक मैं अन्तर निम्नलिखित है -
1. शीतलक का प्रयोग कार्य खंड और कर्तन औजारों से उत्पन्न हुई उष्मा को दूर करने के लिए किया जाता है |
तथा स्नेहक का प्रयोग दो मिलकर चलने वाले पुर्जों की घर्षण द्वारा उत्पन्न ऊष्मा को कम करने के लिए किया जाता है |
2.शीतलक (coolant) के प्रयोग से छीलन को औजार के फलक के साथ वैर्ल्ड नहीं होता है |
तथा स्नेहक के प्रयोग से चलने वाले पुर्जे जाम नहीं होते हैं |
3. शीतला के प्रयोग से औजार की क्षमता बढ़ती है |तथा स्नेहन के प्रयोग से मशीन को उच्च गति पर चलाया जा सकता है |
4. शीतला के प्रयोग से कम शक्ति लगाकर अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है |
तथा स्नेहन के प्रयोग से भी कम शक्ति लगानी पड़ती है क्योंकि तेल की एक चिकनी परत संपर्क मे गति करने वाले पुर्जो के बीच बन जाती है |
5. शीतलक के प्रयोग से कार्य खंण्ड या जॉब पर अच्छी फिनिश आती है |
वही लुब्रिकेंट्स के प्रयोग से मशीन की यथार्थता लंबे समय तक बनी रहती है |
6. इन दोनों के ही प्रयोग से मशीन व औजारों का जीवनकाल बढ़ता है|
7. शीतल के प्रयोग से प्रयोग किए जाने वाले औजारों पर जंग नहीं लगता है |
तथा स्नेहक के प्रयोग से मशीन के पुर्जो पर जंग नहीं लगता है|

दोस्तों हमारे इस पोस्ट से संबंधित आपके पास अगर कोई समस्या या सुझाव है तो कृपया हमें कमेंट करें धन्यवाद

स्नेहक (lubrication) किन किन विधियों से किया जा सकता है (method of lubrication)

 

इस पोस्ट में हम जानेंगे स्नेहक(lubrication) की विधि के बारे में जैसे गुरुत्वीय भरण विधि, बल भरण विधि, स्प्लैश भरण विधि आदि

स्नेहक की विधि (method of lubrication)

दोस्तों स्नेहक की मुख्य रूप से तीन विधियां होती है जो निम्नलिखित हैं |
1. गुरुत्वीय भरण विधि (gravity feed method)
2. बल भरण विधि (force feed method)
3. स्प्लैश भरण विधि (splash feed method)

गुरुत्वीय भरण विधि (gravity feed method)

स्नेहको को मशीन पार्ट तक पहुंचाने हेतु इस विधि का उपयोग किया जाता है | इस विधि में एक तेल के टैंक को सीधे बियरिंग के ऊपर रखा जाता है, जहां से तेल आपस में स्पर्श करने वाली सतहों के बीच या बियरिंग के अंदर गुरुत्वाकर्षण (gravity) के द्वारा प्रवेश करता है |
इस सिद्धांत का उपयोग अनेक प्रकार के स्नेहन (lubrication) करने वाले साधनों द्वारा किया जाता है |
इस विधि में साधारण तेल छिद्र (oil hole) से लेकर बड़े तक तैयार की हुई बत्ती जिसमें तेल के बहाव को नियंत्रित किया जाता है इसी सिद्धांत पर आधारित होता है |
सभी तैल छिद्र पर किसी न किसी प्रकार कि युक्ति का प्रबंध होना आवश्यक है अन्यथा धूल मिट्टी से छिद्र भर जाएगा, इस कारण बियरिंग या सतहों का स्नेहन नहीं किया जा सकेगा |
इस विधि के अंतर्गत निम्नलिखित साधनों (युक्तियों) का प्रयोग किया जाता है
A. तेल कप (oil cap)
B. विक भरण लुब्रिकेटर (Wick feed lubricator)
C. ग्लास साइडेड ड्रिप भरण लुब्रिकेटर (glass sided drip feed lubricator)
D. ल्यूवेन्स ग्लास बोतल लुब्रिकेटर (lieuvain's glass bottle lubricator)

A. तेल कप (oil cap)

यह स्नेहन(लुब्रिकेशन) करने का एक प्रकार का साधारण साधन होता है | इसे चूड़ियों(threads) की सहायता से तेल छिद्र (oil hole) में फिट किया जाता है |
यह तेल छिद्र (oil hole) और तेल को धूल और मिट्टी के कणों से बचाता है |


इसमें एक दूसरा सिलेंडर तेल कप (cylinder oil cap) होता है जो कि गन मेटल का बना होता है, इसका मुख्य रूप से उपयोग ऊर्ध्वाधर भाप इंजन सिलेंडर के लिए किया जाता है |
इसमें तो कॉक भी होते हैं, जिनमें ऊपरी कॉक केवल तेल भरने के लिए तथा निचली कॉक से तेल सिलेंडर में जाता है|
इनमें हम जब भी कोई एक कॉक को खोलते हैं, तो दूसरे को हमेशा बंद रखते हैं |

B. विक भरण लुब्रिकेटर (Wick feed lubricator)

इसकी बनावट साइफन सिद्धांत पर आधारित होती है |
उदाहरण के लिए यदि दो बर्तनों को लेकर एक में द्रव भर कर किसी ऊंचे स्थान पर रख दिया जाए और एक नली में द्रव भरकर उसके एक सिरे को ऊपर रखे बर्तन में डुबो दिया जाए तथा दूसरे सिरे को नीचे वाले खाली बर्तन में डाल दिया जाए तो जब तक की नली का सिरा ऊपरी बर्तन में रखें द्रव में डूबा रहता है, तब तक लगातार नली के द्वारा नीचे रखे बर्तन में द्रव्य गिरता रहेगा |

C. ग्लास साइडेड ड्रिप भरण लुब्रिकेटर (glass sided drip feed lubricator)

इससे स्नेहन विधि को साइट भरण लुब्रिकेटर (sight feed lubricator) भी कहा जाता है |
इसके तेल का बर्तन या कुम्पी हमेशा कांच की बनी होती है |
कुम्पी के ऊपर एक छेद बना होता है, जिसको फिलिंग छेद कहा जाता है | इस छेद से तेल को कुम्पी में डाला जाता है |
यह तेल फिल्टर से छन कर एक छेद के द्वारा भीतरी चेंबर में प्रवेश करता है और गुरुत्वाकर्षण के कारण एक नोजल से होकर बूंद बूंद गिरता रहता है |
इस विधि में तेल के बहाव को नीडल वाल्व द्वारा नियंत्रित(control) किया जाता है |
साइड ग्लास से यह देखा जाता है की तेल कितनी मात्रा में नीचे गिर रहा है |

D. ल्यूवेन्स ग्लास बोतल लुब्रिकेटर (lieuvain's glass bottle lubricator)

ल्यूवेन्स ग्लास बोतल लुब्रिकेटर को नीडिल लुब्रिकेटर भी कहा जाता है |
यह एक कांच की बनी हुई बोतल होती है, जिसको तेल से भरा जाता है
इस बोतल के मुंह पर एक दोहरे टेपर (double taper) का डॉट फिट रहता है |


यह डॉट एक लकड़ी का बना हुआ स्टोपर होता है | इस डॉट के बीच में एक सूई (needle) ढीली की हुई होती है |
बोतल को उलट कर इसके डॉट का निचला सिरा बियरिंग की ऊपरी भाग पर बनी टोपी (cap) मैं बनी तेल छिद्र में फिट कर दिया जाता है |
और जब साफ्ट के घुमाव से सुई हिलती है तो इसमें हवा के बुलबुले तेल चेंबर में प्रवेश करते हैं और इन बुलबुलों के द्वारा तेल अलग-अलग होकर बूंद बूंद करके सॉफ्ट पर गिरता रहता है |
इसमें आवश्यकता अनुसार सुई लगाकर तेल के बहाव को नियंत्रित किया जा सकता है |
इस विधि में जब सॉफ्ट गति करती है केवल उसी वक्त तेल गिरता है | सॉफ्ट के स्थिर होने पर तेल नहीं गिरता है |

2. बल भरण विधि (force feed method)

बल भरण विधि को दाब भरण (pressure feed) विधि भी कहा जाता है |
इस विधि में लुब्रिकेटर के द्वारा स्नेहक (lubricant) पर दबाव देखकर स्नेहक को स्पर्श करने वाली दोनों सतहों के बीच या बेयरिंग के अंदर प्रवेश कराया जाता है |
बल या दाब देकर स्नेहन करने के लिए निम्नलिखित प्रणालियां प्रयोग में लाई जाती हैं |
A. लगातार भरण (continuous field)
B. हाथ पंप द्वारा दाब भरण (pressure feed by head pump)
C. ग्रीस गन द्वारा (by Grease gun)
D. स्क्रू डाउन ग्रीसर (screw down greaser)
E. टेल टेल ग्रीस लुब्रिकेटर (tale tale Grease lubricator)

A. लगातार भरण (continuous field)

इस प्रणाली में एक ऑयल पंप को एक मशीन के द्वारा चलाया जाता है, जो कि लगातार प्रत्येक संबंधित बियरिंग को स्नेहक(lubricant) पहुंचाता रहता है |
इस विधि में तेल बहकर एक सम्प (sump) में जमा हो जाता है और यहीं से पंप द्वारा इसी खींचा जाता है |

B. हाथ पंप द्वारा दाब भरण (pressure feed by head pump)

इस प्रणाली में मशीन ऑपरेटर को मशीन पर कार्य करते समय अपने हाथ से एक या दो बार हस्त पंप को चलाना पड़ता है |


इस प्रणाली के द्वारा प्रत्येक संबंधित सतह  या बियरिंग का स्नेहन होता है |

C. ग्रीस गन द्वारा (by Grease gun)

इस विधि में बियरिंग के ऑयल हॉल पर एक निप्पल लगा हुआ होता है |
इस निप्पल पर ग्रीस गन की नाक (nose) को फिट करके दबाया जाता है | जिसके कारण ग्रीस बियरिंग के अंदर प्रवेश करती है |
मुख्य रूप से 4 प्रकार की ग्रीस गन प्रयोग में ली जाती हैं जो निम्नलिखित  है |

1. टी हैंडल प्रेशर गन (t handle pressure gun)



2. स्वचालित तथा हाइड्रोलिक टाइप प्रेशर गन (automatic aur hydrolic type pressure gun)



3. लीवर टाइप प्रेशर गन (lever type pressure gun)



4. साधारण ग्रीस गन (simple pressure gun)



D. स्क्रू डाउन ग्रीसर (screw down greaser)

स्क्रू डाउन ग्रीसर को हस्त दाब स्टैफर भी कहा जाता है |
यह पीतल या ढलने लोहे का बना होता है |  अच्छी पकड़ के लिए इसके ऊपर की टोपी (कैप) को नर्ल किया जाता है|
और इस टोपी में आंतरिक चूड़ियां कटी होती है|
इस नर्ल की हुई टोपी को हाथ से घुमाकर सॉफ्ट के ऊपर ग्रीस को निचोडा जाता है |
इसका उपयोग धीमी गति से चलने वाले तथा भारी भार को सहन करने वाली बियरिंग मे किया जाता है |

E. टेल टेल ग्रीस लुब्रिकेटर (tale tale Grease lubricator)

इस प्रणाली में नालीदार एक टोपी या कैप होती है, जिसके साथ एक स्प्रिंग लगा हुआ पिस्टन होता है | जिसका साइज टोपी की छोटी साइज से मिलाया हुआ होता है |
इस पिस्टन को स्प्रिंग ही बलपूर्वक रोके रखती है |
इसमें टोपी को थोड़ा सा घुमाने के बाद ही स्वचालित (automatic) क्रिया चालू हो जाती है |
ग्रीस के बहाव को नियंत्रण में रखने के लिए ग्रीस चेंबर में लगे ग्रब इस स्क्रु को समायोजित (adjust) किया जा सकता है |

3. स्प्लैश भरण विधि (splash feed method)

इस विधि में साफ्ट उससे जुड़ा कोई एक भाग तेल में डूबा रहता है, जिस की गति के साथ स्नेहक(lubricant) की धारा उस भाग के चारों ओर लगातार उछलती रहती है |
यह विधि ऑल गियर ड्राइव के अंदर गीयर और बियरिंगो का स्नेहन करने के लिए अपनाई जाती है |



इसमें गियर का निचला सिरा यदि तेल में डूबा हो फिर भी तेल का उचित तल अवश्य होना चाहिए | इसकी व्यवस्था एक अलग फीलिंग स्पाऊंट के द्वारा की जाती है, जिसे तेल से भर कर रखा जाता है |
इस प्रणाली में बियरिंग बीच में से कटी होती है और सॉफ्ट पर एक रिंग गुजरती है | रिंग का निचला सिरा तेल टैक में डूबा रहता है | जब सॉफ्ट घूमती है, तब उसके साथ-साथ तेल चिपक कर शाफ्ट अथवा बियरिंग में पहुंचता है |


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स्नेहक (LUBRICANTS) के गुण तथा प्रकार

 

इस पोस्ट में हम जानेंगे स्नेहक(lubricants) क्या होते है लुब्रिकेंट्स के उद्देश्य तथा lubricants कितने प्रकार के होते हैं |

स्नेहक क्या होते हैं (introduction of lubricants)

जब दो पुर्जे (parts) आपस में रगड़ खाकर चलते हैं तो उनके बीच उत्पन्न होने वाले घर्षण को कम करने के लिए जो तरीके अपनाए जाते हैं उन्हें स्नेहक (lubricants) कहां जाता है |
जब किसी मशीन के दो पुर्जे (parts) आपस में रगड़ खाकर चलते हैं तो जल्दी घिस जाते हैं और खराब हो जाते हैं इन पुर्जो (parts) के बीच घर्षण को कम करने के लिए स्नेहको का प्रयोग किया जाता है|
स्नेहक के उचित प्रयोग से इनमें घर्षण कम होता है जिससे यह पुर्जे अधिक समय तक खराब नहीं होते तथा कम घिसते हैं|
स्नेहक(lubricant) के द्वारा पुर्जो के बीच में बहुत पतली परत बनाई जाती है यह परत संपर्क सतहो को अलग-अलग रखती है और पुर्जे घर्षण से बच जाते है |

स्नेहक के उद्देश्य (objects of lubricant)

स्नेहक के मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित हैं
1. मशीन या पुर्जे parts गर्म होने से बच जाते हैं |
2. मशीन या पुर्जो की गति बढ़ती है क्योंकि स्नेहक के उपयोग से गति प्रतिरोध कम होता है |
3. मशीन की यथार्थता बढ़ती है |
4. मशीन कम शक्ति खर्च करती है |
5. मशीन की उत्पादन क्षमता बढ़ती है |
6. मशीन या पुर्जो पर जंग नहीं लगता है |
7. मशीन के पार्ट्स कम घिसते हैं |

स्नेहक के गुण (properties of lubricants)

स्नेहक lubricants के मुख्यत 9 गुण होते हैं जो निम्नलिखित हैं |
1. श्यानता (viscosity)
2. चिकनाहट (oiliness)
3. स्फुरण बिंदु(flash point)
4. बहाव बिंदु (pour point)
5. अग्नि बिंदु(fire point)
6. वाष्पशीलता (volatality)
7. रासायनिक स्थिरता (chemical stability)
8. अम्लीयता (acidity)
9. इमल्सीफिकेशन (emulsification)

श्यानता (viscosity)

एक स्नेहक(lubricant) जब गति करता है तो इसके कण एक-दूसरे की गति का विरोध करते हैं | जिससे घर्षण प्रतिरोध उत्पन्न होता है, इसे ही श्यानता (viscosity)का गुण कहा जाता है |
अगर दूसरे शब्दों में कहा जाए तो किसी द्रव की आपेक्षिक तरलता को ही उसकी श्यानता कहा जाता है|
कम श्यानता वाले स्नेहक पतले होते हैं और आसानी से बह सकते हैं | जबकि अधिक से श्यानता वाले स्नेहक गाढे होती हैं और इनके बहने की क्षमता भी कम होती है |

चिकनाहट (oiliness)

किसी स्नेहक या तेल की परत सॉफ्ट की गति से उत्पन्न होती है जब सॉफ्ट स्थिर रहती है तो स्नेहक की परत हटकर निचली सतह पर जमा हो जाती है फिर भी ऊपरी सतह पर चिकनाहट रहती है |
यह क्रिया स्नेहक की चिकनाहट पर निर्भर करती है जिसके कारण वह स्नेहक का गीलापन छोड़ती है |
चिकनाहट के अभाव के कारण पुर्जों आदि में थोड़ी बहुत गिरावट आ सकती है |इसलिए चिकनाहट oiliness स्नेहक का वह गुण होता है, जिससे सतहे है चिकनी रहती है |

स्फुरण बिंदु(flash point)

स्फुरण बिंदु(flash point) वह तापमान होता है जिस पर स्नेहक गर्म होकर भाप के रूप में बदलने लगता है और बिना आग लगाए स्वत: ही आग पकड़ लेता है |
सभी स्नेहको का स्फुरण बिंदु(flash point) अलग अलग होता है
इसलिए एक अच्छे स्नेहक में अधिक स्फुरण बिंदु(flash point) होना आवश्यक है |

बहाव बिंदु (pour point)

वह तापमान जिस पर स्नेहक ठंडा होकर गाढ़ा हो जाता है तथा उसका बहाव रुक जाता है उसे बहाव बिंदु (pour point) कहा जाता है |
वे मशीनें जो निम्न टेंपरेचर के लिए उपयोग में ली जाती हैं उनमें इनका महत्व अधिक होता है | जैसे - बर्फ बनाने वाली मशीन तथा रेफ्रिजरेटर

अग्नि बिंदु(fire point)

वह तापमान जिस पर स्नेहक की वाष्प जलने लगती है और तेल आग पकड़ लेता है उसे हम अग्नि बिंदु(fire point) कहते हैं |

वाष्पशीलता (volatality)

यह स्नेहक का वह गुण होता है, जिसके कारण उसके भार में कमी आ जाती है |एक अच्छे स्नेहक की वाष्पशीलता (volatality) कम होनी चाहिए |

रासायनिक स्थिरता (chemical stability)

किसी एक अच्छे स्नेहक में उच्च स्थिरता होनी चाहिए और इसका किसी भी स्थिति में अपघटन या ऑक्सीकरण नहीं होना चाहिए जिससे गाढ़ा होने से इसके बहाव में कमी ना आए |

अम्लीयता (acidity)

स्नेहक में यदि अमल की मात्रा स्वतंत्र रूप से होगी तो सताह खराब होने से घर्षण बढ़ता है |
स्नेहा को अमल की मात्रा होने पर जंग लगने से सतह खराब हो सकती है |
इसलिए एक अच्छे स्नेहक में प्रत्यक्ष रूप से अमल नहीं होना चाहिए |

इमल्सीफिकेशन (emulsification)

जब कोई स्नेहक पानी के साथ मिलता है तो उसे इमल्सीफिकेशन (emulsification) कहते हैं |
एक अच्छी किस्म के स्नेहक में पानी नहीं खुलता है
इमल्सीफिकेशन (emulsification) की भाप इंजन, भाप टरबाइन या हाइड्रॉलिक टरबाइन आदी में होने की संभावना ज्यादा होती है |

स्नेहक के प्रकार (types of lubricants)

स्नेहको को तीन श्रेणियों में बांटा गया है जो निम्नलिखित है|
1. द्रव स्नेहक (liquid lubricants)
2. अर्ध ठोस स्नेहक (semi solid lubricant)
3. ठोस स्नेहक (solid lubricant)

1. द्रव स्नेहक (liquid lubricants)

द्रव स्नेहको को निम्नलिखित प्रकार से बांटा गया है|
A. कार्बनिक तेल (organic oil)
B. खनिज तेल (mineral oil)
C. कृत्रिम तेल (synthetic oil)

कार्बनिक तेल (organic oil)

कार्बनिक तेल को फैटी ऑयल या स्थिर आयल भी कहते हैं|
यह कार्बनिक तेल (organic oil) पशु(animal) वनस्पति और मछलियों से प्राप्त किए जाता हैं|
मछलियों के सिर से निकाला गया तेल भी स्नेहक के रूप में प्रयोग किया जाता है |

कार्बनिक तेल के गुण (properties of organic oil)

यह तेल अत्यधिक कीमती होता है |
नमी वाली वायु या जलीय साधन से जलयुक्त होने की प्रकृति के कारण क्रिया में अम्लीय होता है |
वायु के संपर्क में ऑक्सीजन * करने तथा गाढ़ा होने की अधिक प्रवृत्ति होती है |
यह तेल के छेद hole को बंद कर देता है |

खनिज तेल (mineral oil)

यह तेल पेट्रोलियम से प्राप्त होते हैं तथा यह पैराफिन या नैफ्थनिक तेल होते हैं |
नैफ्थनिक तेलो की अपेक्षा पैराफिन तेल उच्च तापमान पर स्वच्छता से टिकते हैं |
तापमान में वृद्धि के साथ पैराफिन तेलों की अपेक्षा नैफ्थनिक तेल स्नेहक के लिए निम्नलिखित स्तर के होते हैं|
कार्बनिक तेलों की अपेक्षा खनिज तेलों की श्यानता कम होती है | इसलिए इन्हें क्रूड आयल (crude oil) भी कहा जाता है |
खनिज तेलों की श्यानता की परास अधिक होती है तथा यह कम चिपचिपा और कार्बनिक तेलों से अधिक चिकनाहट वाला होता है |
इनकी क्षमता को बढ़ाने और इनको भारी बनाने के लिए इनमें 5% से 25% तक कार्बनिक तेलों को मिलाया जाता है जिसे संयुक्त तेल (compound oil) कहते हैं|
उपयोग के आधार पर खनिज तेल नो को पेट्रोलियम स्नेहक के रूप में निम्नलिखित रुप में कर सकते हैं |
सर्कुलेटिंग आयल, गियर आयल, मशीन या इंजन आयल, रेफ्रिजरेशन आयल, स्पिंडल ऑयल, स्टीम सिलेंडर ऑयल, वायर रोप स्नेहक आदि |

कृत्रिम तेल (synthetic oil)

सिंथेटिक ऑयल महंगे होते और इनका उपयोग सीमित स्थानों पर किया जाता है |
यह पोलीएल्कालीन ग्लेकोस तथा योगिक सिलिकॉन होते हैं|
यह सिलिकन कोल और बालू से तैयार किए जाते हैं |
इनमें सिलीकान कार्बाईड को अलग-अलग तत्वों के साथ सिलिकन और ऑक्सीजन में रासायनिक क्रिया द्वारा बदल दिया जाता है, जिसे सिलिकॉन स्नेहक कहते हैं |

2. अर्ध ठोस स्नेहक (semi solid lubricant)

यह स्नेहक साबुन के समान गाढ़ा खनिज तेल होता है |
यह तेल की अपेक्षा उच्च श्यानता वाला होता है |
इसके द्वारा अलग-अलग प्रकार की ग्रीस तैयार की जाती है|
इसे गाढा बनाने के लिए इसमें पेट्रोलियम और कृत्रिम तेल मिलाए जाते हैं |
इसमें सोडियम, कैल्शियम, एलमुनियम, बेरियम, लिथियम, और स्ट्रान्सियम के साबुन फैट मिलाये जाते है|
यह साबुन फैट और धातु आधार की रासायनिक क्रिया की उपज होते हैं |
अर्थ ठोस स्नेहक अर्थात ग्रीस का उपयोग उन स्थानों पर किया जाता है जहां पर उच्च तापमान पैदा होता है और जिसमें द्रर्व स्नेहको का प्रयोग करना संभव न हो |

3. ठोस स्नेहक (solid lubricant)

ऐसी जगह जहां दबाव व तापमान के कारण जहां तेल परत नहीं बन पाती, ऐसी जगह घर्षण को कम करने के लिए  ठोस स्नेहक (solid lubricant) का प्रयोग किया जाता है|
इस प्रकार के ठोस स्नेहक का प्रयोग अकेले अथवा इनके साथ तेल या ग्रीस मिलाकर किया जाता है | इसका सबसे अच्छा उदाहरण ग्रेफाइट होता है |
ग्रेफाइट के अलावा ठोस स्नेहक जैसे - सॉपस्टोन, टेल्क, वैक्स, माइका, और फ्रेंच चौक आदि होते हैं |


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